मंगलवार, 25 मई 2021

बनू क़ुरैज़ा का मामला क्या था ?

बहुत से भाई हैं जो इब्न इस्हाक़, तबरी और हिशाम के द्वारा लिखे तथाकथित इस्लामी इतिहास में वर्णित "बनु क़ुरैज़ा" क़बीले के यहूदियों को मुस्लिमों द्वारा मौत की सज़ा दिए जाने के अन्यायपूर्ण वर्णनों पर सवाल उठाते हैं.... लेकिन इस मामले में सबसे पहले ये बात दिमाग में रख लेनी चाहिए कि नबी सल्ल० और सहाबा के विषय में तारीख़ के किस्से प्रमाणिक नही हैं, बल्कि इनसे ज़्यादा प्रमाणिक बातें सही हदीस की होती हैं . ....तो हदीसों से इस मामले में ये पता चलता है कि बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ.. अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने की थी, जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया (अबु दाऊद 3004 व 3005) फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए, ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते... अंततः एक झड़प के बाद यहूदी पकड़े गए, और जब इन्हें सज़ा देने का समय आया तो बुख़ारी और मुस्लिम में दर्ज अहादीस के अनुसार इन लोगों ने साद बिन मुआज़ रज़ि० से अपना फैसला करवाना चाहा, साद बिन मुआज़ पहले यहूदी ही थे और कुछ समय पहले मुस्लिम हुए थे, बनू क़ुरैज़ा वालों ने शायद ये सोचा होगा कि पहले यहूदी रहने के नाते साद गलत तरीके से बनु क़ुरैज़ा वालों को फ़ायदा पहुंचाएंगे... मगर जब फ़ैसले का दारोमदार हज़रत साद पर आ गया और उसमें नबी सल्ल० का इन्टरफेयरेन्स नही रहा तो साद बिन मुआज़ ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले, और मुस्लिमों का नरसंहार करने की साज़िश करने वाले बनू कुरैज़ा के मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और लड़कों को गुलाम बनाया जाए .. . ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने शत्रुओं और षणयंत्र करने वालों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस में आप देख सकते हैं.... क्योंकि साद पहले से इस कानून के करीब रहे थे सो उन्होंने ये सज़ा बनु क़ुरैज़ा के दोषियों को दी.... . .... वैसे हमें ये यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. से करवाने का इसरार किया होता तो जिन यहूदियों को हज़रत साद ने मौत की सज़ा दे दी, नबी सल्ल० उन पर भी रहम फ़रमा देते, जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी) . याद रखिए साद रज़ि० ने कत्ल करने की सजा उन्हीं पुरुषों और गुलाम बनाने की सज़ा उन्हीं स्त्रियों व किशोरों को दी थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे, और जो यहूदी मुस्लिमों के साथ युद्ध में शामिल नही थे, उनको बिल्कुल नहीं छेड़ा गया था.. . .... इब्न इस्हाक़, एवम इनके बाद के इतिहासकारों ने बिना किसी आधार के भारी संख्या मे बनू कुरैज़ा के पुरूषों की हत्या की बात लिखी है, जो कि पूरी तरह अस्वीकार्य है, चूंकि इस्लाम मे जान के बदले जान का नियम है, तिस पर भी माफी को वरीयता दी गई है, ... तो उन यहूदियों द्वारा यदि अधिक मुस्लिम नहीं मारे गए थे तो मृत्युदण्ड भी अधिक लोगों को नहीं दिया जा सकता था ... उसपर इनमें से कई लोग अलग अलग कारणों से मौत की सजा से बचा लिए गए थे तो मौत की सजा पाने वालों का आंकड़ा मैं नहीं समझता कि 15-20 से ऊपर जा सकता है, यानी जितने मुसलमान इनकी वजह से मारे गए, उससे कम ही इनका आंकड़ा रहेगा...!! . ..... और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे... बल्कि मुस्लिमों को तो क़ुरआन में स्पष्ट आदेश दे दिया गया था कि युद्धबन्दियों को मुसलमान सदा के लिए गुलाम बनाकर नही रख सकते, बल्कि या तो उनसे कुछ अर्थदंड लेकर उन्हें रिहा कर दें, या बिना कुछ लिए, एहसान के तौर पर उनको रिहा कर दें.... इसके सिवाय तीसरा कोई रास्ता युद्धबन्दियों के लिए क़ुरआन ने नही बताया है ...(क़ुरआन 47:4) ... तो बनू क़ुरैज़ा के युद्धबन्दियों को भी कुछ समय बाद स्वतन्त्र कर दिया गया था....!!! .....बनु क़ुरैज़ा से मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध करने आई स्त्रियों में बंदी बनाई गई एक स्त्री रेहाना बिन्त ज़ैद के विषय में भी तारीख़ ए तबरी आदि में जो बातें लिखी गई हैं कि नबी सल्ल० ने दासी के तौर पर रेहाना को अपने पास रखा था, वो क़ुरआन के उपरोक्त आदेश को देखते हुए विश्वास योग्य नहीं हैं, बल्कि वे स्रोत जो ये कहते हैं कि रेहाना बिन्त ज़ैद को आज़ाद कर दिया गया था, जिसके बाद वो मुस्लिम बन गईं, और उसके बाद सम्भवतः नबी सल्ल० के निकाह में वो आईं, वो क़ुरआन के अनुसार ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं ..... जबकि मौलाना शिबली नोमानी जैसे विद्वानों का ये भी विचार है कि रेहाना बिन्त ज़ैद को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, मुस्लिमों ने आज़ाद कर दिया था और वो अपने लोगों में जाकर रहने लगी थीं, उनका नबी सल्ल० के साथ कभी कोई सम्बन्ध नही रहा था.... यानी इस विषय में कोई एक प्रमाणिक बात नही है॥ . ... ये ध्यान रखिये कि क़ुरआन एकमात्र वो प्रमाणित पुस्तक है, जिसमें शुरू से लेकर आज तक कोई परिवर्तन नही आया, इसलिए मुस्लिम इतिहास के विषय में, सबसे प्रमाणिक बात क़ुरआन से पता चलती है, .... फिर हदीसों को भी व्यक्ति के सच्चा होने का पूरा पता लगा लेने के उपरांत ही लिखा जाता था, इसलिये हदीसों की बातें भी मानी जाती हैं... .... लेकिन हदीसों के लिखे जाने में जो सावधानी बरती गई, उस सावधानी का इस्लामी तारीख़ के नाम पर लिखी गई किताबों में सर्वथा अभाव रहा ... इब्ने इस्हाक़, हिशाम और तबरी ने क्रमशः नबी सल्ल० के सौ, दो सौ और ढाई सौ साल बाद आप सल्ल० का इतिहास लिपिबद्ध किया इन्होंने समाज में कहे सुने जा रहे किस्सों को कहने वाले व्यक्ति की नबी सल्ल० से सम्बद्धता है या नहीं, उसने जिन स्रोतों से ये बातें सुनी, वे कितने सच्चे थे, इन बातों पर ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपने विवेक के आधार पर उन किस्सों को लिख लिया, इसलिये ये किस्से लिखे जाने के समय ही संदिग्ध थे, और हम तक पहुँचते पहुँचते इनमें कितना बदलाव हो चुका है, ये कहना भी मुश्किल है, इसलिए तारीख की ये किताबें अधिक विश्वासयोग्य भी नही ठहरती हैं, ये ध्यान रखना चाहिए...!!!

रक्त सम्बन्धियों से विवाह: उचित या अनुचित ?

मुस्लिमों द्वारा अपने चाचा, मामा, बुआ की बेटियों से विवाह करने की प्रथा पर हमारे कुछ गैर मुस्लिम भाईयों का बड़ी घृणा के साथ कहना है कि मुस्लिम अपनी ही बहनों के ही भाई नहीं होते, और मुस्लिमों की गन्दी नज़र ने उनकी अपनी बहनें ही नहीं बच पातीं ........ भाईयों आपका ये कटाक्ष सर आंखो पर लेते हुए मैं ये कहना चाहता हूँ कि मुस्लिमों को सिर्फ अपनी बहनों का ही नही बल्कि इसकी, उसकी, आपकी, मेरी सभी की बहनों का भाई बनने का, यानि संसार की सारी लड़कियों का भाई बनने का आदेश दिया गया है, चाहे वो लड़कियां किसी भी धर्म, जाति समुदाय की हों, उनके मान-सम्मान उनके सतीत्व और उनके जीवन की रक्षा हमें ठीक उसी प्रकार करनी है, जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है ...!!!! अब भाई, रहा सवाल इस बात का कि जो मुस्लिम अपनी ही चचेरी, ममेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों से विवाह करते हैं, ये उचित है या अनुचित, सराहनीय कार्य है या घृणास्पद ? तो इस बारे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि क्योंकि ऐसे विवाह की हर धर्म मे अनुमति है, तो आप चाहे जिस भी धर्म को उचित मानें, ये विवाह भी आपको उचित ही मानना होगा ..... ऐसे विवाह की विशेषता ये है कि क्योंकि वधू, वर पक्ष के किसी अपने ही प्रिय सम्बन्धी की ही बेटी होती है, इसलिए दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या की संभावना शून्य, और वधू के मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न की संभावना बिलकुल क्षीण रहती है ... पति को अपने ससुराल पक्ष का इस कारण और लिहाज़ रहता है, कि वो पहले से उनके रिश्तेदार हैं, इसलिए अकारण वो पत्नी को त्यागने आदि से खुद को रोकता है... फिर ऐसे विवाह मे विशेषकर लड़की के विवाह मे आसानी रहती है, लड़की यदि गुणवती है तो उसके गुणों से मुग्ध हो कर, और यदि गुणवती नहीं भी है तो भी उसके परिवार से प्रेम के कारण खानदान से ही लड़की के रिश्ते आ जाते हैं, क्योंकि लड़की को देखने वाला उसका भावी ससुराल पक्ष उसके घर मे सदा से ही आता जाता रहा है पति पत्नी या उनके परिवारों के आपस मे व्यवहार न मिल पाने के कारण विवाह के टूटने का भय भी इस विवाह मे न्यून है क्योंकि दोनों परिवार वर वधू के जन्म से भी पहले से एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, और एक दूसरे के व्यवहार को वर्षों अच्छी तरह परखने, और विवाह के लिए वर वधू की सहमति के बाद ही आपस मे ये नया सम्बन्ध जोड़ते हैं .... और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि करीबी सम्बन्धियों मे विवाह की प्रथा से लड़के लड़कियों के विवाह मे देरी की नौबत नही आती, जिससे नई पीढ़ी मे भटकाव की समस्या भी नही आने पाती, जबकि अन्य परिवारों मे रिश्ता ढूंढने और पसंद करने मे कई वर्ष लग जाते हैं, इसके बाद भी विवाह के सफल न होने का डर अलग ...!! इन्हीं सारे कारणों से मैं तो करीबी रिश्तेदारियों मे विवाह की प्रथा को एक सराहनीय कार्य मानता हूँ ...!!

इस्लाम मे व्यभिचार का दंड

इस्लाम मे व्यभिचार का दण्ड .... विरोधी ऐसा दिखाते हैं, जैसे इस्लाम मे किसी भी तरह के व्यभिचार पर मौत का दण्ड है, और वो भी केवल औरत को .... पर ऐसा नहीं है ॥ एडल्टरी यानि व्यभिचार की तीन कैटेगरीज़ हैं पहली किसी पुरुष का किसी स्त्री के साथ जबरन बलात्कार ... इसमें पुरुष के लिए कठोरतम दण्ड मौत की सजा है जबकि स्त्रियों के साथ सहानुभूति ॥ दूसरी कैटेगरी जिसमें अविवाहित स्त्री पुरुष कामोत्तेजना को निकालने के वैध मार्ग के अभाव मे एक दूसरे की सहमति से सहवास करते हैं, इस मे मौत की सजा नहीं है बल्कि 100 कोड़े का दण्ड स्त्री पुरुष दोनों को है ! तीसरी कैटेगरी, जब विवाहित स्त्री पुरुष अपने पति और पत्नी को धोखा देकर अन्य किन्हीं स्त्री पुरूषों के साथ सहमति से सम्भोग करते हैं तो उन दोनो के लिए कठोर दण्ड है (न कि केवल स्त्री के लिए ) .... ये दण्ड यदि कानून मौत की सजा निर्धारित करे तब भी वो न्यायोचित है ... कैसे न्यायोचित है और व्यभिचार पर दण्ड क्यों है वो मेरे इस लेख पर पढ़ लें और कृपया कोई भी प्रश्न इस लेख को पूरा और ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद ही करें .... कुछ भाईयों की इस्लामी शरीयत मे वर्णित सख्त सज़ाओं के प्रावधान के विषय मे विशेषकर दो आपत्तियां जताते हैं .... पहली आपत्ति ये, कि चोरी या व्यभिचार जैसे "छोटे" अपराधों पर शरीयत मे अपराधी के हाथ काटने और मृत्युदण्ड जैसी सख्त सज़ाएं देना क्रूरता और अमानवीयता है .. और दूसरी ये कि शरीयत मे हत्या और बलात्कार आदि जैसे अपराधों पर भी मृत्युदण्ड देना ठीक नही क्योंकि जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो किसी के प्राण लेने का भी हमें कोई अधिकार नही है ....!! मित्रों । अस्ल में होता ये है कि व्यभिचार की सजा का विरोध करने वाले लोग अक्सर खुद को किसी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट दिलाने की बात दिमाग मे रखकर व्यभिचार की गम्भीर सजा पर आपत्तियां जताते हैं, लेकिन वे ही लोग अपने दिल पर हाथ रखकर सोचे कि क्या वे अपनी मां, बहन, बेटी, पिता और बेटों को भी कई अलग अलग लोगों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने को प्रोत्साहित करना चाहेंगे ..?? निश्चय ही वे ऐसा नहीं चाहेंगे, बल्कि वे चाहेंगे कि उनके माता पिता एक दूसरे के प्रति वफादार रहें, और उनका जीवनसाथी उनके प्रति निष्ठावान रहे वे नही चाहेंगे कि उनके माता पिता, बहन बेटी या पत्नी के अवैध सम्बन्धो के कारण उनके घर की सुख शांति और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाए , इसलिए वे अपने परिवारीजनो को इस प्रकार के किसी भी सम्बन्ध से हर हाल मे दूर रखना चाहेंगे शरीयत मे बताई गई सज़ाओं का मोटिफ भी यही है , कि उसके कार्यक्षेत्र मे आने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को किसी भी कुकर्म से भरसक बचाकर रखे .... और जैसा कि मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि, शरीयत मे कुछ विशेष अपराधों के लिए सख्त सज़ाओं का प्रावधान इसलिए नहीं कि ईश्वर अपने बंदो को मरवा देना चाहता है, बल्कि ये प्रावधान इसलिए है ताकि जो व्यक्ति थोड़े से आनन्द की प्राप्ति के लिए कोई अपराध करना चाहता हो, तो वो उस अपराध की भयंकर सजा के बारे मे सोचकर बुरी तरह से डर जाए, और अपराध करने की सोच ही न पाए .... फिर जब अपराध ही न होगा तो मौत की सज़ा से मारा कौन जाएगा ?? लेकिन इस सख्त कानून के लागू होने के बावजूद यदि कोई अपराधी कानून को धता बता कर दण्डनीय अपराध करे तो इसका मतलब यही है कि उस अपराधी ने पकड़े जाने की हालत मे अपना अन्जाम जानते बूझते ये अपराध करने का फैसला किया था, अगर वो सख्त सजा से डर जाता तो ये अपराध ही न करता .... तो फिर जो व्यक्ति खुद सख्त सजा पाने को तैयार हो उस समाज मे बिगाड़ पैदा करने वाले अपराधी से किसी को भी किसी तरह की सहानुभूति क्यों हो ?? दूसरी बात शरीयत यदि अन्यायपूर्ण ढंग से काम करे, यानि किसी निरपराध को दण्ड दे, या फिर किसी मुजरिम को उसके जुर्म पर ऐसा कठोर दण्ड दे, जिसके बारे मे मुजरिम को पहले से चेतावनी न दी गई हो , तब तो शरीयत की सज़ाओं पर ऐतराज करने का कोई तुक भी है.... लेकिन शरीयत कानून सिर्फ अपराधियों के लिए बुरा है , ये सदाचारी, शांतिप्रिय और निरपराध लोगों पर कोई सख्ती नहीं करता, बल्कि ये तो कानून का पालन करने वाले सज्जन लोगों का जीवन सुगम ही बनाता है.... पता नहीं वे लोग अपराधियों के क्या लगते हैं, जो शरीयत का विरोध किया करते हैं ...??? शरीयत कानून किसी के जुर्म करने से पहले ही उस जुर्म के लिए नियत सज़ाओं का ऐलान कर देता है, ताकि वो जुर्म करने को इच्छुक कोई भी व्यक्ति उस जुर्म का अंजाम पहले से जान रखे , और सजा के भय से ही सही, खुद को जुर्म करने से बचाए रखे ..... यदि इसके बावजूद कोई व्यक्ति अपराध कर बैठता है तब भी शरीयत दोषी को अन्यायपूर्ण ढंग से सजा नही देती, बल्कि पहले कोर्ट मे जुर्म के सभी पहलुओं पर विचार किया जाता है, देखा जाता है कि अपराध अगर किसी मजबूरी के तहत विवश होकर किया गया है, तो सज़ा माफ या कम भी की जा सकती है उदाहरणार्थ विवाह न हो पाने के कारण अपनी कामोत्तेजना के आगे विवश होकर यदि कुंवारे स्त्री पुरुष व्यभिचार कर बैठें, तो उन्हें मौत की सजा शरीयत नहीं देगी, मौत की सजा केवल उनके लिए है जो लोग विवाहित होकर भी व्यभिचार मे लिप्त रहे हों , यानि जिनके पास अपनी कामवासना की पूर्ति का वैध साधन होने के बावजूद, यानि कामोत्तेना से विवश होकर नहीं बल्कि जिन्होंने केवल मनमानी करने को कानून का उल्लंघन किया हो, केवल वे ही लोग कठोर सजा के अधिकारी हैं शरीयत की नजर मे .......... इसी तरह भूख या गरीबी से विवश हो कर कोई व्यक्ति चोरी कर बैठे तो शरीयत उसका हाथ काटने का हुक्म नहीं देती बल्कि हाथ काटने की सजा केवल उसको सुनाई जाती है जो व्यक्ति बिना किसी मजबूरी के सिर्फ ऐश करने के लिए चोरियां किया करता है यानि, कठोर सजा केवल उन्हीं व्यक्तियों को उनका जुर्म कोर्ट मे पूरी तरह सिद्ध हो जाने के बाद दी जाती है जो सजा के अंजाम से भली भांति परिचित होकर भी, किसी मजबूरी या दबाव के न होने के बावजूद, कोई अनुचित लाभ या अनुचित आनंद लेने के लिए अपराध करते हैं शरीयत का विरोध अक्सर इस सोच के कारण किया जाता है क्योंकि लोग सोचते हैं कि जिन देशों इतने कठोर कानून होते हैं , वहाँ का हर नागरिक एक घुटन और तनाव मे जीता होगा,पर ऐसा नहीं है, आप विश्व के उन अनेक विकसित देशों का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ नशीली वस्तुओं के व्यापार और भ्रष्टाचार जैसे मामूली जुर्म पर मौत की सजा देने का कानून लागू है, लेकिन खुशहाली इन देशों मे भारत से कहीं अधिक ही पाई जाती है अमरीका जैसे विकसित देश में ही विभिन्न अपराधों पर बिना किसी रियायत के लगातार मृत्युदण्ड दिया जाता है, अमेरिका मे कानूनों का सख्ती से पालन किया जाता है, कितने लोग सोचते हैं कि अमेरिका के नागरिकों का जीवनस्तर भारतीयों से खराब है ??? बल्कि भारत के मुकाबले इन देशों मे जीवन प्रत्याशा,स्वास्थ्य और खुशहाली कहीं अधिक है क्या घुटन और तनाव के वातावरण मे जनता का अच्छा स्वास्थ्य और खुशहाली सम्भव है ?? नही न.... बल्कि इन देशों मे लागू कठोर कानूनों ने वहाँ आम जनता का जीवन भ्रष्टाचार, गुण्डागर्दी और किसी भी प्रकार के अपराध के डर से बिल्कुल मुक्त कर दिया है, जिससे वे लोग ऐसा चिंतामुक्त और खुशहाल जीवन जीने लगे हैं जैसे जीवन की आज हम अपने देश मे रहते हुए कल्पना भी मुश्किल से कर पाते हैं वास्तव में किसी भी देश मे न्याय व्यवस्था बनाए रखने के लिए ,वहां के निवासियों मे कानून का डर होना जरूरी है, और कानून का डर होने के लिए उस कानून मे सख्त सजाओं का प्रावधान होना भी जरूरी है, इसी कारण हमारे देश भारत और चीन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, जापान तथा अमेरिका समेत 39 देशों ने 2012 में संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में मृत्युदण्ड उन्मूलन के लिए रखे गये वैश्विक प्रस्ताव का विरोध किया था,

