मंगलवार, 25 मई 2021
बनू क़ुरैज़ा का मामला क्या था ?
रक्त सम्बन्धियों से विवाह: उचित या अनुचित ?
इस्लाम मे व्यभिचार का दंड
मेराज के सफर में इसरा
क्या क़ुरआन के अनुसार सूरज दलदल में डूबता है ?
जिहाद क्या है ?
इस्लाम मे युद्ध की अनुमति आत्मरक्षा के लिए है,
आतंकवाद और इस्लाम: दो विपरीत ध्रुव
हिन्दू शब्द का अर्थ ?
मुता मैरिज इस्लाम का अंग नही
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
कुन फयाकुन का अर्थ
मंगलवार, 26 जनवरी 2021
क़ुरआन में मोहकम और मुतशाबेह आयतें क्या हैं ?
क़ुरआन में मोहकम और "मुताशाबेह" (इस शब्द में "त" को थोड़ा सा खींचा जाएगा इसलिये मैं "त" में आ की मात्रा लगा रहा हूँ, वैसे आमतौर पर मात्रा नही लगाते, क्योंकि "आ" की मात्रा के बराबर शब्द को नही खींचा जाता) आयतों के विषय में अपने हिसाब से समझकर सवाल उठाने वाले लोग सवाल करते हैं कि अल्लाह ने क़ुरआन को इंसानों की हिदायत के लिए नाज़िल करने का दावा किया है तो अल्लाह ने क़ुरआन में "मुताशाबेह" आयतें क्यों नाज़िल कीं जिनके बारे में अल्लाह कहता है कि इन आयतों को इंसान समझ ही नहीं सकता, सिर्फ़ अल्लाह समझ सकता है....!!!
.... ऐसी इंसान को न समझ आने वाली आयतें क़ुरआन में नाज़िल करके अल्लाह ने क़ुरआन के आसान होने की अपनी ही बात से अंतर्विरोध नही पैदा किया ??
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..... दरअसल ऐसा सवाल अरबी की बेसिक जानकारी भी न होने की वजह से लोग करते हैं, ... वरना थोड़ी बहुत अरबी की समझ रखने वाले भी जानते हैं कि "मुताशाबेह" शब्द का अर्थ होता है "मिलती जुलती शक्ल वाली कोई चीज़" ... और मोहकम का अर्थ होता है "किसी चीज़ को मज़बूत या स्पष्ट बनाना",
... इन नामों से ही ज़ाहिर हो जाता है कि क़ुरआन की इस आयत में बात क्या कही जा रही है, ....
"वो अल्लाह ही है जिसने तुमपर अपनी ओर से किताब उतारी, उसमें कुछ मोहकम (सुदृढ़) आयतें हैं जो किताब का मूल और सारगर्भित रूप हैं और दूसरी मुतशाबेह, तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ हैं वो उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाल लें हालाँकि ख़ुदा के सिवा उनका असली मतलब कोई नहीं जानता, और जो लोग ज्ञान के पक्के वो कहते हैं, कि हम हर उस बात पर ईमान लाए, जो हमारे रब ही की ओर से हैं।" और चेतते तो केवल वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं (सूरह आले इमरान, आयत 7)
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..... असल में यहां अल्लाह का ये फ़रमान है कि मुताशाबेह आयतें जो अल्लाह के स्थान, परलोक, इंसान की मौत के बाद और इंसान के दुनिया में अस्तित्व लेने से पूर्व की स्थितियों के बारे में बताती हैं वो केवल मिसालों के माध्यम से कही गई बातें हैं और उनकी सही सही तस्वीर समझना इंसान के वश की बात इसलिए नही है क्योंकि इंसान ने कभी उन स्थितियों को अपनी आंख से नही देखा... तो ऐसी स्थितियों पर एक ख़ाका सा खींचा गया है जिसे पूरी तौर पर इंसान तभी समझ पायेगा जब वो मरने के बाद उन स्थितियों को खुद अनुभव कर लेगा... क़ुरआन में ये भी कहा गया है ये मुताशाबेह यानी मिसाली आयतें असल क़ुरआन नही हैं,
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.... असल क़ुरआन मोहकम आयतें हैं जो दुनिया में आदर्श तरीके से जीने के बारे में इंसान को हुक़्म देती हैं और इंसान को उन्हीं स्पष्ट आयतों पर ध्यान देना चाहिए, ... लेकिन लेकिन जिन लोगों के दिलों में टेढ़ है, यानी जो लोग शैतान के कब्जे में हैं वो मुताशाबेह आयतों को लेकर या मुसलमानों के साथ उपहास करते हैं, या उनको तरह तरह से बहकाने की कोशिश में लगे रहते हैं कि आयतों का गलत अर्थ निकालकर अल्लाह के बन्दों को राह से भटका सकें.