मेराज के सफर में इसरा

मेरे एक आर्य समाजी भाई ने मुझसे पूछा था कि क्या गधे उड़ सकते हैं ? अस्ल मे भाई का इशारा मेराज के वाकये मे नबी सल्ल. के पास भेजे गए शुभ्र श्वेत और बहुत तीव्रगामी जानवर बुर्राक़ की ओर था ... और भाई को विश्वास नही आ रहा था कि गधे या घोड़े जैसा जानवर आकाश मे उड़ कर नबी सल्ल. को सातवें आसमान पर कैसे ले जा सकता है ? हालांकि अल्लाह के हुक्म से कुछ भी आम आदत से अलग और चमत्कारी बात हो जाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है.... और इस चमत्कार मे हर वो व्यक्ति विश्वास करता है जो नास्तिक नही है . क्योंकि किसी भी धर्म मे विश्वास करने वाला व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व मे विश्वास करता है , और ईश्वर स्वयं एक चमत्कार है, क्योंकि विश्वास ये है कि ईश्वर ने विज्ञान का निर्माण किया है, और वो ही विज्ञान के नियमों का संचालन करता है, अत: विज्ञान के नियम ईश्वर के अधीन हैं, न कि ईश्वर विज्ञान के अधीन है, तो ईश्वर को मानने का अर्थ है विज्ञान की ईश्वर के सम्मुख हार, और ईश्वर द्वारा कोई भी चमत्कार कर सकने को स्वीकारना... और अलहम्दुलिल्लाह प्रश्न पूछने वाले मेरे भाई भी ईश्वर मे विश्वास रखते हैं बहरहाल प्रश्न पर आते हैं, और पता करते हैं कि क्या वाकई मेराज की घटना मे नबी सल्ल. किसी जानवर पर बैठकर आसमान पर गए थे...??? मेराज की घटना के बारे मे सबसे महत्वपूर्ण बात ये जान लेनी चाहिए कि इस मेराज के वाकये के वास्तव मे दो भाग हैं, जिन्हें (1) इसरा, और (2) मेराज, ( الإسراء والمعراج, ) कहा जाता है जिसमें इसरा का मतलब है रातों रात सफर करना यानि इसरा का अर्थ जमीनी यात्रा है और मेराज का मतलब है ऊंचाई पर उठना सवाल करने वालो के लिए ये भी जानना ज़रूरी है कि इसरा वल मेराज के सफर के बारे मे मुसलमानों मे दो किस्म के खयाल हैं, बड़ा तबका ये मानता है कि नबी सल्ल. मेराज पर जिस्म के साथ गए थे , जैसा कि अल्लाह के हुक्म से होना बिल्कुल मुश्किल नहीं है , वहीं कुछ मुस्लिमों का ये ख्याल भी है कि इस सफर पर नबी सल्ल. का जिस्म नही केवल आप सल्ल. की रूह गई थी, इनके इस ख्याल का आधार उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ि. का ये कौल है कि " मेराज का वाकया हुज़ूर सल्ल. की रूह के साथ ही पेश आया था और आप सल्ल. के जिस्म ने अपनी जगह नहीं छोड़ी थी " अम्मा आइशा रज़ि. के इस क़ौल को अल-ताबरी और इब्न कसीर जैसे विद्वानों ने अपनी तफ्सीरात मे नक्ल किया है... जो लोग इसरा वल मेराज को रूहानी सफर मानते हैं उनका अकीदा है कि कुरान की भाषा अलन्कारिक है इसलिए मेराज के विषय मे कुरान की आयतों का शाब्दिक अर्थ ले लेने से घटना को सही प्रकार समझा नहीं जा सकता बहरहाल क्योंकि अधिकतर मुस्लिम जनसमुदाय और मुसलमान विद्वान कुरान मे जो कुछ जैसा जैसा लिखा है, उस बात को उस आयत के शाब्दिक अर्थ लेकर वैसे का वैसा मानते हैं और उसके लिए अक्सर सही इस्नाद वाली अहादीस की मदद लेते हैं, तो एक आम मुसलमान होने के नाते कुरान पाक की आयतों पर वैसे का वैसा यकीन करते हुए मै भी इस घटना के पहले भाग इसरा को आप सल्ल. का जिस्मानी तौर पर किया हुआ सफर मानता हूँ , उस हिसाब से घटना को देखिए भाई ने बुर्राक़ को गधा कहा, निश्चित ही हमें चिढ़ाने के लिए, वैसे बुर्राक़ का वर्णन एक अलग ही अनोखे जीव के रूप मे हुआ है, बुर्राक़ के बारे मे पवित्र कुरान मे नहीं लिखा है ! और बुखारी शरीफ से अधिक विस्तार से बुर्राक़ के बारे मे मुस्लिम शरीफ मे लिखा है........ और सही मुस्लिम किताब-1, हदीस-309 मे लिखा है कि एक रात जिब्रील अ.स. मक्का मे नबी सल्ल. के पास बुर्राक़ नामी एक चमकदार सफेद रंग का खूबसूरत जानवर लाए ये जानवर कद मे गधे से कुछ ऊंचा और खच्चर से कुछ छोटा था, ( ये चाल मे इतना तेज़ था कि) इसका खुर इतनी दूर जाके पड़ता था जहाँ तक नजर जाती थी इस बुर्राक़ पर बैठकर ज़रा सी ही देर मे आप सल्ल. मक्का से 767 मील (1234 किमी.) दूर येरूशलम के बैतुल मुकद्दस पहुंच गए , जहाँ नबी सल्ल. ने बुर्राक़ को बाहर बान्ध दिया और खुद बैतुल मुकद्दस मे जाकर आप सल्ल. ने दो रकअत नमाज़ पढ़ी इसके बाद इसके बाद जिब्रील अ.स. नबी सल्ल. को मेराज पर ले गए.... यहाँ ये नहीं लिखा कि नबी सल्ल. दोबारा बुर्राक़ पर बैठे फिर मेराज पर गए और बुर्राक़ की चाल की तेजी का जिक्र करते हुए भी यही लिखा है कि बुर्राक़ के पैर कितनी कितनी दूर पड़ते थे वहीं बुखारी शरीफ, किताब-8, हदीस 345 मे लिखा है कि जिब्रील अ.स. नबी करीम सल्ल. का हाथ पकड़कर मेराज पर ले गए थे यानि कहीं भी स्पष्ट रूप से ये नही लिखा कि बुर्राक़ आकाश मे उड़ सकता था या बुर्राक़ पर बैठकर सीधे आसमान पर गए थे ...... इन सब तथ्यों से यही सिद्ध होता है कि बुर्राक इस यात्रा के केवल जमीनी भाग यानि इसरा से सम्बन्धित है इसरा की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है इसके बारे मे सबसे विश्वसनीय किताब पवित्र कुरान की ये आयत कि " महिमावान है वो रब्ब जो अपने बंदे को रातों रात मस्जिद ए हराम से मस्जिद ए अक्सा तक ले गया .." [अल-इसरा, आयत-1] इसरा और मेराज की घटना मे लोगों को मेराज की अपेक्षा इसरा की बात ही अधिक अविश्वसनीय लगी (क्योंकि सिदरतुल मुन्तहा आदि कहाँ है ये अल्लाह और उसके रसूल के अतिरिक्त किसी को मालूम नही है ) अत: लोगों ने ये ही शंका जताई कि कोई भी व्यक्ति एक ही रात मे 1200 किमी. की दूरी तक जाकर और फिर वहाँ से लौट कर कैसे आ सकता है ? तो जैसा कि सही बुखारी , वॉल्यूम 5, किताब 58, हदीस 226 मे लिखा है, आप सल्ल. ने लोगों को बैतुल मुकद्दस का नक्शा बताना शुरू कर दिया जैसा कि उन्होंने रात मे बैतुल मुकद्दस को देखा था , इसके अतिरिक्त आप सल्ल. ने कीकर के उस अभिशप्त पेड़ के बारे मे भी बताया जिसका कुरान मे जिक्र है और जिसे आप सल्ल. ने बैतुल मुकद्दस के रास्ते मे देखा था अत: वे लोग जो पहले कभी बैतुल मुकद्दस देख आए थे , नबी सल्ल. के बताए बैतुल मुकद्दस के वर्णन को एकदम सटीक पाकर उन्हें इस बात का विश्वास हो गया कि नबी सल्ल. रात ही रात मे येरूशलम जा आए हैं, क्योंकि इस से पहले नबी करीम कभी येरूशलम नही गए थे , और मस्जिद को बगैर देखे उस की यथास्थिति को इतनी सटीक तौर पर जानना किसी के लिए भी असम्भव ही था !! हां अंत मे ये कहना चाहता हूँ, कि इसरा अथवा मेराज की घटना को चमत्कार से ज्यादा आप सल्ल. का सम्मान के रूप मे देखा जाना चाहिए इसरा वल मेराज पर विश्वास करना मुस्लिम आस्था का महत्वपूर्ण भाग है पर इसको यदि कोई गैर मुस्लिम चमत्कार न मानना चाहे, तो उसके आगे इसे हमें सिद्ध करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि मेराज की घटना 1400 साल पहले घटित हुई थी और हमेशा के लिए उस घटना की कुरानी आयत के अतिरिक्त कोई और निशानी नहीं बनाई गई है अत: कोई न मानना चाहे , न माने.... वे इस्लाम के उच्च नैतिक नियमों को ही माना लें, तो इतना काफी है.....!!!

क्या क़ुरआन के अनुसार सूरज दलदल में डूबता है ?

कुरान पाक के खिलाफ अक्सर कुछ भाई लोग ये कहते मिल जाते हैं कि कुरान के अनुसार सूरज काले मटमैले पानी मे जा के डूबता है, अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए कई लोग कुरान पाक की ये आयत भी दिखाते हैं " यहाँ तक कि वह ( ज़ुलकारनैन ) उस जगह पहुंच गया ,और उसने सूरज को काले मटमैले पानी के स्रोत मे डूबते हुआ पाया" सूरा -अल कहफ़ 18:86 लेकिन ये कोई वीर बताने की ज़हमत नहीं करता कि इस आयत के आगे और पीछे क्या लिखा है ... अगर बता दें तो उनकी पोल न खुल जाएगी दरअसल इन आयतों मे महान चक्रवर्ती सम्राट "ज़ुल्कारनैन" जो कि एक इन्सान ही थे, कोई देवता या नबी नही जिनके पास चमत्कारी शक्तियां हों, उनका किस्सा है और उनके विजय अभियानों का जिक्र है ये राजा ही कई देशों को जीतते हुए जब अति पश्चिम मे गए और समुद्र के किनारे पहुंचे तो शाम का समय था, सूरज डूब रहा था, ज़ुल्कारनैन ने जैसा मंज़र उस वक्त देखा, उसी का वर्णन कुरान 18:86 मे है ॥ सूरज पानी मे डूबा, ये एक इन्सान का व्यू है जो आसमान मे उड़ कर धरती से दूर जाकर ये नहीं देख सकते थे कि सूरज कहाँ गया, न कि यहाँ ये ज़िक्र है कि अल्लाह ने सूरज के साथ क्या किया जिसको ये देखना है कि कुरान के अनुसार रात मे सूरज कहाँ जाता है, वो सूरह ज़ुमर की 5वीं आयत देखे जिसमे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर "लपेटता" है .... लपेटने का अर्थ है किसी चीज को ऊपर नीचे हर ओर से गोलाई मे कवर करना, यानि कुरान के अनुसार अल्लाह दुनिया पर हर ओर से सूर्य का प्रकाश डालता है, इसका अर्थ है कि जब रात मे सूरज छिप जाता है तो वो दुनिया के उल्टी तरफ के गोलार्ध पर उजाला फैला रहा होता है .. न कि समुद्र मे डूब कर उजाला फैलाना बंद कर देता है !! और रही बात पानी के काला मटमैला होने की तो फैक्ट ये है कि समुद्र तट पर सूरज डूबते समय पानी का रंग काला और मटमैला ही दिखता है, ये आप समुद्र के किनारे जाकर देख सकते हैं, या समुद्र के छोर पर अस्त होते हुए सूरज के फोटो देख कर भी चेक कर सकते हैं...!!

जिहाद क्या है ?

जिहाद के बारे मे लगातार दुष्प्रचार
किया जाता है कि जिहाद का अर्थ मुस्लिमों द्वारा हथियारों से लैस होकर, गैर मुस्लिमों की हत्या करने को उनसे युद्ध करना होता है, पर ये सरासर गलत है बल्कि जब आप जिहाद शब्द का अर्थ भी देखेंगे, तो उस अर्थ का हिंसा से कोई सम्बन्ध नही निकलता । जिहाद का अर्थ युद्ध अथवा जनसंहार कतई नही होता, बल्कि जिहाद शब्द अरबी के "जहद" से बना है जिसका अर्थ होता है कोशिश या प्रयास करना, जरा प्रयास शब्द मे हिंसा ढूंढ के दिखाइए .... इस्लाम मे जिहाद का अर्थ है "किसी भी प्रकार की बुराई को मिटाने के लिए कोशिश करना"..... फिर चाहे कोई बुराई गैर मुस्लिम समाज मे हो, या मुस्लिम समाज मे कोई बुराई पनप गई हो, या खुद हमारे अन्दर ही कोई बुराई पैदा हो गई हो, हर बुराई का खात्मा करने के लिए मुसलमान को प्रतिबद्ध होना चाहिए... वस्तुत: जिहाद का सम्बन्ध खून खराबे या हथियार उठाने से नही है ..... अब जैसे इस हदीस पर ध्यान दीजिए कि प्यारे नबी स. ने फरमाया सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद वो है जो एक व्यक्ति खुद अपने चरित्र की बुराइयों के खिलाफ करता है .....(तिबरानी) ज़ाहिर है कि कोई व्यक्ति जब सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद करेगा, तो वो अपने चरित्र की बुराई के खिलाफ जिहाद करेगा तो इसमें हथियार उठाने या खून बहाने की कोई सम्भावना ही नही है, .... और जब वो व्यक्ति अपने चरित्र की बुराइयों को खत्म कर लेगा तो फिर आगे परिस्थितियोंवश अगर उसे कभी युद्ध भी करना पड़ जाए तो भी वो किसी पर अत्याचार करने की सोच भी नही सकता इसी प्रकार एक और हदीस मे जिक्र है कि आप स.अ.व. ने फरमाया कि ये एक बेहतर जिहाद है कि अत्याचारी शासक के सामने शासक के विरुद्ध इन्साफ की कोई बात कह दी जाए (सुनन अल-निसाई) और जैसी धारणा जिहाद का कुप्रचार करने वालों ने समाज की बना दी है कि जिहाद का अर्थ इस्लाम को फैलाने के लिए गैर मुस्लिमों से जबरन युद्ध करना है वैसा तो बिल्कुल भी नही है, इस्लाम कभी भी मुसलमान को खुद कोई भी युद्ध शुरू करने की इजाजत नही देता प्यारे नबी स.अ.व. ने एक जंग के मौके पर लोगों को खिताब करते हुए फरमाया है " ऐ लोगों खुद कभी दुश्मन से लड़ाई भिड़ाई करने की चाहत न करो, बल्कि अल्लाह से दुआ किया करो कि वो दुश्मन के शर से तुम्हारी हिफाज़त करे । लेकिन जब (शत्रु हमला कर दे तो) बहुत मजबूरी मे तुम्हें दुश्मन के मुकाबले जंग करनी पड़ जाए तो न्याय पर कायम रहते हुए युद्ध लड़ो.. (सहीह मुस्लिम) अर्थात् हथियार उठाना तो बहुत मजबूरी की बात है जबकि गैर मुस्लिम इस्लाम का खात्मा करने के लिए मुस्लिमों पर आक्रामक हो गए हों तभी मुसलमान को आत्मरक्षा मे युद्ध करने की इजाजत है और इस युद्ध मे भी न्याय का पूरा ध्यान एक मुस्लिम को रखने के निर्देश दिए गए हैं । कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो, महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो संक्षेप मे, जिहाद शान्तिप्रिय लोगों को कष्ट देने का नाम नहीं बल्कि जिहाद तो नाम है लोगों के कष्ट दूर करने को एक मुस्लिम द्वारा खुद कष्ट उठाने का ... जिहाद हर वो भलाई का काम है जिसे करने मे एक मुस्लिम को थोड़ा भी कष्ट उठाना पड़े ,और वो अल्लाह की रज़ा के लिए कष्ट उठाकर भी वो काम कर जाए ... ये है जिहाद , और समाज से बुराई मिटाने का प्रयास अर्थात् जिहाद एक सत्कार्य है, न कि कोई पाप ये अब आपके सामने भी स्पष्ट हो गया है ..!!

इस्लाम मे युद्ध की अनुमति आत्मरक्षा के लिए है,

अनेक लोगों मे इस्लाम के विषय मे एक भ्रम ये है, कि इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की इस्लाम मे इजाजत है, और स्वयं इस्लाम के पैगंबर स. ने इस्लाम को फैलाने के लिए काफिरों से युद्ध किए.... इस्लाम फैलाने के लिए तलवार उठाने की इसी इजाजत के कारण आज दुनियाभर मे अनेक सशस्त्र इस्लामी जिहादी संगठन पैदा हो गए हैं, जिन्होंने विश्व भर मे आतंक फैला रखा है .... ... जबकि असल बात ये है कि इस्लाम मे इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की कतई इजाजत नही है .... बेशक नबी स. ने अरब के काफिरों से युद्ध किए लेकिन वो युद्ध उन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए नही किए थे, बल्कि उन्हें वो युद्ध मजबूरन करने पड़े, इस्लाम को "बचाने" के लिए ! इस्लाम को फैलाना और इस्लाम को बचाना, दोनों बातों मे बड़ा फर्क है ... चौदह सौ वर्ष पहले के अरब मूर्ति-पूजक गैर मुसलिम समाज के व्यवहार की ओर हम ध्यान दें तो पता चलता है, वे अरब बड़े ही हिंसक प्रवृत्ति के लोग हुआ करते थे... इसी माहौल मे जब नबी स. ने मक्का के लोगों को इस्लाम की दावत देनी शुरू की, लोगों को नवजात बच्चियों की हत्या करने से रोकने लगे, गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने से लोगों को रोकने लगे , मूर्ति पूजा से लोगों को रोका और एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया और आप स. की इन बातों से प्रभावित होकर मक्का के कुछ गरीब लोगों और कुछ गुलामों ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो अरब के अमीर और प्रभावशाली वो लोग जो अपने हिंसक रीति रिवाज़ो से प्रेम करते थे, इस बात से चिढ़ गए ,और उन्होने उन गरीब नव मुस्लिमों को मार पीटकर उनका धर्म छुड़वा देना चाहा ताकि इस्लाम की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए लेकिन ऐसा न हुआ, उन गरीब मुसलमानों ने खुद को बुरी तरह प्रताड़ित किए जाने के बावजूद इस्लाम का त्याग न किया .. और उन नव मुस्लिमों का इस्लाम से इस कदर प्रेम देखकर अरब के गैर मुस्लिम और बौखला गए और मुस्लिमों पर और सख्ती से अत्याचार करने लगे ... लेकिन इसका असर उल्टा ही हुआ, और नव मुस्लिमों के मुंह से इस्लाम की प्यारी प्यारी तालीमात का जिक्र सुनकर इस्लाम कुबूल करने वालो की तादाद बढ़ती गई. लगभग 11 वर्ष तक मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार किए ..... उन्होंने अपने अनेक गुलामो के यातनाएँ देकर अंग भंग कर दिए क्योंकि उन गुलामो ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, और कुछ गरीब मुसलमानों को यातनाएँ दे देकर मार डाला....... लेकिन मुस्लिम शांति और इस्लाम के मार्ग पर अडिग रहे .... न मुस्लिमों ने पलटकर कभी किसी पर वार किया और न ही इस्लाम से हटे कई मुसलमान इन भयंकर तकलीफो से बचने के लिए प्यारे नबी स. की सलाह पर मक्का से बाहर ऐसी जगहों पर चले गए जहाँ वे शांति से अपने धर्म इस्लाम का पालन करते हुए जीवन गुज़ार सकें. और जब मक्का मे रहना एकदम दूभर हो गया और पैगंबर स. के कत्ल की कोशिशें मक्का के गैर मुस्लिम करने लगे तो पैगंबर मोहम्मद स. भी बाकी मुसलमानों के साथ मक्का से मदीना प्रस्थान कर गए लेकिन इसके बावजूद मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुसलमानों का पीछा नही छोड़ा, उन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ... और फिर मुस्लिमों के मदीना पहुंचने के दूसरे वर्ष, मक्का के काफिरो ने मुस्लिमों पर चढ़ाई कर दी , इसके पहले हमेशा मुस्लिमों ने काफिरो के अत्याचारों को पैगंबर स. के हुक्म पर चुपचाप बर्दाश्त कर लिया था, और यदि काफिरो की मुस्लिमों पर ये चढ़ाई केवल मुस्लिमों को बंदी बनाने, मुस्लिमो को मारने पीटने या मुस्लिमों की माल दौलत छीनने के लिए होती तो बात कुछ और होती, लेकिन अब तो सारे मुस्लिमों की हत्या कर के इस्लाम के खात्मे का अरमान लेकर काफिरो ने चढ़ाई की थी, अत: मुस्लिमों की जान की हिफाज़त के लिए और इस्लाम का अस्तित्व बचाने के लिए मुस्लिमों को आत्मरक्षा मे युद्ध की इज़ाज़त दी गई... इसके बाद भी पैगम्बर स. के जमाने मे काफिरो ने बार बार मुस्लिमों पर चढ़ाई की और मुस्लिमों ने सदा आत्मरक्षा मे और काफिरो से मुस्लिमों की जान बचाने के लिए बहुत मजबूर होकर तलवार उठाई न कि गैर मुस्लिमों को तलवार का भय दिखाकर जबरन मुसलमान बनाने के लिए क्योंकि इस्लाम मे ये बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी को विवश कर के इस्लाम कुबूल कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, अल्लाह जिसे चाहता है वो व्यक्ति केवल समझाने मात्र से मुस्लिम बन जाता है .... पवित्र कुरान मे लिखा है "अगर तुम्हारा रब्ब चाहता, तो इस धरती मे जितने लोग हैं, वे सारे के सारे ईमान ले आते . फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे ईमान वाले बन जाएं ?" [ पवित्र कुरान 10:99 ] रही बात इस्लाम के प्रसार की, तो उसके लिए केवल दो ही कारण उत्तरदायी थे, एक तो मुस्लिमों द्वारा इस्लामी शिक्षा के प्रवचन दिए जाना, और दूसरा मुस्लिमों के नए आचार व्यवहार, जिनसे प्रभावित होकर लोग स्वत: ही इस्लाम कुबूल कर लेते थे

आतंकवाद और इस्लाम: दो विपरीत ध्रुव

पिछले दिनों नाइजीरिया मे "बोको ह
राम" नाम के एक हराम संगठन ने वहाँ की तकरीबन 200 अबला लड़कियों को अगवा कर के इस कुकर्म को इस्लाम से जोड़ने की साजिश की बीबीसी के इण्टरव्यू मे मलाला यूसुफज़ई ने उन आतंकवादियो को मुसलमान मानते हुए उन्हें कुरान शरीफ पढ़ने की नसीहत की , यानि मलाला जैसी 15 साल की कमउम्र और अनुभवहीन लड़की को भी मालूम है कि आतंकवाद की मनाही है कुरान मे ..... हर उस मुस्लिम परिवार मे बच्चों को बहुत छुटपन से ही कुरान की शिक्षा दी जाती है जो परिवार धर्म से थोड़ा भी लगाव रखता है ... ऐसे मे कोई ये कैसे सोच सकता है कि मलाला जैसी कम उमर लड़की जो इस्लामी तालीम से ज्यादा झुकाव पश्चिमी तालीम की तरफ रखती है, उसे तो कुरान का ज्यादा ज्ञान है लेकिन उस से कहीं ज्यादा उम्र वाले मुसलमानों को कुरान का ज्ञान ही नही होगा और वो भी ऐसे मुसलमान जो कि इस्लाम के प्रेम मे मरने मारने की हद तक पहुंचने का दावा करते हों .... जाहिर है जब छोटे छोटे मुस्लिम बच्चों को भी इस्लाम की शांति की सीख का ज्ञान है तो फिर कोई परिपक्व बुद्धि वाला और इस्लाम से अतिरिक्त लगाव का दावा करने वाला व्यक्ति इस्लाम की इतनी अहम शिक्षा को न जानता हो ऐसा हो ही नही सकता ...... कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो, महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो कुरान की इन शिक्षाओ का पालन न करना हराम है .... और जबकि दुनिया भर के इस्लामी विद्वान बार बार बोको हराम और तहरीके तालिबान को चेता चुके हैं , कि ये आतंकवादी अल्लाह की आज्ञा की अवहेलना कर रहे हैं, और इस्लाम ने जिन कामों को सबसे ज्यादा बुरा गुनाह बताया है वो ही गुनाह ये आतंकी कर के दोजखी बन रहे हैं .... इसके बावजूद ये आतंकी संगठन अल्लाह की आज्ञा को फालतू मानकर अपनी दुष्ट मनमर्जी चलाये और फिर दावा करें कि वो ये इस्लाम के लिए कर रहे है तो इससे बड़ा झूठ मैं नहीं समझता कि कुछ और होगा ऐसे लोग या तो गैर मुस्लिम होते हैं, जो इस्लाम को बदनाम करने के लिए ये स्वांग रचते हैं , या यदि इनमे से कोई व्यक्ति पहले कभी मुस्लिम था भी तो अल्लाह की आज्ञा की जानबूझ कर और उद्दण्डता पूर्वक अवहेलना कर के समाज मे आतंकवाद फैलाने के कारण उसी दिन इस्लाम से खारिज हो चुके हैं जिस दिन इन्होंने पहली कोई हराम आतंकी वारदात कर के उसे इस्लाम से जोड़कर , इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश को अंजाम दिया था खुद ध्यान लगाकर सोचिए कि बोको हराम जैसे ये आतंकी संगठन अपने इस्लामी ज्ञान से भरपूर होने का दावा करते हैं .... और पश्चिमी शिक्षा के विरोध जैसे महत्वहीन मुद्दे पर पराई लड़कियों को अगवा करने और उनकी इज़्ज़त का सौदा करने जैसे नाकाबिल ए माफी बदतरीन गुनाह करते है.... जिनकी इस्लाम मे बहुत सख्त सजा है और हर मुसलमान को पता है कि इस्लाम मे औरत की इज्जत से खिलवाड़ को सबसे बड़ा और सबसे घिनौना पाप कहा गया है ... तो बोको हराम के इस हराम कारनामे को कोई इस्लाम से किस तरह जोड़ सकता है ?? स्पष्ट है कि ये बोको हराम या तहरीक ए तालिबान या फिर इन्डियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन मुस्लिमों के नही बल्कि मुस्लिमों के गैर मुस्लिम या बद अकीदा दुश्मनों के हैं मलाला जैसी कम उम्र लड़की से अभी इतनी गहरी सोच की आशा नहीं की जा सकती कि वो इस्लामी आतंकवाद के पीछे छिपी इस्लाम के दुश्मनों की गहरी साजिश को समझ सके मगर बाकी सबकी समझ को क्या हुआ है ??

हिन्दू शब्द का अर्थ ?

कभी कभी मै बड़ा दुखी हो जाता हूँ ये देखकर कि हिन्दू मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने के लिए कितनी अधिक जगहों पर झूठ के किले खड़े किए गए हैं अब देखिए अभी हमारे एक हिन्दू भाई ने हमसे कहा कि बाहर से मुस्लिम आये या अरबी आये तो उन्होंने यहाँ के लोगों की मुर्खता को, अथवा उनके काले होने को "हिन्दू" नाम दिया ...... ये प्रपंच मै काफी समय से देख रहा हूँ कि कुछ लोग ( विषेशकर आर्य समाजी ) ये सिद्ध करने मे लगे हुए हैं कि अरब के लोगों ने भारतीयों को हिंदू कहकर एक गाली दी है ...और हिंदू का अर्थ होता है..... मूर्ख, दास या फिर काला..॥
अवश्य ही ये आर्य समाजी इस बात से ध्यान भटकाने को ये प्रपंच रच रहे हैं, कि स्वयं आर्य जब विदेश से भारत आए तो यहाँ के मूल निवासियों को उन्होंने अनार्य, दास, शूद्र, राक्षस और असुर कहा था अब इन्हीं आर्य समाजियों मे से कोई मुझे ये बताए कि अरब के लोग क्या भारतीयों से अधिक गोरे होते हैं, जो उनको भारतीयों की त्वचा का रंग अनोखा लगा ?? मैंने तो यही देखा है कि अरब के लोगों की त्वचा का रंग भी भारतीय लोगों के समान ही होता है..... साथ ही अरब मे नितान्त काले रंग के हब्शी भी रहते हैं जिन्हें प्यारे नबी स.अ.व. ने गोरी चमड़ी वालों के समान ही श्रेष्ठ बताया था, और रंग, नस्ल या क्षेत्रीयता के आधार पर ऊंच नीच करने वालों की भर्त्सना की थी ... पवित्र कुरान मे भी मुस्लिमों के लिए स्पष्ट आदेश है कि किसी भी व्यक्ति को बुरे नाम से न पुकारो.... तो भला कोई मुस्लिम किसी को कैसे मूर्ख या काला या दास जैसे अभद्र नामो से पुकार सकता था ?? बेशक अरब लोगों ने ही इस देश को हिन्द कहा था ... हिन्द एक अरबी नाम है जो उस समय वहाँ भले घराने की लड़कियों के लिए प्रचलित था ... स्वयं पैगंबर की एक कजिन का नाम भी हिन्द था ॥ हिन्द का अर्थ अरबी मे है सौ ऊंटो का दल .... अरब मे ऊंट ऐश्वर्य और साधन सम्पन्नता का प्रतीक थे ..... इसलिए हिन्द भी एक नाम के रूप मे सुख ऐश्वर्य और अमीरी का प्रतीक है इसके अतिरिक्त हिन्द शब्द का एक और अर्थ है "तीर या तलवार" ..... अरबी डिक्शनरी मे ऐसे नाम का गूढ़ अर्थ है, ताकतवर और रक्षा करने वाला । जैसे मेरे ही घर वाले मुझे "सैफ" कहकर बुलाते हैं ... सैफ भी एक अरबी शब्द है, और इस का अर्थ भी तलवार है ... सैफ नाम का गूढ़ अर्थ भी ताकत वाला और रक्षक होता है ॥ जब अरब भारत आए तो उन्होंने सिन्ध की अपेक्षा इस देश को हिन्द कहना पसंद किया और ये नाम उन्होंने एक अच्छी भावना से ही दिया । हिन्द से जोड़कर ही भारत वासियों के लिए "हिन्दू" एवं "हिन्दी" का प्रयोग अरबवासी करने लगे जिसका अर्थ था कि सम्बन्धित व्यक्ति हिन्द देश का वासी है ...... अट्ठारहवी शताब्दी तक हिंदू शब्द किसी धार्मिक समूह के लिए प्रयुक्त नहीं किया जाता था, तब अरबवासी भारत के मुस्लिमों को भी हिंदू कहा करते थे .... बल्कि आज भी अरब मे भारतीय मुस्लिमों को हिंदी कहा जाता है .... खुद सोचिए भला यदि हिंद, हिंदी या हिंदू का अर्थ बुरा होता और विधर्मियों का मजाक उड़ाने को ये शब्द रचे गए होते तो यही शब्द अरब के लोग मुस्लिमों के लिए क्यों बोलते ???