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.... तो ऐसा नहीं है कि इंसान मुताशाबेह आयतों को बिल्कुल ही नहीं समझ सकता, बल्कि परलोक के बारे में क़ुरआन में जो मिसालें दी गई हैं, उन आयतों से इंसान परलोक के विषय में कल्पना कर सकता है, पर उसकी ये कल्पना किस हद तक सही बैठी, इस बात का फैसला इस जीवन में नही हो सकता.... हां ये है कि बात को समझने लायक एक आइडिया उसको मिल जाएगा,
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......ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि इंसान किसी भी अनजानी चीज़ के लिए अगर अनुमान लगाता है तो उस अनुमान को वो अपने किसी पुराने अनुभव के आधार पर लगाने की कोशिश करता है, पर अगर बताई जा रही चीज़ की मिसाल उस व्यक्ति की पहले से देखी गई किसी वस्तु से न मिलती हो तो व्यक्ति के लिए बताई जा रही वस्तु की पूरी तरह सही कल्पना करना सन्देहास्पद रहता है, ..... ये स्पष्ट है कि किसी अनदेखी चीज़ को बताने का सबसे सही तरीका यही होता है कि उसे उसकी जानी समझी चीज़ों की मिसाल देकर बात को समझाने की कोशिश की जाए, जिससे वो बात को काफी हद तक सही सही समझ सके...
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...चौदहवीं शताब्दी में इब्नबतूता ने अपने देश के लोगों को अपने यात्रा वृतांत में देखे एक अनोखे फल के बारे में बताने की कोशिश की जो फल उनके देश में नही पाया जाता था और किसी ने नही देखा था, ....
.... इब्नबतूता ने लिखा कि "ये लकड़ी का फल इंसान की खोपड़ी जैसा दिखता है, इसमें भी दो आंखें और मुँह की बनावट दिखाई देती है, और इसमें इंसान के सर में लगे बालों की तरह ही बाल भी होते हैं...."
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.... क्योंकि इस फल जैसी कोई चीज़ उनके देशवासियों ने पहले देखी नही थी, सो उन्होंने मिलते जुलते उदाहरण से बात को समझाने की कोशिश की... हालांकि इस वर्णन से उनके देश के लोगों ने किसी फल कल्पना कर ही ली होगी, लेकिन वो कल्पना एक हद तक ही उस फल जैसी होगी, ... आपको बता दूं कि ये वर्णन इब्नबतूता ने नारियल के फल का किया था, वाक़ई में उन्होंने उदाहरण तो मिलता ही जुलता दिया था... लेकिन नारियल की असल तस्वीर उनके देशवासियों को तभी समझ आई होगी, जब उन लोगों ने नारियल को अपनी आंखों से देख लिया होगा....!!!
.... यही मामला मुताशाबेह आयतों का है... हमारे एक अनुमान लगाने लायक उदाहरण दे दिया गया है, बाक़ी पूरी असलियत उन बातों को साकार देख लेने के बाद समझ आ जाएगी
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...... अब क्योंकि हमारे ज़िंदा रहते न हम मौत के बाद की परिस्थितियों का अनुभव कर सकते हैं और न हमारे सांसारिक जीवन के लिये मौत के बाद के जीवन के दृश्यों को साकार देखना जरूरी ही है.... बल्कि हमारे सांसारिक जीवन के लिए परोपकार करते हुए जीना, सामाजिक न्याय और प्रेम का वातावरण बनाना और अपराधों पर अंकुश लगाना ज़्यादा ज़रूरी है, सो इन्ही सारे सांसारिक जीवन के लिए दिशानिर्देश देने वाली मोहकम यानी स्पष्ट आयतों के बारे में कहा गया कि असल क़ुरआन ये हैं और इन पर ही ध्यान देना और पूर्ण रूप में समझना ज़्यादा ज़रूरी है, सो ये आयतें स्पष्ट हैं ही !!!
बुधवार, 20 जनवरी 2021
इस्लाम में जाति भेद ??