मुता मैरिज इस्लाम का अंग नही

जिस तरह इस्लाम के खिलाफ बिल्कुल झूठा और अश्लील प्रचार कुछ कट्टरतावादी इस्लाम विरोधियों द्वारा किया जा रहा है, उससे ऐसा भ्रम बनाया जा रहा है जैसे सारी कुप्रथाओं का जनक, और सारी बुराइयों की जड़ इस्लाम ही हो, और इस्लाम की आलोचना कर के ही दुनिया से बुराइयों को मिटाया जा सकता है, ... पर इसके पीछे वास्तविकता ये है कि इस्लाम मे बुराइयों का शोर मचा कर वो लोग अपनी सोसायटी की कमियों को छिपाने की कोशिशें करते हैं, और अपनी सोसायटी की बुराइयों को आलोचना से बचाकर, उन्हें हमेशा चालू रखना चाहते हैं जैसे कुछ लोगों ने मुता मैरिज को बेस बनाकर इस्लाम पर ये आरोप लगाकर इण्टरनेट पर प्रसारित किया //.... क्या आप जानते हैं कि दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है, इस्लाम में “मुता” शादी शब्द ला कर वेश्यावृति को कानूनी जामा पहनाया गया है…. जिसे यात्री विवाह भी कहा जाता है..! ये एक प्रकार से अनुबंध आधार पर अल्पावधि विवाह है, और कुछ घंटों के लिए भी हो सकती है…! जहाँ हिन्दू धर्म में स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और उन्हें देवी तक की संज्ञा दी गयी है वहीँ इस्लाम में स्रियों को भोग-विलास की “मात्र एक वस्तु” बना रखने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है . नोट: इस्लाम को छोड़कर दुनिया के सभी धर्मों में चरित्रवान रहने पर जोर दिया गया है और वेश्यावृति को पाप मानते हुए उसे एक घिनौने अपराध की संज्ञा दी गई है…..// .... कितना अच्छा होता कि मेरा धर्म अच्छा और तुम्हारा धर्म बुरा के आरोप प्रत्यारोप मे पड़ने की बजाय इन भाईयों ने अपने समाज मे धर्म के नाम पर चल रहा स्त्रियों का दैहिक शोषण रोका होता ... हम तो यही समझते हैं कि हर धर्म अपने मूल मे पवित्र धर्म है, लेकिन ढोंगी धर्माधिकारियों ने निजी लाभों को पाने के लिए अश्लील और आपत्तिजनक चीजों को धर्म का जामा पहना दिया है ॥ बहरहाल, इस्लाम पर लगाए गए आरोप पर आते हैं, जैसा कि हम सब जानते हैं कि इस्लाम के नियम कोई एक दिन मे अवतरित नही हुए, बल्कि ये नियम 23 साल तक धीरे धीरे कर के लोगों के बीच लाये जाते रहे ताकि वे लोग एकदम अचानक से अपनी वर्षों की बनाई हुई पक्की आदतों के विरुद्ध कई सारे नियम देखकर बिदक न जाएँ, खुद में सुधार करने में अधिक मेहनत देखकर हतोत्साहित न हो जाएं, बल्कि ऐसा हो कि वो पहले कुछ अच्छी आदतें अपनाकर उनके अभ्यस्त हो जाएं, तब उनको नए सुधारों की प्रेरणा दी जाए ताकि उनका उत्साह ऊँचा बना रहे, और वे नित नए सुधार करते जाएँ... ..... यही मामला, तत्कालीन अरबी कुरीति मुताह के विरुद्ध भी लागू किया गया ..... मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज है जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था, वास्तव में ये स्वच्छन्द काम तृप्ति का एक तरीका था, जिसे अरब के लोगों ने विवाह का आवरण पहना दिया था.... जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया, इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें ... तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे .... सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है...!! और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए '' ..... तो सुन्नी इस्लाम में मुताह को पूरी तरह से हराम माना जाता है, परन्तु मुताह हराम होने की घोषणा से पूर्व जब मुताहः की मनाही की घोषणा नबी सल्ल० ने नही की थी व आप सल्ल० के सामने ही लोग मुताह विवाह किया करते थे, तो नबी सल्ल० अल्लाह का इस विषय में कोई आदेश अवतरित न होने के कारण इस विषय पर मौन रहते थे, इसी समय की कुछ घटनाओं का वर्णन कुछ हदीस साहित्य में है जिनके कारण मुस्लिमों का एक छोटा सा वर्ग भूलवश मुताह को इस्लाम में अनुमतिप्राप्त विवाह मान बैठा है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं कि प्रैक्टिकली वो लोग भी मुताह को व्यवहार में लाना सही नही समझते होंगे, क्योंकि मुताह अपनी प्रकृति में ही निर्लज्जता का बोध कराता है ख़ैर विश्व में मुस्लिमों की लगभग 95 फ़ीसद सुन्नी मुसलमानों की आबादी मुताह को पूरी तरह हराम मानती है, क्योंकि मुताह को हराम ठहराने वाली अहादीस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, जिस कारण मुताह को जायज़ समझने की भूल कोई बिरले ही करेगा

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

कुन फयाकुन का अर्थ

हमारे एक भाई साहब पूछ रहे हैं कि अल्लाह ने कायनात 6 दिन लगाकर क्यों बनाई , "होजा" कहकर तुरंत क्यों न बना दी जबकि यह तकनीक क़ुरआन सिद्ध है ?? . .
.... कमाल है भाई, अभी आपको ये समस्या है कि अल्लाह ने तत्क्षण ब्रह्मांड का निर्माण क्यों नहीं कर दिया, और अभी चन्द दिनों पहले आपको ही ये समस्या भी थी कि कुरआन में ब्रह्मांड के निर्माण की अवधि बहुत कम सिद्ध हो रही है, ..... याद कीजिये, आप ही ने कहा था कि क़ुरआन में अल्लाह का एक दिन कहीं 1000 साल, कहीं 10000 साल, और कहीं 50000 साल के बराबर बताया गया है, तो अगर इनमे सबसे बड़ी गणना भी लें तो भी 6 दिन में कायनात बनाने की अवधि केवल 3 लाख साल ठहरेगी जबकि विज्ञान के अनुसार सिर्फ़ धरती को ही अपने मौजूदा रूप में आने में करीब साढ़े पाँच अरब साल लगे। .... और तब मैंने आपको बताया था कि अल्लाह के नज़दीक एक दिन के अलग अलग टाइम पीरियड बताए गए हैं, इससे ये बात साबित होती है कि अल्लाह के नज़दीक "यौम" का एक फिक्स टाइम पीरियड नही है बल्कि अल्लाह जिस हिसाब से इन्हें घटाना बढाना चाहता है, घटा बढ़ा लेता है ... तो ब्रह्मांड के निर्माण के समय अल्लाह का दिन 50,000 साल से भी बहुत बड़ा हो सकना सम्भव है....!!! . . ..... भाई ये आपका "चित भी मेरी, पट भी मेरी" वाला हिसाब समझ नही आ रहा ?? आप वाक़ई जवाब जानना चाहते हैं या अपने सवालों में इंसान को उलझा कर खुद के ज़्यादा बुद्धिजीवी होने के अहम् की तुष्टि करना चाहते हैं ?? . ..... बहरहाल, जान लीजिये कि आपका सवाल तर्कसंगत नही है. ... सवाल कुरआन में कही गई बात पर होना चाहिए, न कि अपने अनुमानों पर... . ये सूरह यासीन (सूरह 36) की आयतें हैं .... "और उसने हमपर फब्ती कसी और अपनी पैदाइश को भूल गया। कहता है, "कौन हड्डियों में जान डालेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी?" कह दो, "उनमें वही जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया। वह तो प्रत्येक संसृति को भली-भाँति जानता है, वही है जिसने तुम्हारे लिए हरे-भरे वृक्ष से आग पैदा कर दी। तो लगे हो तुम उससे जलाने।" क्या जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया उसे इसकी सामर्थ्य नहीं कि उन जैसों को पुनः पैदा कर दे? क्यों नहीं, जबकि वह महान स्रष्टा, अत्यन्त ज्ञानवान है, उसका मामला तो बस यह है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उससे कहता है, "हो जा!" और वह हो जाती है" (आयत संख्या 78 से 82 तक) . . इन आयतों का अर्थ है कि अल्लाह हर प्रकार का कार्य, यहां तक कि कोई भी चमत्कारी कार्य करने के लिए भी सार्मथ्यवान है, और कोई भी काम ऐसा नही है जो अल्लाह न कर पाए, बल्कि वो जिस भी कार्य के करने की इच्छा करता है, केवल उसके आदेश देने भर पर वो कार्य स्वयमेव होने लगता है. ... यहां इन आयतों में तो कहीं ऐसा नहीं कहा गया कि अल्लाह कोई भी कार्य तुरत फुरत करता है, ... उल्टे इन आयतों में तो तुरत फुरत के ठीक विपरीत बात है कि काफ़िर अपनी मृत्यु के बाद कयामत में दोबारा ज़िंदा किये जाने की बात का मज़ाक उड़ा रहे हैं और उस बात पर अल्लाह ने उन्हें क़यामत आ जाने तक का इंतज़ार करने को कहा है.... . .... यानी यहां तो आयतें ये बता रही हैं कि अल्लाह को हर एक काम की सामर्थ्य प्राप्त है जिन कामों के लिए अल्लाह ने समय नीयत कर रखे हैं और समय आने पर अल्लाह द्वारा नीयत किया हुआ हर एक काम होकर रहेगा.... .... इन आयतों के आधार पर पता नहीं कौन से विज्ञान से आप ये अनुमान लगा रहे हैं कि अल्लाह ने हर काम तुरंत तत्क्षण पूरा कर देने की बात कही है.... .... ख़ैर अब से बात को ध्यानपूर्वक समझ लीजिए कि "कुन फ़याकून" का अर्थ अल्लाह के आदेश देने भर से नियति का तय हो जाना है, कि अल्लाह ने आदेश दे दिया तो फिर वो बात टल नही सकती... इसका अर्थ जबरन कुछ और न निकालिये .... धन्यवाद !!!

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

क़ुरआन में मोहकम और मुतशाबेह आयतें क्या हैं ?

 क़ुरआन में मोहकम और "मुताशाबेह" (इस शब्द में "त" को थोड़ा सा खींचा जाएगा इसलिये मैं "त" में आ की मात्रा लगा रहा हूँ, वैसे आमतौर पर मात्रा नही लगाते, क्योंकि "आ" की मात्रा के बराबर शब्द को नही खींचा जाता) आयतों के विषय में अपने हिसाब से समझकर सवाल उठाने वाले लोग सवाल करते हैं कि अल्लाह ने क़ुरआन को इंसानों की हिदायत के लिए नाज़िल करने का दावा किया है तो अल्लाह ने क़ुरआन में "मुताशाबेह" आयतें क्यों नाज़िल कीं जिनके बारे में अल्लाह कहता है कि इन आयतों को इंसान समझ ही नहीं सकता, सिर्फ़ अल्लाह समझ सकता है....!!!

.... ऐसी इंसान को न समझ आने वाली आयतें क़ुरआन में नाज़िल करके अल्लाह ने क़ुरआन के आसान होने की अपनी ही बात से अंतर्विरोध नही पैदा किया ??

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..... दरअसल ऐसा सवाल अरबी की बेसिक जानकारी भी न होने की वजह से लोग करते हैं, ... वरना थोड़ी बहुत अरबी की समझ रखने वाले भी जानते हैं कि "मुताशाबेह"  शब्द का अर्थ होता है "मिलती जुलती शक्ल वाली कोई चीज़" ... और मोहकम का अर्थ होता है "किसी चीज़ को मज़बूत या स्पष्ट बनाना", 

... इन नामों से ही ज़ाहिर हो जाता है कि क़ुरआन की इस आयत में बात क्या कही जा रही है, .... 

"वो अल्लाह ही है जिसने तुमपर अपनी ओर से किताब उतारी, उसमें कुछ मोहकम (सुदृढ़) आयतें हैं जो किताब का मूल और सारगर्भित रूप हैं और दूसरी मुतशाबेह, तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ हैं वो उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाल लें हालाँकि ख़ुदा के सिवा उनका असली मतलब कोई नहीं जानता, और जो लोग ज्ञान के पक्के वो कहते हैं, कि हम हर उस बात पर ईमान लाए, जो हमारे रब ही की ओर से हैं।" और चेतते तो केवल वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं (सूरह आले इमरान, आयत 7)

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 ..... असल में यहां अल्लाह का ये फ़रमान है कि मुताशाबेह आयतें जो अल्लाह के स्थान, परलोक, इंसान की मौत के बाद और इंसान के दुनिया में अस्तित्व लेने से पूर्व की स्थितियों के बारे में बताती हैं वो केवल मिसालों के माध्यम से कही गई बातें हैं और उनकी सही सही तस्वीर समझना इंसान के वश की बात इसलिए नही है क्योंकि इंसान ने कभी उन स्थितियों को अपनी आंख से नही देखा... तो ऐसी स्थितियों पर एक ख़ाका सा खींचा गया है जिसे पूरी तौर पर इंसान तभी समझ पायेगा जब वो मरने के बाद उन स्थितियों को खुद अनुभव कर लेगा... क़ुरआन में ये भी कहा गया है ये मुताशाबेह यानी मिसाली आयतें असल क़ुरआन नही हैं,

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.... असल क़ुरआन मोहकम आयतें हैं जो दुनिया में आदर्श तरीके से जीने के बारे में इंसान को हुक़्म देती हैं और इंसान को उन्हीं स्पष्ट आयतों पर ध्यान देना चाहिए, ... लेकिन लेकिन जिन लोगों के दिलों में टेढ़ है, यानी जो लोग शैतान के कब्जे में हैं वो मुताशाबेह आयतों को लेकर या मुसलमानों के साथ उपहास करते हैं, या उनको तरह तरह से बहकाने की कोशिश में लगे रहते हैं कि आयतों का गलत अर्थ निकालकर अल्लाह के बन्दों को राह से भटका सकें.

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.... तो ऐसा नहीं है कि इंसान मुताशाबेह आयतों को बिल्कुल ही नहीं समझ सकता, बल्कि परलोक के बारे में क़ुरआन में जो मिसालें दी गई हैं, उन आयतों से इंसान परलोक के विषय में कल्पना कर सकता है, पर उसकी ये कल्पना किस हद तक सही बैठी, इस बात का फैसला इस जीवन में नही हो सकता.... हां ये है कि बात को समझने लायक एक आइडिया उसको मिल जाएगा, 

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......ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि इंसान किसी भी अनजानी चीज़ के लिए अगर अनुमान लगाता है तो उस अनुमान को वो अपने किसी पुराने अनुभव के आधार पर लगाने की कोशिश करता है, पर अगर बताई जा रही चीज़ की मिसाल उस व्यक्ति की पहले से देखी गई किसी वस्तु से न मिलती हो तो व्यक्ति के लिए बताई जा रही वस्तु की पूरी तरह सही कल्पना करना सन्देहास्पद रहता है, ..... ये स्पष्ट है कि किसी अनदेखी चीज़ को बताने का सबसे सही तरीका यही होता है कि उसे उसकी जानी समझी चीज़ों की मिसाल देकर बात को समझाने की कोशिश की जाए, जिससे वो बात को काफी हद तक सही सही समझ सके... 

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...चौदहवीं शताब्दी में इब्नबतूता ने अपने देश के लोगों को अपने यात्रा वृतांत में देखे एक अनोखे फल के बारे में बताने की कोशिश की जो फल उनके देश में नही पाया जाता था और किसी ने नही देखा था, ....