प्यारे नबी सल्ल. ने खुदगर्ज़ इन्सानों की बनाई ज़ात पांत और ऊंच नीच की भर्त्सना करते हुए फरमाया था कि "अल्लाह के नज़दीक सारे इन्सान उसी तरह एक बराबर हैं, जैसे कंघी के तमाम दांत एक बराबर होते हैं "
नबी सल्ल. की तमाम हयाते मुबारक (पवित्र जीवन) ही इंसानो के बीच नस्लभेद, ऊंच नीच, छोटे बड़े, और गुलाम और आका के बीच के नाइन्साफ फर्क को मिटाने मे गुज़री ... बल्कि अपने अंतिम हज के समय दिए अभिभाषण मे भी आप सल्ल. फरमा गए कि
"इसलाम मे न तो किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर कोई बड़ाई दी गई है, न किसी गैर अरबी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर बड़ाई दी गई है, और न काले को गोरे पर, बड़ाई अगर किसी को है तो उसको, जो तक़वा व परहेज़गारी का व्यवहार अपनाने मे दूसरों से आगे है ,"
यानी रंग, नस्ल, देश और वंश के कारण इस्लाम किसी व्यक्ति को दूसरों से बेहतर नहीं मानता, बल्कि उसे बेहतर मानता है, जिसके व्यवहार नेक हैं ,
इसके बावजूद आज भारतीय मुसलमानों को जात पांत और ऊंच नीच का विचार करते देखकर बड़ी मायूसी होती है कि कहाँ इस्लाम आया था दुनिया के तफरके (विभेद) मिटाने, और कहाँ खुद इसी दीन मे दुनिया के तफरके आकर पड़ गए हैं ॥
मुझे याद है एक दिन मेरे सबसे अजीज़ दोस्त ने मुझे फोन कर के पूछा कि क्या उसकी बिरादरी के लोगों को मस्जिद मे इमामत करने का हक नहीं है इस्लाम के हिसाब से ?? ... मैंने उसे कहा कि भाई, ये तो निरी जाहिलियत की बात हुई और ऐसी कोई इन्सानो के बीच फर्क पैदा करने वाली बात इस्लाम मे नहीं है ॥ दोस्त ने भारतीय मुस्लिमों के बीच बड़े प्रतिष्ठित मौलाना का नाम लेते हुए बताया कि उन्होंने ऐसा लिखा है कि अजलफ अर्थात् छोटी जाति के मुसलमानों को मस्जिद मे इमामत का अधिकार नहीं, ये अधिकार केवल अशरफ यानि उच्च जाति को है ... जब मैने इस विषय मे खोजबीन की तो ये खबर सही पाकर मुझे बड़ा धक्का पहुंचा कि आखिर उन मौलाना ने क्या सोचकर ऐसी बेबुनियाद बात इस्लाम पर थोपी जिसका इस्लाम से बिल्कुल ही ताल्लुक नहीं था ???
अफसोस, कि ज़ात पांत के ऐसे ही न जाने और कितने ही बेबुनियाद खयालात आज मुसलमानों के बीच फल फूल रहे हैं ।
वैसे एक बात पूरे दावे से कही जा सकती कि बर्रे सगीर के मुसलमानों मे ज़ात पांत की घुसपैठ पूरी तरह से भारतीय समुदाय से प्रेरित है , कि जिस तरह भारत मे ब्राह्मण दैवीय अंश के कारण, व क्षत्रिय शासक होने के कारण सवर्ण माने गए, और सेवक और शासित हेय जाति के, ठीक वैसे ही भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिमों मे भी नबी सल्ल. के वंशजों को और भारत पर शासन करने वाले मुगल, पठान, तुर्क और अरबों को ऊंची कौम मान लिया गया और भारत की ही छोटी और सामान्य जातियों से धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम बने लोगों को छोटी कौम का माना जाने लगा, जबकि ऐसी मान्यताओं को मानना सरासर गैर इस्लामी बात थी ॥
वैसे इस्लाम की अनेकानेक शिक्षाओं के कारण मुस्लिमों मे जात पांत के आगमन के बावजूद छुआछूत, और खाने पीने मे अलगाव जैसी बुराइयां नहीं आ सकीं, फिर भी जो थोड़ा बहुत आया भी है, यानी तथाकथित ऊंची मुस्लिम जातियों का घमण्ड, और स्वयंघोषित नीची मुस्लिम जातियों की गुटबाजी, ये भी इस्लाम मे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं ...