.... इब्नबतूता ने लिखा कि "ये लकड़ी का फल इंसान की खोपड़ी जैसा दिखता है, इसमें भी दो आंखें और मुँह की बनावट दिखाई देती है, और इसमें इंसान के सर में लगे बालों की तरह ही बाल भी होते हैं...."

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.... क्योंकि इस फल जैसी कोई चीज़ उनके देशवासियों ने पहले देखी नही थी, सो उन्होंने मिलते जुलते उदाहरण से बात को समझाने की कोशिश की... हालांकि इस वर्णन से उनके देश के लोगों ने किसी फल कल्पना कर ही ली होगी, लेकिन वो कल्पना एक हद तक ही उस फल जैसी होगी, ... आपको बता दूं कि ये वर्णन इब्नबतूता ने नारियल के फल का किया था, वाक़ई में उन्होंने उदाहरण तो मिलता ही जुलता दिया था... लेकिन नारियल की असल तस्वीर उनके देशवासियों को तभी समझ आई होगी, जब उन लोगों ने नारियल को अपनी आंखों से देख लिया होगा....!!!

.... यही मामला मुताशाबेह आयतों का है... हमारे एक अनुमान लगाने लायक उदाहरण दे दिया गया है, बाक़ी पूरी असलियत उन बातों को साकार देख लेने के बाद समझ आ जाएगी

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...... अब क्योंकि हमारे ज़िंदा रहते न हम मौत के बाद की परिस्थितियों का अनुभव कर सकते हैं और न हमारे सांसारिक जीवन के लिये मौत के बाद के जीवन के दृश्यों को साकार देखना जरूरी ही है.... बल्कि हमारे सांसारिक जीवन के लिए परोपकार करते हुए जीना, सामाजिक न्याय और प्रेम का वातावरण बनाना और अपराधों पर अंकुश लगाना ज़्यादा ज़रूरी है, सो इन्ही सारे सांसारिक जीवन के लिए दिशानिर्देश देने वाली मोहकम यानी स्पष्ट आयतों के बारे में कहा गया कि असल क़ुरआन ये हैं और इन पर ही ध्यान देना और पूर्ण रूप में समझना ज़्यादा ज़रूरी है, सो ये आयतें स्पष्ट हैं ही !!!

बुधवार, 20 जनवरी 2021

इस्लाम में जाति भेद ??

 प्यारे नबी सल्ल. ने खुदगर्ज़ इन्सानों की बनाई ज़ात पांत और ऊंच नीच की भर्त्सना करते हुए फरमाया था कि "अल्लाह के नज़दीक सारे इन्सान उसी तरह एक बराबर हैं, जैसे कंघी के तमाम दांत एक बराबर होते हैं "

नबी सल्ल. की तमाम हयाते मुबारक (पवित्र जीवन) ही इंसानो के बीच नस्लभेद, ऊंच नीच, छोटे बड़े, और गुलाम और आका के बीच के नाइन्साफ फर्क को मिटाने मे गुज़री ... बल्कि अपने अंतिम हज के समय दिए अभिभाषण मे भी आप सल्ल. फरमा गए कि

"इसलाम मे न तो किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर कोई बड़ाई दी गई है, न किसी गैर अरबी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर बड़ाई दी गई है, और न काले को गोरे पर, बड़ाई अगर किसी को है तो उसको, जो तक़वा व परहेज़गारी का व्यवहार अपनाने मे दूसरों से आगे है ,"

यानी रंग, नस्ल, देश और वंश के कारण इस्लाम किसी व्यक्ति को दूसरों से बेहतर नहीं मानता, बल्कि उसे बेहतर मानता है, जिसके व्यवहार नेक हैं ,



इसके बावजूद आज भारतीय मुसलमानों को जात पांत और ऊंच नीच का विचार करते देखकर बड़ी मायूसी होती है कि कहाँ इस्लाम आया था दुनिया के तफरके (विभेद) मिटाने, और कहाँ खुद इसी दीन मे दुनिया के तफरके आकर पड़ गए हैं ॥


मुझे याद है एक दिन मेरे सबसे अजीज़ दोस्त ने मुझे फोन कर के पूछा कि क्या उसकी बिरादरी के लोगों को मस्जिद मे इमामत करने का हक नहीं है इस्लाम के हिसाब से ?? ... मैंने उसे कहा कि भाई, ये तो निरी जाहिलियत की बात हुई और ऐसी कोई इन्सानो के बीच फर्क पैदा करने वाली बात इस्लाम मे नहीं है ॥ दोस्त ने भारतीय मुस्लिमों के बीच बड़े प्रतिष्ठित मौलाना का नाम लेते हुए बताया कि उन्होंने ऐसा लिखा है कि अजलफ अर्थात् छोटी जाति के मुसलमानों को मस्जिद मे इमामत का अधिकार नहीं, ये अधिकार केवल अशरफ यानि उच्च जाति को है ... जब मैने इस विषय मे खोजबीन की तो ये खबर सही पाकर मुझे बड़ा धक्का पहुंचा कि आखिर उन मौलाना ने क्या सोचकर ऐसी बेबुनियाद बात इस्लाम पर थोपी जिसका इस्लाम से बिल्कुल ही ताल्लुक नहीं था ???

अफसोस, कि ज़ात पांत के ऐसे ही न जाने और कितने ही बेबुनियाद खयालात आज मुसलमानों के बीच फल फूल रहे हैं ।


वैसे एक बात पूरे दावे से कही जा सकती कि बर्रे सगीर के मुसलमानों मे ज़ात पांत की घुसपैठ पूरी तरह से भारतीय समुदाय से प्रेरित है , कि जिस तरह भारत मे ब्राह्मण दैवीय अंश के कारण, व क्षत्रिय शासक होने के कारण सवर्ण माने गए, और सेवक और शासित हेय जाति के, ठीक वैसे ही भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिमों मे भी नबी सल्ल. के वंशजों को और भारत पर शासन करने वाले मुगल, पठान, तुर्क और अरबों को ऊंची कौम मान लिया गया और भारत की ही छोटी और सामान्य जातियों से धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम बने लोगों को छोटी कौम का माना जाने लगा, जबकि ऐसी मान्यताओं को मानना सरासर गैर इस्लामी बात थी ॥

वैसे इस्लाम की अनेकानेक शिक्षाओं के कारण मुस्लिमों मे जात पांत के आगमन के बावजूद छुआछूत, और खाने पीने मे अलगाव जैसी बुराइयां नहीं आ सकीं, फिर भी जो थोड़ा बहुत आया भी है, यानी तथाकथित ऊंची मुस्लिम जातियों का घमण्ड, और स्वयंघोषित नीची मुस्लिम जातियों की गुटबाजी, ये भी इस्लाम मे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं ...

इस्लाम समस्त मानव जाति को एक समान पवित्र मानता है और मनुष्य की अच्छाई और बुराई का निर्णय केवल उस मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मो के आधार पर लेता है, इसलिए किसी भी मुस्लिम को अपनी जाति पर बेजा घमण्ड हो, या किसी मुस्लिम के मन मे जाति को लेकर गुटबन्दी का ख्याल हो तो बिना रत्ती भर के शक के वो आदमी इस्लाम और नबी सल्ल. की तालीम की तौहीन करने का गुनाहगार है


इस्लाम मे नस्लभेद पैदा होने की शुरुआत सम्भवत: इस विचार से हुई कि पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. के वंशजो के शरीर मे पैगंबर मोहम्मद के रक्त का अंश मिला होने के कारण वे दैवीय आशीर्वाद से पवित्र होते हैं .... जबकि पैगंबर के वंश से अलग कोई व्यक्ति उतना पवित्र और श्रेष्ठ नही हो सकता... अल्लाह भी शेष मुसलमानों से ज्यादा नबी सल्ल. के वंशजों से प्रेम करता है, इसीलिए दुरूद शरीफ़ मे सारे मुस्लिमो को नबी सल्ल. के साथ आप सल्ल. के वंशजों के लिए भी दुआ करने का आदेश है, अत: नबी सल्ल. की आल (वंश) जिन्हें "सय्यद" कहा जाता है वो अल्लाह की नजर मे बाकी मनुष्यों से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ हैं ...

लेकिन क्या ये बातें नबी सल्ल. द्वारा दी गई इस्लामी तालीम के अनुरूप ठहरती हैं ??? 


... ज़ात बिरादरी की ये बातें मुसलमानों को इस्लाम की रूह से ही नाआश्ना किए डाल रही हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि कुरआनी लुगत मे "आल" के मानी क्या हैं ये समझा जाए, और ये जाना जाए कि वो आले मुहम्मद सल्ल. कौन हैं, जिन पर बरकतों और रहमतों के नाज़िल होने की दुआ हम रोज़ दुरूद शरीफ़ मे किया करते हैं ॥


दरअसल, शब्द "आल" को हमारे भाईयों ने बड़े संकुचित अर्थ मे लिया है ... कुरआन पढ़िए तो पाएंगे कि हकीकत मे कुरआनी अलंकरण मे "आल" का मतलब सिर्फ किसी की जैविक संतान नहीं बल्कि जब ये शब्द "आल" विशेषकर किसी कौम के सरदार, किसी लीडर या किसी महात्मा से जोड़कर बोला जाए, तो समझ लीजिए कि उस सरदार के समस्त अनुयायियों को उस सरदार की आल कहा गया है 

उदाहरण के लिए देखिए कुरान 40:46 मे फिरऔन की आल को मौत के बाद दण्ड का ज़िक्र है, लेकिन इस्लामी ज्ञान रखने वाले दोस्त जानते होंगे कि फिरऔन नि:संतान था और फिरऔन की पत्नी एक पुण्यात्मा थी, यानी यहाँ न फिरऔन की जैविक संतानों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है, न उसके परिवार को बल्कि फिरऔन के उन अनुयायियों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है जो फिरऔन के आदेश पर निर्दोष मासूमो की हत्या और जनता पर भयंकर अत्याचार किया करते थे ... और अल्लाह ने इन्हीं अनुयायियों को कुरआन मे फिरऔन की आल कहा है ॥


अत: ये भी स्पष्ट है कि दुरूद पाक मे जो दुआ हम करते हैं, वो सिर्फ नबी सल्ल. और उनकी संतानों के लिए नहीं, बल्कि नबी सल्ल. और नबी सल्ल. के समस्त आज्ञाकारी अनुयायियों के लिए करते हैं ॥


ये तो बात हुई कि दुरूद शरीफ़ मे केवल नबी की संतानें ही नहीं बल्कि वे सारे मुस्लिम शामिल हैं जो भले कामों के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, फिर चाहे वो किसी भी वंश से हों और उनका नबी सल्ल. के खानदान से दूर दूर तक का वास्ता न हो

इसके बरअक्स ये भी सोच का विषय है कि क्या नबी सल्ल. के वंशज अनिवार्य रूप से पवित्र और श्रेष्ठ हैं, और इसलिए अनिवार्य रूप से दुरूद शरीफ़ मे शामिल हैं ?? 


नबी के वंशज चाहे पापी ही क्यों न हों, अल्लाह उनसे विशेष प्रेम रखता है, ऐसा निराधार भ्रम पालने वालों को मैं याद दिलाना चाहूंगा कुरान मे एक बड़े नबी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बेटे का ज़िक्र, जो कि पापी था, और इसलिए जब वो जल प्रलय मे डूबा और हज़रत नूह ने अल्लाह को ये कहते हुए पुकारा कि ऐ अल्लाह मेरा बेटा मेरे घरवालों मे से था, ... तो अल्लाह की ओर से जवाब आया कि वो आपके घरवालों मे से नहीं था, और ऐसी बात न कहिए जिस बात का आपको ज्ञान न हो [कुरआन 11:46] ... यानि इस महान किताब मे अल्लाह ने खुद स्पष्ट कर दिया है कि अल्लाह किसी व्यक्ति को रक्त और वंश के आधार पर प्रेम और आशीर्वाद नहीं देता, बल्कि अल्लाह तो नबियों की जैविक सन्तानो को भी नबी का सम्बन्धी नहीं मानता, यदि ये सन्ताने पाप मे लिप्त रहती हों, ... तो स्पष्ट है कि कोई भी पापी व्यक्ति जिसका रक्त सम्बन्ध हकीकत मे नबी सल्ल. से हो भी, वो नबी की आल नहीं है अल्लाह के नज़दीक, जब तक वक्त रहते तौबा न कर ले ...॥


अल्लाहु आलम ॥

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

जन्नत की हूर : आध्यात्मिकता में भोग की बातें क्यों ?

 आपत्ति : इस्लाम में व्यक्ति को जन्नत में  हूर अर्थात "सेक्स स्लेव" देने का लालच दिया जाता है, एक सवाल तो ये है कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भोग की ये बात क्यों ? और दूसरी बात ये कि यहां भी स्त्री पुरूष में पक्षपात दिखता है है, इस्लामी जन्नत में केवल पुरुषों को ही हूरें देने का वादा क्यों है, जन्नत में स्त्रियों के लिये जन्नत में बहत्तर तगड़े पुरुषों का वादा क्यों नही किया जाता...??


उत्तर : सबसे पहले तो ये जान लीजिये कि हूर का मतलब सेक्स स्लेव बिलकुल नहीं होता... कटाक्ष करने वाले लोगों को बता दूं कि 72 हूरों का ज़िक्र क़ुरान में कहीं भी नही है, ये एक झूठी बात है जिसे इस्लाम विरोधियों ने ही फैलाया है, (क़ुरआन के बाद सही बुख़ारी, व सही मुस्लिम में भी 72 हूरों वाली कोई हदीस नही, इसके अतिरिक्त जहाँ कुछ रिवायतों में 72 हूर का ज़िक्र है, विद्वानों के अनुसार वे रिवायतें ज़ईफ़ हैं, अर्थात उनकी प्रमाणिकता संदेहास्पद है..)

..... इस्लाम के अनुसार सही बात ये है कि नेक व्यक्तिओं जिनकी मौत विवाह से पहले हो गई थी जन्नत में उनका विवाह जन्नती स्त्रियों से करवा दिया जाएगा, जिन नेक व्यक्तियों के विवाह हो गए थे, तो उन प्रेमी पति पत्नियों को जन्नत में एक दूसरे से मिला दिया जाएगा, तो देखिये जिस तरह विवाहित पुरुषों को हूर के रूप में उनकी प्रिय पत्नी मिल जाएंगी, उसी तरह विवाहिता स्त्रियों को हूर के रूप में उनके सांसारिक जीवन के प्रेमी पति मिल जाएंगे, 

..... रही कुँवारेपन में देह त्याग कर चुकी नेक लड़कियां तो उनके विवाह भी जन्नती पुरुषों से कर दिए जाएंगे... क्योंकि क़ुरान में वर्णित शब्द हूर का अर्थ है सुन्दर आँखों वाला साथी, हूर शब्द का कोई स्पेसिफिक जेंडर नही है, पुरुषों के परिप्रेक्ष्य में हूर शब्द स्त्रियों के लिए प्रयुक्त होगा और स्त्रियों के परिप्रेक्ष्य में हूर शब्द पुरुषों के लिए प्रयुक्त होगा.... यानी "हूर" का  मतलब केवल स्त्री नही है... हूर पुरूष भी हो सकता है !!

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.... दूसरी ओर आप लोग इस सम्बन्ध में सबसे ऊपर "सम्भोग" की बात को रखते हैं... जबकि सोचिये कि यदि आपके विवाह को दो तीन वर्ष हो चुके हैं, तो क्या आज भी आप अपनी पत्नी को "सेक्स डॉल" के ही रूप में देखते हैं ?? आप अपनी पत्नी को बिलकुल इस शक्ल में नही देखते होंगे, क्योंकि विवाह के कुछ ही समय बाद सम्भोग दम्पति के लिये गौड़ विषय हो जाता है, उसकी जगह उनके लिए भावनात्मक सम्बन्ध ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, साथ रहकर जीवन के उतार चढ़ाव को पार करने का आनन्द महत्वपूर्ण हो जाता है, साथी द्वारा दूसरे साथी के लिए बढ़ती जाती सहानुभूति की भावना का सुख महत्वपूर्ण हो जाता है, एक दूसरे से कह सुनकर दिल हल्का करने की सुविधा महत्वपूर्ण हो जाती है .....

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..... कहीं आप ये तो नही सोचते कि वृद्ध दम्पति में से एक के मरने पर दूसरा इसलिये रोता है कि अब वो सम्भोग किससे करेगा/करेगी...?? ऐसा नहीं है क्योंकि वृद्धावस्था में अधिकांश लोगों की सेक्स क्षमता क्षीण हो जाती है और, वे सेक्स की ज़रूरत भी कभी महसूस नही करते, तब एक साथी के मरने पर दूसरा इसलिये रोता है कि उसके सुख दुःख का साथी बिछड़ गया है....

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....... ये है दुनिया में वैवाहिक संबंध का सही रूप जहाँ जीवन बहुत थोड़ा है, और इस थोड़े से समय में सेक्स को लेकर उत्तेजना और उत्साह का समय उससे भी बहुत बहुत छोटा... अब इसके बाद सोचिये ऐसे जीवन और ऐसे सम्बन्ध के बारे में, जो कि अनन्त हो, ..... क्या ऐसे सम्बन्ध में व्यक्ति को केवल सेक्स का ही लालच दिखेगा ?? तब, जब सांसारिक जीवन में उनमे से अधिकांश व्यक्तियों के लिए सेक्स गौड़ विषय हो चुका हो....?

.. माफ़ कीजिये पर यदि जन्नती विवाह के नाम पर केवल सेक्स ही सेक्स आपके मस्तिष्क में घूमने लगता है तो खुद आप ही यौन कुंठा के शिकार हैं... क्योंकि क़ुरआन कहीं जन्नत में सेक्स करने का वर्णन नहीं करता... क़ुरआन और अहादीस स्पष्ट करती हैं कि सांसारिक जीवन की तमाम गंदी और घृणित चीज़ों का अस्तित्व जन्नत में नही होगा... जन्नत में जो कुछ होगा उसका स्वरूप पवित्र होगा ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि जन्नत में पति पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्धों का स्वरूप सांसारिक जीवन के स्वरूप जैसा नही होगा, बल्कि कुछ अलग ही अकल्पनीय ढंग का होगा, जो स्वरूप पूरी तरह पवित्रता से भरा होगा... इन बिंदुओं पर गौर करने के बाद आपको जन्नती दाम्पत्य में शुद्ध भावनात्मक प्रेम ही दिखेगा कोई अशोभनीय बात न दिखेगी ... पूर्वाग्रहों को परे रख, सोचकर तो देखिये !!!

सोमवार, 18 जनवरी 2021

क़ुरआन की कम्पाइलिंग कब हुई ?

 अक्सर कुछ हदीसों की बुनियाद पर ये कहा जाता है कि क़ुरआन नबी सल्ल० के ज़माने में एक किताब की शक्ल में नही लिखा गया था और क़ुरआन की सूरतों के पढ़ने या याद करने के लिए भी कोई क्रम नही था, नबी सल्ल० की वफ़ात के कई साल बाद जाकर क़ुरआन को एक किताब की शक्ल देने की कोशिश की गई और लकड़ी, चमड़े, हड्डी वगैरह पर लिखी आयतों को ढूंढ कर एक किताब में लिखा गया... इस बीच क़ुरआन की कई आयतों के खो जाने की हदीसें भी मिलती हैं और ये हदीसों में मिलता है कि अलग अलग प्रकार की क़ुरआन लिख ली गई थीं, जिन्हें बाद में हज़रत उस्मान रज़ि० ने जलवा दिया था... ऐसे में क़ुरआन की विश्वसनीयता का क्या प्रमाण रह जाता है ?? 

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उत्तर- ये एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है कि नबी सल्ल० के सामने क़ुरआन एक किताब की सूरत में नही लिखा गया था... असलियत इसके उलट है, मैं हमेशा आपसे कहता हूं कि पहले क़ुरआन पढ़िये और फिर हदीसों को क़ुरआन की बात के मुताबिक़ समझिये, और क़ुरआन के मुताबिक बात कहने वाली हदीसों को कुबूल कीजिये और क़ुरआन से टकराने वाली बातों को छोड़ दीजिये....

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... क़ुरआन में सूरह क़ियामा, सूरह नम्बर 75 की 16 से 19 तक आयतों को पढ़िये "(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो ! उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है ! तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह उस किरअत की इत्तेबा करना ! फिर उस के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है"


... मौलाना हमीद्दुदीन फ़राही के मुताबिक़ यहां अल्लाह ने नबी सल्ल० को ये भरोसा दिलाया है कि जो काफ़िर इस क़ुरआन के एक ही बार में पूरा न नाज़िल होने का ताना देते हैं, उनके तानों से रसूल परेशान न हों बल्कि इस किताब का जमा करना (यानी सारी आयतों को एक जगह एक तरतीब से रखना) फिर किरअत करना/पढ़वा देना (यानी नई तरतीब के साथ याद भी करा देना) अल्लाह ने अपने ज़िम्मे लिया है और नबी सल्ल० की ज़िंदगी में ही ये काम कर देने का भरोसा अल्लाह ने उन्हें उसी दौर में दिला दिया था, जब आप सल्ल० मक्का में ही थे और मदीना तशरीफ़ नही लाये थे.... ज़ाहिर है जिब्रील नबी सल्ल० के ज़रिये ही अल्लाह की बात दुनिया तक पहुँचाते थे, सो अल्लाह के ये तमाम वादे नबी सल्ल० के ज़माने में ही पूरे होने ज़रूरी थे,

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 .... क़ुरआन की इन आयतों को देखने के बाद अब हदीसों को देखिये.... बुख़ारी शरीफ़ किताब 61, हदीस नम्बर-519 और 520 पर दर्ज हदीसें देखिये कि "हर साल रमज़ान में नबी सल्ल० के सामने जिब्रील क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा करते थे, फिर आप सल्ल० उसे पूरा पूरा जिब्रील को सुनाया करते थे और जिस साल आप सल्ल० की वफ़ात हुई उस साल नबी सल्ल० ने दो बार पूरे क़ुरआन पाक को जिब्रील अलैहिस्सलाम के सामने दोहराया" तो पक्के तौर पर इस बात पर मुहर लग जाती है कि ये क़ुरआन को एक नई तरतीब से जमा करके, नबी सल्ल० के सामने वो किरअत पढ़कर आप सल्ल० को याद करा देने के अल्लाह के उसी वादे पर अमल था जो वादा क़ुरआन की सूरह क़ियामा मे मौजूद है,

 .... यही किरत और तरतीब आप सल्ल० ने तमाम सहाबा को भी बताई और अनगिनत सहाबा ने इसे पूरा पूरा क्रमवार याद कर लिया, 

.... इसके अलावा बुख़ारी शरीफ़ किताब-61, हदीस-525 में ये भी मिलता है कि उबई इब्ने क़ाब, मुआज़ बिन जबल, ज़ैद बिन साबित और अबू ज़ैद, इन चार अंसारी सहाबियों ने नबी सल्ल० के ज़माने में ही क़ुरआन को जमा कर लिया था.... 

....जबकि दूसरी अहादीस से मालूम चलता है कि क़ुरआन की आयतों को नबी सल्ल० के हुक़्म पर लिखने वाले कातिबों की तादाद कहीं ज़्यादा थी, तो सिर्फ इन चार लोगों का ज़िक्र क्यों ?? मालूम चलता है कि यहां पूरी क़ुरआन को जमा करके एक किताब की शक्ल देने का ज़िक्र है, न कि चन्द सूरतों को, और क्योंकि ज़ैद बिन साबित रज़ि० उस वक्त नबी सल्ल० के साथ होते थे जब आप सल्ल० जिब्रील को नई तरतीब के साथ क़ुरआन सुनाते थे, तो हम समझ सकते हैं कि ज़ैद बिन साबित और बाक़ी तीनों अंसारी सहाबा ने भी क़ुरआन के जमा करते वक्त नई तरतीब का एहतमाम किया था, तो इस तरह क़ुरआन अपनी मौजूदा तरतीब के साथ ही नबी सल्ल० के सामने ही किताब की शक्ल में भी मौजूद था और इसी तरतीब के साथ सैंकड़ों की तादाद में सहाबा को हिफ़्ज़ तो था ही...

 ... और आप सल्ल० ने हज्जतुल विदा में इसी किताब के भरोसे फ़रमाया था कि तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक तो अल्लाह की किताब और दूसरे अपनी सुन्नत, इनको मज़बूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह न होगे" ....

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.... और जब अलग अलग जगह लिखी हुई और सैंकड़ों सहाबा की स्मृति में क़ुरआन की सारी आयतें महफ़ूज़ थीं तो अलग अलग स्थानों पर रखी आयतों के खो जाने की हदीसों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, उनसे क़ुरआन की सम्पूर्णता को कोई फ़र्क नही पड़ता....!!

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 ....अब सवाल उठता है कि बुख़ारी की हदीस में फिर क्या लिखा है कि यमामा की जंग में जब बड़ी तादाद में क़ुरआन को बाय हार्ट याद करने वाले सहाबियों की शहादत हो गई तब ये डर दरपेश आया कि कहीं क़ुरआन न खो जाए इसलिए उसे लिखकर रख लेने का आइडिया आया....??

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..... देखिये, दरअसल वहां मामला क़ुरआन की आयतों के खो जाने का नही था, क्योंकि हदीसों के मुताबिक़ ही क़ुरआन तो किताब की शक्ल में नबी सल्ल० के ज़माने से ही मौजूद थी, तो यमामा की जंग के बाद के मौक़े पर क़ुरआन के खोने का नही बल्कि क़ुरआन के असल डायलेक्ट, जिसमें वो नाज़िल हुआ था उसके संरक्षण की फ़िक्र का मामला था.... यमामा की जंग में शहीद होने वाले सहाबियों के लिये हदीस में लफ़्ज़ "क़ुर्रा" आया है, जो लफ़्ज़ 'क़ारी' का बहुवचन है, और क़ारी का मतलब होता है वो शख्स जो क़ुरआन को विशेष लहजे और उच्चारण के  साथ यानी एक विशेष बोली में पढ़ सकता है, यानी ये शहीद वो लोग थे जिन्हें आप सल्ल० ने विशेष ढंग से क़ुरआन की किरअत सिखाई थी... दरअसल उस समय अरब में सात अलग अलग प्रकार की अरबी बोलियां (किरअतें) प्रचलित थीं .... ऐसा हर एक भाषा में होता है, हमारी हिंदी में भी अनेकों बोलियां प्रचलित हैं जिनमें एक ही शब्द को अनेकों तरह के उच्चारण के साथ बोला जाता है पर उससे उसका अर्थ नहीं बदलता, उदाहरण के लिए "विश्वास" शुद्ध हिंदी का शब्द है, लेकिन इसी शब्द के दूसरे डायलेक्ट "बिस्वास" को हमारे देश में बड़ी संख्या में बोला जाता है, इससे शब्द का अर्थ नहीं बदलता, लेकिन उच्चारण बदल जाता है और अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलने वाला व्यक्ति देहात के किसी व्यक्ति को इमला बोलकर "विश्वास" लिखवाए तो अपनी आदत और सुविधा के कारण लिखने वाला व्यक्ति "बिस्वास" ही लिख देगा, हालांकि उससे कहा गया मैसेज नही बदलेगा, यही मामला क़ुरआन के साथ था, अरब में उस समय थोड़े थोड़े फ़र्क के साथ सात तरह की किरअत यानी बोलियां प्रचलित थीं, और जब वो सहाबा जिन्होंने क़ुरआन कंठस्थ किया था वो दूर के क्षेत्रों में जाकर कातिबों को क़ुरआन सुनाते तो क़ातिब कई स्थानों पर नेचुरली अपने उच्चारण के अनुसार किसी शब्द को लिख दिया करते थे, इससे अमूमन क़ुरआन की बात में कोई फ़र्क नही आता था, ... नबी सल्ल० के करीबी सहाबा ने जब इन अलग ढंग से कहे जा रहे शब्दों पर नबी सल्ल० का ध्यान दिलाया तो ग़ालिबन नबी सल्ल० ने ये कहा कि जिस किरअत में लोगों को ज़्यादा सुविधा हो रही है, उसी में उन्हें पढ़ने दो, क्योंकि क़ुरआन की बात तो बदल नही रही, इसलिए ये कोई बिग डील नहीं है... पर हदीस में लिखे जाने के वक्त तक आप सल्ल० की उस बात को इतना बदल दिया गया कि हदीस में बात ये लिख दी गई कि क़ुरआन सात अलग अलग किरअतों में नाज़िल हुआ है, जो बात सही नहीं है...!!

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.... बहरहाल, यमामा की जंग के बाद की हदीस पर आते हैं.... तो बुख़ारी शरीफ़ की किताब-61, हदीस-509 के मुताबिक हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने मिलने बुलाया, और जब वो हज़रत अबु बक्र रज़ि० के पास पहुँचे तो वहां हज़रत उमर रज़ि० भी मौजूद थे, हज़रत अबू बक्र ने हज़रत ज़ैद से फ़रमाया कि यमामा की जंग में बहुत बड़ी तादाद में कारियों (कुर्रा) की शहादत हुई, और अंदेशा ये है कि आनेवाले वक्त में जो जंगें होंगी उनमे और ऐसे किरअत जानने वाले लोगों की शहादत हो सकती है जो अभी ज़िंदा हैं, जिससे क़ुरआन का एक अहम हिस्सा (यहां मुराद उस किरअत से है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ था, और इसे ही नबी सल्ल० ने सहाबा को सिखाया था) हमसे खो न जाये, इसलिये ऐ ज़ैद क्योंकि आप सच्चे इंसान हैं और नबी सल्ल० के लिए क़ुरआन लिखा करते थे, इसलिए आप उन आयतों को ढूंढिये (जिन्हें पहली बार नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था और आप सल्ल० ने उनको सुनकर उसकी किरअत की तस्दीक की थी, ताकि उन सब आयतों को इकट्ठा करके मास्टर कॉपी के तौर पर सुरक्षित कर लिया जाए और उसी किरअत के आधार पर क़ुरआन की और कई प्रतियां तैयार कर ली जाएं जिनको पढ़कर जल्द से जल्द और नए क़ारी तैयार हो सकें....

..... सोचकर देखिये कि जब इसी हदीस के मुताबिक़ क़ुरआन को पूरा कंठस्थ करने वाले बहुत से क़ारी अभी ज़िंदा हैं और बुख़ारी 61-525 के अनुसार क़ुरआन को नबी सल्ल० के ज़माने में ही जमा कर लेने वाले ज़ैद बिन साबित रज़ि० से मुखातिब हुआ जा रहा है, तब क़ुरआन की मूल आयतों की खोज का मक़सद सिवाय इसके क्या हो सकता है कि कुरआन की असल डायलेक्ट की तस्दीक की जाए, क्योंकि इस हदीस में क़ुरआन की किसी आयत के खो जाने का तो कहीं ज़िक्र है नही )

... ज़ैद बिन साबित ने शुरू में इस बात की ज़रूरत न होने की बात कही कि जब नबी ने अपनी ज़िंदगी में ये काम नहीं किया (किसी एक किरअत को रखने का आग्रह नही किया) तो हम लोग क्यों ऐसा करें ?? लेकिन बाद में ज़ैद बिन साबित मान गए, और क्योंकि उन्होंने क़ुरआन को बाय हार्ट याद भी किया था और पूरी लिखी हुई भी उनके पास मौजूद थी जिसमें बस कहीं कहीं डायलेक्ट/किरअत का हल्का सा फ़र्क हो सकता था सो अपनी और अन्य सहाबा की याददाश्त और पास मौजूद क़ुरआन की प्रति के आधार पर उन्होंने क़ुरआन की प्रत्येक उस आयत को ढूंढ लिया जिसे नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था, आख़िर में सूरह तौबा की कुछ आयतें जिनका ज़ैद बिन साबित रज़ि० को नबी सल्ल० द्वारा किरअत किया जाना याद था, वो कहीं नहीं मिलीं, और जाकर हज़रत अबी खुज़यमा रज़ि० के पास मिलीं, और जब इस तरह पूरा क़ुरआन शरीफ़ इकट्ठा हो गया तो इस पूरे ज़खीरे को हज़रत अबू बक्र के पास रखवा दिया गया, (क्योंकि ये खोज क़ुरआन के अहम हिस्से, उसकी असल किरअत के खो न जाने के डर से की गई थी, इसलिये इसकी बहुत सारी कॉपियां इसी समय बनाना ज़रूरी था, जो कि लगातार इस मास्टरकॉपी की मदद से बनवाई गईं) हज़रत अबु बक्र रज़ि० की वफ़ात के बाद ये हज़रत उमर के पास रहा और फिर हज़रत उमर के बाद बीवी हफ़सा रज़ि० के पास इसे महफ़ूज़ रखा गया....!!!

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... अब हमें ये मालूम है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में क़ुरआन की सारी मूल आयतों को एक जगह जमा करके रख दिया गया था, .... पर क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी अलग अलग वक्त की दो हदीसें मौजूद हैं जिनमें ज़ैद बिन साबित पर क़ुरआन की तरमीम का ज़िम्मा डाला गया था, एक हदीस यमामा के जंग के बाद की है और दूसरी इसके कई साल बाद हज़रत उस्मान की खिलाफत के दौर में इराक़ और शाम के लोगों में क़ुरआन की किरअत को लेकर इख़्तिलाफ़ के अंदेशे के वक़्त की.... दोनों अहादीस में रावियों ने हज़रत ज़ैद से एक ही बात कहलवाई है कि हमें नबी सल्ल० के वक्त में अलग अलग चीज़ों पर लिखी गई तमाम आयतें मिल गईं, मगर क़ुरआन की कुछ आयतें जो मुझे नबी सल्ल० की किरअत में याद थीं वो कहीं नही मिलीं, और आख़िरकार हज़रत खुज़यमा रज़ि० के पास वो मिलीं... फ़र्क़ इतना है कि पहली हदीस में अबी खुज़यमा रज़ि० के पास से मिली आयतें सूरह तौबा की बताई गई हैं और दूसरी हदीस में खुज़यमा बिन साबित रज़ि० के पास से सूरह अहज़ाब की"....

... लेकिन जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में सारी मूल आयतें इकट्ठा कर ली गई थीं, और उन्हें एक जगह सुरक्षित रख दिया गया था तो उन्हें दोबारा ढूंढने का सवाल कैसे उठता है ?? चाहे कोई भी आयत हो, हज़रत अबू बक्र के ज़माने की हदीस में बताया गया है कि तमाम आयतें मिल गई थीं.... यानी हज़रत ज़ैद बिन साबित का ये क़ौल पहली ही बार यानी हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने का है, रावियों ने जिसका वक्त भी गड्डमड्ड किया और आयतों के नाम भी और आयतें जिन सहाबियों से मिलीं उनके एक से नाम ज़ाहिर करते हैं कि ये एक ही बात एक ही सहाबी का ज़िक्र है जिसे ठीक से याद नहीं रखा गया

.... इसी तरह बुख़ारी किताब-61, हदीस-510 में लिखा है कि हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़माने में जब ज़ैद बिन साबित रज़ि० और दूसरे कातिबों को क़ुरआन की प्रतियां बनाने के लिए उस्मान रज़ि० ने नियुक्त किया तो बीवी हफ़सा रज़ि० से उन्होंने वो मास्टर कॉपी मंगाई जिसे हज़रत अबू बक्र के ज़माने में जमा किया गया था, इसके बाद हज़रत उस्मान ये बात कहते हैं कि किरअत में जहां बाक़ी के तीन कातिबों का हज़रत ज़ैद बिन साबित से इत्तेफाक न हो तो वो कुरैशी किरअत में क़ुरआन लिख लें, क्योंकि क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में नाज़िल हुआ था.... सवाल ये उठता है कि जब उनके सामने क़ुरैशी किरअत में लिखी हुई तमाम आयतों का मजमुआ मौजूद है तो किरअत में हज़रत ज़ैद से इत्तेफाक, या नाइत्तेफाकी का सवाल ही क्या ? वो तो अपने सामने मौजूद मास्टर कॉपी से नकल करेंगे न ? क्योंकि किरअत के हिसाब से वो मास्टर कॉपी ही परफेक्ट थी, इसीलिये तो उसे मंगाया गया था

...... ज़ाहिर होता है कि जैसे क़ुरआन की एक आयत खुज़यमा रज़ि० के पास मिलने की बात को दोनों हदीसों में गड्डमड्ड कर दिया गया, उसी तरह किरअत के मामले में ज़ैद बिन साबित रज़ि० से नाइत्तेफ़ाक़ी होने पर क़ुरैशी किरअत में कातिबों को क़ुरआन लिखने का हुक़्म देने की बात का सही वक्त भी इन एक सी दो हदीसों में रावियों ने गड्डमड्ड कर दिया है....

.... तर्क से सोचें तो ये हुक़्म उस वक्त का मालूम होता है जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में यमामा की जंग के बाद शुद्ध किरअत में जल्द से जल्द क़ुरआन की ढेर सारी कॉपियां बनाने का प्रयास किया जा रहा था, ताकि कारियों की एक बड़ी तादाद बनाई जा सके, लेकिन अभी तक पूरी मास्टर कॉपी को जमा नहीं किया जा सका था अलबत्ता काफ़ी सारी आयतों के मिल जाने बाद ये तय था कि पूरी क़ुरआन क़ुरैशी किरअत  में ही नाज़िल हुई है, और उसके पहले क्योंकि हज़रत ज़ैद बिन साबित के पास पूरी लिखित क़ुरआन मौजूद थी जिसमे कहीं कहीं क़ुरैशी किरअत नही थी सो अरब के लोगों के लिए क़ुरआन की अन्य प्रतियां बनाते हुए कातिबों के सामने ज़ैद बिन साबित की क़ुरआन मास्टर कॉपी के तौर पर रखी गई थी, इस हिदायत के साथ कि उसमें जहां ज़ैद बिन साबित ने क़ुरैशी किरअत न लिखी हो, वहां क़ुरैशी किरअत लिखकर कॉपीज़ बना ली जाएं....

.... फिर ये मालूम चलता है कि हज़रत उस्मान के ज़माने में किरअत को लेकर अरब में कोई नाइत्तेफ़ाकी नही थी, बल्कि नाइत्तेफ़ाकी का डर सिर्फ शाम और इराक़ के बीच था, यानी दूरदराज के इलाकों में जहाँ क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन नही पहुँची थी, इससे भी एक इशारा मिलता है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने से क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन के अरब में पढ़े सीखे जाने का सिलसिला जारी था....

.... सो हज़रत उस्मान रज़ि० ने अपनी ख़िलाफ़त के दौर में सिर्फ इतना किया कि उन्होंने उसी मास्टर कॉपी की मदद से और नई कॉपियां बनाने के लिए क़ुरआन के विशेषज्ञ हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को भी बुलाया और अन्य कातिबों को भी, इन सबने क़ुरैशी किरअत में क़ुरआन की प्रतियां बनाईं जिन्हें शाम और ईराक़ के अलग अलग प्रांतों में भिजवाकर हज़रत उस्मान ने अन्य किरअतों में लिखी क़ुरआन की प्रतियों को जनता के पास से उठा लेने का हुक्म दिया.... 

.... अन्य किरअतों को जलवा देने का हुक्म भी एक गढ़ी हुई बात महसूस होती है क्योंकि एक तो अन्य किरअतों में लिखी अल्लाह की ही बात थी, जिसको नष्ट करने की बात से ही नबी सल्ल० के साथी डरेंगे, और फिर अगर अन्य किरअतों को हज़रत उस्मान रज़ि० ने इस हद तक जाकर नष्ट करवाया होता तो ये किरअतें आज तक अरब देशों में मौजूद न होतीं, और पढ़ी और पढ़ाई न जा रही होतीं....

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.... बहरहाल हज़रत अबु बक्र रज़ि० और हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़मानों में क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी दोनों हदीसों को देखकर पता चलता है कि वहां मामला क़ुरआन को एक किताब का रूप देने का नही बल्कि दोनों ही वाकयों में क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन की कॉपियां बनाने का एक ही मामला था ....

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... और अंत में सूरह अबसा की वो आयतें, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि नबी सल्ल० के ज़माने में महज़ चमड़े और हड्डी पर नही, बल्कि क़ुरआन किताब की शक्ल में मौजूद थी..... "वे (क़ुरआन की आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत हैं, तो जो चाहे उसे याद कर ले - पवित्र पन्नों में अंकित हैं, प्रतिष्ठि्त, उच्च !! ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है, जो प्रतिष्ठित और नेक हैं" (क़ुरआन, 80:11-16)

रविवार, 17 जनवरी 2021

इस्लाम मे महिला पैगम्बर का न होना, क्या अल्लाह द्वारा स्त्रियों के प्रति पक्षपात है ?

ऐसे सवालों से अक्सर मैं दो चार होता रहता हूँ कि अगर अल्लाह स्त्री पुरुष में अधिकारों के दृष्टिकोण से भेद नहीं करता तो किसी स्त्री को अल्लाह ने नबी बनाकर क्यों नहीं भेजा, नबी होने का सम्मान अल्लाह ने हमेशा पुरुषों को क्यों दिया स्त्रियों को क्यों नही ? क्या अल्लाह के अनुसार स्त्री धर्मगुरु बनने लायक बुद्धि नही रखती, या स्त्री को अल्लाह नबी बनने लायक पवित्र नही समझता ..!!!
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...... मैं समझता हूं कि इन सारे प्रश्नों का उत्तर हमें मरियम अलैहिस्सलाम के रुप में मिल जाता है, ... इनके रूप में हमें एक महिला नबी का नाम तो क़ुरआन से ही मालूम चल जाता है, 

...मरियम अलैहिस्सलाम को क़ुरआन में बहुत महत्व दिया गया है और ये कहा गया है कि उन्हें अल्लाह ने पवित्र उद्देश्य के लिए चुना था, इस आधार पर मुस्लिम समुदाय की एक बड़ी तादाद हज़रत मरियम को महिला नबी के रूप में पहचानती है,  और इस उदाहरण से ये भी सिद्ध होता है कि न अल्लाह स्त्रियों को अपवित्र मानता है और न उनमें धर्मगुरु बनने लायक बुद्धि की कमी ही मानता है....
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... तथा क़ुरआन में मरियम अलैहिस्सलाम का ये एक उदाहरण होने से इस संभावना को भी बल मिलता है कि सम्भवतः और भी महिला नबी इतिहास में हुई हों, क्योंकि क़ुरआन में तमाम नबियों का ज़िक्र नही है, बल्कि केवल कुछ का वृतांत अल्लाह ने सुनाया है,  तो हमे इस बारे में पता नहीं,
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 वैसे आनुपातिक आधार पर अनुमान ये लगता है कि महिला नबियों की संख्या पुरूष नबियों के अनुपात में बेहद कम थी, 
... उसका स्पष्ट कारण भी नज़र आता है, इस बात में कोई संदेह नही कि महिला बहुत अच्छी धर्मगुरु बन सकती थीं, पर नबी केवल गुरु ही नहीं, बल्कि समाज में फैली कुरीतियों के विद्रोही भी होते थे, और विद्रोह करने के फलस्वरूप उनका प्रबल विरोध भी हुआ करता था क़ुरआन में जितने भी नबियों के वृतांत हैं, उन्हें पढ़कर पता चलता है कि नबियों को ईश्वर का सन्देश लोगों को सुनाते समय बेहद कठिन परिस्थितियों से गुज़रना होता था, इब्राहीम, ईसा, अय्यूब, मुहम्मद सल्ल० तमाम नबियों ने भयंकर शारीरिक कष्ट सहे... क्योंकि स्त्रियों की प्रकृति कोमल होती है इसलिए उन्हें सामान्यतया इन कष्टों में नही डाला गया.... अन्यथा प्रश्न करनेवाले ये प्रश्न करते कि अल्लाह ने कोमल स्त्रियों को नबी क्यों बनाया जिन पर इतने अत्याचार हुए ....!!!
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..... पर अल्लाह ने धर्म के ज्ञान में कई स्त्रियों को आगे बढ़ाया, चाहे वो हज़रत मरियम रही हों, या फ़िरऔन की पत्नी "आसिया", या मुस्लिम सन्त राबिया बसरी रह० .... और सबसे प्रमुख महिला धर्मगुरु का उदाहरण हज़रत मोहम्मद सल्ल० की पवित्र पत्नी हज़रत आयशा रज़ि० का है जिन्होंने धार्मिक ज्ञान को आगे बढ़ाने में सबसे अधिक योगदान दिया है, और इनके साथ नबी सल्ल० का विवाह ईश्वरीय अभिप्रेरण से ही हुआ था, जिससे फिर यही सिद्ध होता है कि अल्लाह स्त्रियों और पुरुषों में अन्यायपूर्ण भेद नहीं करता, ये तो इंसान है जो अल्लाह की युक्तियुक्त बातों को समझ नहीं पाता, और जहाँ अल्लाह ने स्त्रियों के साथ रहम का मुआमला किया है, उसे अल्लाह का अन्याय बताने लगता है !!!
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(कुछ उलमा वर्ग के अनुसार हज़रत मरियम नबी न होकर केवल अल्लाह की एक वलीया थीं पर हमारी जहां तक स्टडी है, आमतौर पर औलिया को ख़बर देने के लिए अल्लाह फरिश्तों को नही भेजता, ये नबियों के लिये खास समझा जाता है कि उन्हें अल्लाह के फ़रिश्ते दिखाई दें, और फ़रिश्ते के ज़रिये अल्लाह उनसे बातें करे
वलियों के लिए ख्वाब या इलहाम का तरीक़ा अल्लाह अपनाता है, यानी औलिया को साफ़ साफ़ फ़रिश्ते नही दिखते,)

औरत और पर्दा

( इस्लाम से जुड़े अपने सवालों के जवाब ढूंढते ढूंढते मैं अपने उन मामू के पास जा पहुँचा था, जिनके इस्लामी इल्म का दायरा काफ़ी बड़ा था, ... उनके पास पहुँचकर बिना वक्त गवांए मैं खोद खोद कर तमाम सवाल करता चला जा रहा था और वो सुकून से मेरी हर बात का इत्मीनान कर देने वाले जवाब देते चले जा रहे थे...)

 "अच्छा मामू ये बताइये औरतों को मुंह तक काले कपड़े से ढक कर रखना ... ये इस्लाम में क्यों बताया गया है ? कहते हैं कि गैर मर्दों की नीयत खराब होती है इसलिये औरत को पर्दा करना चाहिए, पर इसका क्या मतलब कि गुनाह मर्द के दिल में हो और क़ैद औरत को कर दिया जाए ? किसी और के जुर्म की सज़ा किसी और को देना, ये तो इंसाफ नही है न ? नीयत अगर मर्द की खराब है तो इंसाफ तो ये था कि मर्द पर उसकी नीयत को सही रखने की सख्ती की जाती और मर्द के न मानने पर सज़ा का डर दिखाया जाता, मगर यहाँ मर्द को तो उल्टे पब्लिक प्लेस में भी शर्टलेस होने की आज़ादी दे दी गई मगर औरत को बाहर निकलने पर अपना मुंह तक बन्द करना पड़ेगा चाहे आंखें ढकी होने की वजह वो सही से देख भी न पाए और गिर ही पड़े, ऐसा मैंने बहुत पुरानी बंगाली मुस्लिम औरत के संस्मरण में पढ़ा था कि बुर्के के कारण महिलायें गिर पड़ा करती थीं..." मैं मामू से बेबाक़ी से सवाल कर रहा था क्योंकि मुझे उम्मीद थी मामू दूसरों की तरह भड़क कर मुझपर कोई इल्ज़ाम लगाने की बजाय, कोई बेहतर जवाब ही देंगे...
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.... "बेटा, बिल्कुल ठीक, .... इंसाफ का तकाज़ा यही है कि जो गुनाह करे सज़ा भी उसी को मिले और इस्लाम इंसाफ के इसी क़ानून पर चलता है कि मर्द अगर औरत के साथ बलात्कार करेगा तो उसको मौत की सज़ा दी जाएगी... इस खतरनाक सज़ा के डर से मर्द अपनी नीयत को ठीक ही रखेगा... "
... अल्लाह ने सूरह नूर में औरतों को पर्दे का हुक्म देने से पहले मर्दों को पर्दे का हुक्म दिया है कि ईमानवाले मर्द अपनी नज़रों की सुरक्षा करें यानी पराई स्त्रियों को गलत निगाह से कतई न देखें, और अपने चरित्र की रक्षा करें यानी किसी पराई स्त्री को अपने पास न आने दें, फिर इसके बाद अल्लाह ने औरतों को यही हुक़्म दिया है..."
... यानी अल्लाह ने अपने बन्दों के लिए पर्दे का निज़ाम नाज़िल किया, ताकि एक साफ सुथरा समाज बन सके...!! और अल्लाह ने पर्दे की ज़िम्मेदारी किसी एक जिंस पर न डालकर, मर्द और औरत, दोनों को नामहरम से पर्दा करने का हुक़्म दिया है. बल्कि अल्लाह ने पर्दे की हिदायत देने में आदमियों को पहले खबरदार किया,  इससे मालूम होता है कि इस्लाम ये तवक़्क़ो रखता है कि मर्द को औरतों से ज़्यादा अपने पर्दे के बारे में फिक्रमंद होना चाहिए, 
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...."बहुत अच्छी बात बताई मामू आपने कि अल्लाह ने पहले मर्द से पर्दा करने को कहा, ...पर मामू औरतों को ज़्यादा बदन छिपाने की बात क्यों ?"
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"बेटा, औरत और मर्द के बीच कुछ फिज़िकल डिफरेंस होने की वजह से औरत को अपने बदन के वो कुछ हिस्से भी छिपाने पड़ते हैं जिन्हें मर्द को छिपाना उतना ज़रूरी नहीं है, जैसे मर्द का सीना.... हालांकि एक शर्मदार मुसलमान मर्द को अपना सीना भी गैर औरतों के आगे नही खोलना चाहिये, ये तहज़ीब हमें इस्लामी हस्तियों की ज़िंदगी से सीखने को मिलती है.."
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... "मामू आपकी बात बिल्कुल ठीक है कि औरतों के बदन का शर्ट वाला हिस्सा छिपाना ही सभ्य लगता है, लेकिन मामू, मेरा मेन सवाल औरतों के चेहरे ढकवाने पर है, जो लोग अपनी खुशी और मर्ज़ी से ढकती हैं, वो तो ठीक है, पर जिन औरतों पर दबाव डालकर मुंह ढकवाया जाता था, मेरा सवाल उनके बारे में है, जिन्हें जबरदस्ती के इस पर्दे से घुटन भी होती होगी और परेशानी भी, ये औरतों पर ज़्यादा और नाइंसाफ बंदिश वाली बात हो गई न मामू ??" मैंने पूछा
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..."बेटा, तुम्हारा कहना सही है और औरतों को घरों में क़ैद रखने वाला पर्दा नबी के दौर में था भी नही, तब मस्जिद में भी औरतें जाती थीं, तिजारत भी किया करती थीं, अहादीस में है कि जंगों में भी मुस्लिम औरतें जाती थीं, तो ये औरतों को चार दीवारी में बंद करने का तरीका नबी या सहाबा का तो था नही, ये तो ईरानी, भारतीय और यहां की दुसरी सभ्यताओं में था कि औरत कपड़े की गठरी बनी घर में छिपी रहे.... इस्लाम मे ऐसा नहीं है औरत को चेहरा छिपाने की, हथेलियां और पैर छिपाने की बाध्यता इस्लाम में नही है... जब हम हज करने गए थे, हमने क़ाबा शरीफ़ में औरतों और मर्दों को एक साथ तवाफ़ और नमाज़ अदा करते देखा, वहां तमाम औरतों के चेहरे खुले थे, इसी शक्ल में पिछले 1400 सालों से औरतें हज करने जाती रही हैं इस परिधान का हुक़्म प्यारे नबी सल्ल० ने मुसलमान औरतों को दिया है, यानी मर्दों के सामने पड़ने के लिये औरतों को नबी सल्ल० ने जितने पर्दे का हुक़्म दिया वो इतना ही है, .. चेहरा ढककर जो वो बेचारी बंगाली औरतें गिर रही थीं ये रिवाज ईरानियों के यहां था औरत का मुंह तक ढका जाए... जब ईरान में इस्लाम आया उन्होंने अपनी कुछ पुरानी परम्पराओं को भी इसमें मिलाजुला दिया और जब यही ईरानी भारत आये तो यहां के लोगों ने भी बुर्के को इस्लाम का ही पार्ट समझ लिया... हालांकि क़ुरआन की सूरह नूर की 31वीं आयत जहां पर्दे का ज़िक्र है वहां ये बात स्पष्टता से कही गई है कि औरतों के शरीर का वो हिस्सा जो खुला रहना आवश्यक है, उसे छोड़कर बाक़ी शरीर वो पराये मर्दों के आगे ढंकें... और आवश्यक रूप से खुले रहने वाले वो हिस्से चेहरा, हथेलियां और पैर हैं ये औरतों का हज का पहनावा साबित कर देता है
.... अब तो यूरोप और सारी दुनिया में मुस्लिम औरतों ने चेहरा ढकने वाले नकाब की बजाए "अबया" पहनना शुरू कर दिया है जिसमें सर ढका रहता है मगर चेहरा खुला रहता है, जब वहां की आज़ाद माहौल में पली बढ़ी औरतों को पता चल रहा है कि इस्लाम में पर्दा इतना आसान है तो जो लोग अब तक मुह ढकने के डर से पर्दा नही करती थीं वो भी तेज़ी से अबया को अपना रही हैं....!!" मामू ने आखरी बात कहते हुए खुशी से मेरी तरफ देखा जो दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रहा था
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..." और जब मैं ऐसी मिसालें दुनिया में देखता हूँ कि इस्लाम में ज़्यादा बंदिशों की कल्पना से जो लोग इस्लाम से दूर हो गए थे, उन्होंने जब क़ुरआन और हदीस का इस्लाम समझा तो बेजा बन्दिश न पाई और इस्लाम के करीब आ गए तो मुझे प्यारे नबी सल्ल० की वो हदीस याद आती है जो सही बुख़ारी, क़िताब-3, हदीस-69 पर दर्ज है और अनस बिन मलिक रज़ि० से रिवायत है कि नबी सल्ल० ने एक मकाम पर सहाबा से फ़रमाया कि "दीन में आसानी पैदा करो, दुश्वारी न पैदा करो, लोगों को नेक कामों के अज्र की ख़ुशख़बरी सुनाओ न कि उन्हें दीन से दूर भागने पर मजबूर कर दो" 
... हमारे उलमा को नबी सल्ल० की इस तालीम पर ध्यान देने की, अमल करने की ज़रूरत है...!!" 
... मामू ने कहते कहते मेरी तरफ देखा जो उनकी बातों को सुनकर हैरत और सुकून का मिलाजुला एहसास पा रहा था...!!!

क्या दोज़ख़ औरतों से भरी होगी ?

 अक्सर ये आपत्ति जताई जाती है कि मेराज की रात मे रसूल सल्ल. ने दोज़ख मे बहुतायत से औरतों को देखा.. इसका अर्थ है कि अल्लाह स्त्री पुरुषों में लिंग के आधार पर भेद करता है और स्त्रियों को केवल उनके स्त्री होने के अपराध में दोज़ख मे भर देगा....!!!

.... आइये इस आपत्ति का उत्तर देख लें...!!!

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.... बेशक ऐसा कुछ हदीसो मे दर्ज है कि नबी सल्ल. ने जन्नत मे गरीब और सताए हुए लोगों को बहुतायत से पाया जबकि दोज़ख मे स्त्रियों को, 

..... पर ऐसे दृश्य नबी सल्ल. ने क्यों देखे और क्यों उनका वर्णन किया ये समझने के लिए आपको ये बात दिमाग़ मे बिठानी चाहिए कि नबी सल्ल. अल्लाह की ओर से मानवजाति के लिए नियुक्त एक आध्यात्मिक गुरु हैं, और उन्हें जो कुछ भी दिखाया सुनाया जाता है वो अकारण नही, बल्कि मानवजाति को कोई अच्छी शिक्षा देने के लिए ही दिखाया सुनाया जाता है

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.... मेराज की रात को भी सिर्फ एक सैर या नबी सल्ल. को सम्मानित करने की दृष्टि से देखने की बजाय अपने दृष्टिकोण को थोड़ा और विकसित कीजिए, क्योंकि इस यात्रा के कई मकसद थे जिन्हें समझने की जरूरत है ...

.... सबसे पहले ये समझने की ज़रूरत है कि मेराज की रात की घटनाओं को कुरआन पाक सूरह बनी इसराईल की 60 वीं आयत मे एक "रुया" यानि प्रतीकात्मक दृश्य बताया गया है.... यानी इस रात में नबी सल्ल० द्वारा देखी, व अनुभव की गई बातों के गहरे निहितार्थ थे.... जैसे इस रात मे हज़रत मोहम्मद सल्ल० की तमाम नबियों से मुलाक़ात के पीछे ये निहितार्थ था, कि हर नबी एक दूसरे का मित्र और भाई है, और मुस्लिमों को भी हर नबी का उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना नबी सल्ल० का, मस्जिद ए अक्सा के स्थान पर पहुँचने का निहितार्थ था कि तमाम इसराइली नबियों की इबादतगाह रहा वो स्थल भी मुसलमानों के लिए क़ाबा शरीफ़ के बाद एक बरकतों वाला तीर्थ स्थल रहेगा

....  इसी अनुक्रम मे नबी सल्ल. को जन्नत और दोज़ख के प्रतीकात्मक दृश्य दिखाए गए थे, आप ये इस्लामी वविश्वास जानते होंगे कि भविष्य में होने वाली क़यामत से पहले तक इस संसार में मरने वाला कोई भी व्यक्ति जन्नत या दोज़ख में नही गया है, और अभी सभी मृतक एक ऐसे आयाम में हैं जिसे "बरज़ख़" कहा जाता है.... सो जब मेराज की रात में  नबी सल्ल० को जन्नत में गरीब और सताए हुए लोग दिखाए गए, तो वो उस समय की वास्तविकता नही था, बल्कि केवल एक शैक्षिक दृश्य था, जिसके पीछे दुनिया में दुख और अभाव सह लेने, पर अत्याचार का मार्ग न लेने वाले लोगों को सांत्वना देने का उद्देश्य था जिन्होंने सत्यनिष्ठा पर चलते हुए कष्टपूर्ण जीवन गुजारना स्वीकारा है, तो उनके लिए ये खुशखबरी है कि वे तमाम सब्र करने वाले लोग जन्नत के अधिकारी होंगे...

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...इसी तरह इस रात मे दोज़ख मे औरतों को बहुतायत से आप सल्ल. को दिखाया जाना भी उस समय की वास्तविकता न होकर केवल एक प्रतीकात्मक व शैक्षिक दृश्य था, 

...औरतों के बड़ी संख्या मे दोज़ख मे होने वाली हदीस मे आगे ये लिखा है कि क्योंकि औरतें अपने पति के साथ अकारण ही नाशुक्रगुज़ारी करती हैं, इस कारण स्त्रियों का दोज़ख मे होना दिखाया गया ... इस हदीस मे ये बात केवल ये शिक्षा देने के लिए की गई है कि अपनी मृत्यु से पहले ही स्त्रियाँ अपने दोज़ख मे जाने के एक सम्भावित कारण को जान लें और इस कारण, यानि नाशुक्री की आदत को त्यागकर अपना जन्नत मे जाना सुनिश्चित कर लें....

...... पवित्र क़ुरआन में बार बार तमाम स्त्री पुरुषों से यही कहा गया है कि वो जीवन मे अपने कर्म सुधार लें तो उनका जन्नत में जाना निश्चित हो जाएगा, और जन्नत और दोज़ख का फ़ैसला प्रत्येक के कर्मों के आधार पर होगा, न कि लिंग के आधार पर

..... न किसी के स्त्री होने के आधार पर उसे दोज़ख में भेज दिया जाएगा और न किसी के केवल पुरूष होने भर पर वो जन्नत का अधिकारी हो जाएगा... पवित्र कुरआन में स्त्री पुरूष में कर्मों के प्रतिदान में समानता की ये बात बहुत स्पष्टता से इस तरह बता दी गई है

..... " मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठा्पूर्वक आज्ञापालन करनेवाले पुरुष और निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करनेवाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्य रखनेवाली स्त्रियाँ, विनम्रता दिखानेवाले पुरुष और विनम्रता दिखानेवाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देनेवाले पुरुष और सदक़ा देनेवाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखनेवाले पुरुष और रोज़ा रखनेवाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करनेवाले पुरुष और रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करनेवाले पुरुष और याद करनेवाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है" 

(सूरह अहज़ाब, आयत-35)


..... तो वास्तव मे शबे मेराज मे नबी सल्ल. को दिखाए गए वो दृश्य केवल भले पुरूषों और भली स्त्रियों को छोटी छोटी उन गलतियों के प्रति भी चेताते हैं, जिनकी ओर आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता, और इन गलतियों को करते वक्त कोई ये नहीं सोचता कि वो गलत कर रहा है, तो नबी सल्ल० द्वारा इन छोटी छोटी गलतियों के प्रति भी ईमानवाले स्त्री पुरुषों को सचेत कर के उन्हें पूरी तरह पवित्र हो जाने की सीख दी गई है, ... वास्तव मे उस समय तक कोई भी प्राणी जन्नत या दोज़ख मे नही गया था, और न ही अकारण कोई स्त्री या पुरुष दोजख मे कभी जाएंगे ही, बल्कि उस वृत्तांत पर ध्यान देकर सावधान हो जाने वाले लोग तो अपना दोज़ख़ में जाना टाल लेंगे ... इन शा अल्लाह...!!

आध्यात्मिकता की शक्ति

मेरे मित्र जान अब्दुल्लाह भाई ने आध्यात्मिकता की शक्ति के प्रयोग से सांसारिक जीवन के व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने के बारे में पोस्ट की, तो मैंने उनसे कहा था कि इस अध्यात्मिकता की शक्ति के प्रताप से तो मैं अच्छी तरह वाकिफ़ हूँ, इस शक्ति को मैंने ख़ुद कई बार महसूस किया है, .... भाई ने पूछा था कि "कैसे महसूस किया, कुछ हमें भी बताओ ?"
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.... तो भाई, अपना एक पूर्व अनुभव पोस्ट कर रहा हूँ, पढ़ियेगा.....
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...... "लोग अक्सर मुझसे अल्लाह के होने का सबूत मांगते हैं ... और कई बार तरह तरह के तर्क देकर मेरा विश्वास अल्लाह पर से डिगाने की पूरी तैयारी कर डालते हैं .... ऐसा हो सकता है कि मैं अल्लाह के होने का सबूत न दे पाऊं.. या तर्क वितर्क मे हार जाऊं.... पर अल्लाह पर से मेरा विश्वास डिगना अब इतना सहल नहीं .... क्योंकि अल्लाह बार बार मुझे अपने वजूद का एहसास करा चुका है ... तो जब मैं अल्लाह को छोटी छोटी बातों मे ही सही, बार बार अनुभव कर चुका हूँ तो किसी के कहने से कैसे मान जाऊं कि अल्लाह नहीं है ....॥
एक घटना सुनाता हूँ 

मैं हमेशा ऐसा स्टूडेन्ट रहा हूँ जो साल भर पढ़ाई से भागा रहता था, और सिर्फ पेपर्स मे जो हर पेपर के बीच एक दो दिन का गैप होता था उन्हीं एक दो दिन मे पूरा सिलेबस पढ़कर पेपर दे आता था, और 50% से ऊपर नम्बर ले आता था , इतना काफी था मेरे लिए 

एम.कॉम फाइनल के पेपर्स चल रहे थे अगले दिन पेपर था और रात मे मैंने अपना सिलेबस कम्पलीट करते करते थोड़ा मूड फ्रेश करने को फेसबुक खोला ...

खोला तो था कि देखकर बस 15 मिनट मे मोबाइल बंद कर के रख दूंगा ... पर मुझे किसी नास्तिक ने बहस मे उलझा लिया ... और मैं इस्लाम पर लगाए गए उसके आरोपों के उत्तर देने मे ऐसा लगा कि समय का पता ही नही चला ... उस समय बस इस बात की फिक्र थी कि मेरे नबी स. और मेरे अल्लाह को गालियां देना बंद की जाएं ....

काफी रात बीत गई और मैं पढ़े बिना सो गया.... सुबह उठा तो कालेज की तैयारी करने को भी वक्त कम था .... अब मैं इस बात से बहुत घबराया कि पेपर की तो मेरी तैयारी ही नहीं हो पाई अब अगर इस पेपर मे फेल हो गया तो साल बरबाद होगा सो अलग और बदनामी होगी वो अलग

मैं कालेज जा तो रहा था मगर खाली दिमाग ..... अल्लाह से बस यही दुआ करता चला जा रहा था कि या अल्लाह बचा ले ... मैं तेरे लिए रात मे पढ़ न सका मेरे मालिक ... तो अब तू ही कुछ ऐसा चमत्कार कर दे कि बस मुझे 2-3 घण्टे का वक्त मिल जाए और मैं वो तैयारी कर पाऊं जो मैं रात को नहीं कर पाया ...

बार बार मैं अल्लाह से 2-3 घण्टे का वक्त मांगता जा रहा था ... हालांकि मैं बड़ी बेवकूफ़ी कर चुका था वक्त पर पढ़ाई न कर के और अब मेरे साथ जो भी कुछ बुरा होता, उसका मैं ही जिम्मेदार था .... पर अब मैं दिल ही दिल मे वो कुछ बुदबुदाता जा रहा था, जो बात कोई भी सुन लेता तो या मुझ पर हंसता, या तरस खाता ... अल्लाह मुझे बस 2-3 घण्टे दिला दे मैं तमाम उम्र तेरा शाकिर रहूँगा

बुदबुदाते बुदबुदाते मैं कालेज के गेट पर जा पहुंचा ... स्टूडेन्ट आ रहे थे जा रहे थे, मेरा तो दिल डूब गया .... "या अल्लाह, ... मैं गया मेरे मालिक"

लेकिन ये कालेज के मेनगेट पर कौन सा पेपर चस्पा था, जिसे मेरे क्लासमेट पढ रहे थे....
मैने धड़कते दिल को काबू मे करते हुए उसे पढ़ा, और जो लिखा था उसे देखकर मेरी आंखे हैरत से फैल गईं ...

"अपरिहार्य कारणों वश आज प्रथम पाली मे होने वाला एम.कॉम अंतिम वर्ष का पेपर, पहली पाली से स्थगित कर के आज ही दूसरी पाली मे (चार घण्टे बाद) लिया जाएगा अत: छात्र दूसरी पाली के समय पेपर देने आएं ॥".......

मैंने आंखे फाड़ फाड़कर देखा ... क्या सच मे अल्लाह ने मेरी दुवा सुन ली ???? लफ्ज़ ब लफ्ज़ सुन ली ... मेरे दिल की गहराईयों से शुक्र की सदाएं बुलंद हुईं, कि मेरे मालिक ... मेरे अल्लाह, तू पाक है .. मैं निसार जाऊं.... लाख लाख लाख बार शुक्राना मेरे मालिक का ... 

मेरे मालिक ने मुझे दिखा दिया कि वो है ... मेरे मालिक ने मुझे बता दिया कि शिद्दत से मांगी हुई दुआ कितनी जल्दी कुबूल हो जाती है
मेरे मालिक ने मुझे समझा दिया, कि मैं उसकी याद करूं, तो वह मेरे साथ रहेगा ...
और मेरे मालिक ने मुझे ये बतला दिया कि कोई चीज़ तकदीर का फैसला बदल नही सकती , सिवाय दिल की गहराईयों से मांगी गई दुआ के ।

और हां, कहना न होगा, कि मैं फौरन घर लौटा और उस मिले हुए वक्त मे पढ़कर पेपर दे भी आया, और हमेशा की तरह पास भी हो गया ... पर ये वाकया हमेशा के लिए मेरे दिल पर एक न मिटने वाला नक्श बना गया था ॥"