इस्लाम समस्त मानव जाति को एक समान पवित्र मानता है और मनुष्य की अच्छाई और बुराई का निर्णय केवल उस मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मो के आधार पर लेता है, इसलिए किसी भी मुस्लिम को अपनी जाति पर बेजा घमण्ड हो, या किसी मुस्लिम के मन मे जाति को लेकर गुटबन्दी का ख्याल हो तो बिना रत्ती भर के शक के वो आदमी इस्लाम और नबी सल्ल. की तालीम की तौहीन करने का गुनाहगार है
इस्लाम मे नस्लभेद पैदा होने की शुरुआत सम्भवत: इस विचार से हुई कि पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. के वंशजो के शरीर मे पैगंबर मोहम्मद के रक्त का अंश मिला होने के कारण वे दैवीय आशीर्वाद से पवित्र होते हैं .... जबकि पैगंबर के वंश से अलग कोई व्यक्ति उतना पवित्र और श्रेष्ठ नही हो सकता... अल्लाह भी शेष मुसलमानों से ज्यादा नबी सल्ल. के वंशजों से प्रेम करता है, इसीलिए दुरूद शरीफ़ मे सारे मुस्लिमो को नबी सल्ल. के साथ आप सल्ल. के वंशजों के लिए भी दुआ करने का आदेश है, अत: नबी सल्ल. की आल (वंश) जिन्हें "सय्यद" कहा जाता है वो अल्लाह की नजर मे बाकी मनुष्यों से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ हैं ...
लेकिन क्या ये बातें नबी सल्ल. द्वारा दी गई इस्लामी तालीम के अनुरूप ठहरती हैं ???
... ज़ात बिरादरी की ये बातें मुसलमानों को इस्लाम की रूह से ही नाआश्ना किए डाल रही हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि कुरआनी लुगत मे "आल" के मानी क्या हैं ये समझा जाए, और ये जाना जाए कि वो आले मुहम्मद सल्ल. कौन हैं, जिन पर बरकतों और रहमतों के नाज़िल होने की दुआ हम रोज़ दुरूद शरीफ़ मे किया करते हैं ॥
दरअसल, शब्द "आल" को हमारे भाईयों ने बड़े संकुचित अर्थ मे लिया है ... कुरआन पढ़िए तो पाएंगे कि हकीकत मे कुरआनी अलंकरण मे "आल" का मतलब सिर्फ किसी की जैविक संतान नहीं बल्कि जब ये शब्द "आल" विशेषकर किसी कौम के सरदार, किसी लीडर या किसी महात्मा से जोड़कर बोला जाए, तो समझ लीजिए कि उस सरदार के समस्त अनुयायियों को उस सरदार की आल कहा गया है
उदाहरण के लिए देखिए कुरान 40:46 मे फिरऔन की आल को मौत के बाद दण्ड का ज़िक्र है, लेकिन इस्लामी ज्ञान रखने वाले दोस्त जानते होंगे कि फिरऔन नि:संतान था और फिरऔन की पत्नी एक पुण्यात्मा थी, यानी यहाँ न फिरऔन की जैविक संतानों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है, न उसके परिवार को बल्कि फिरऔन के उन अनुयायियों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है जो फिरऔन के आदेश पर निर्दोष मासूमो की हत्या और जनता पर भयंकर अत्याचार किया करते थे ... और अल्लाह ने इन्हीं अनुयायियों को कुरआन मे फिरऔन की आल कहा है ॥
अत: ये भी स्पष्ट है कि दुरूद पाक मे जो दुआ हम करते हैं, वो सिर्फ नबी सल्ल. और उनकी संतानों के लिए नहीं, बल्कि नबी सल्ल. और नबी सल्ल. के समस्त आज्ञाकारी अनुयायियों के लिए करते हैं ॥
ये तो बात हुई कि दुरूद शरीफ़ मे केवल नबी की संतानें ही नहीं बल्कि वे सारे मुस्लिम शामिल हैं जो भले कामों के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, फिर चाहे वो किसी भी वंश से हों और उनका नबी सल्ल. के खानदान से दूर दूर तक का वास्ता न हो
इसके बरअक्स ये भी सोच का विषय है कि क्या नबी सल्ल. के वंशज अनिवार्य रूप से पवित्र और श्रेष्ठ हैं, और इसलिए अनिवार्य रूप से दुरूद शरीफ़ मे शामिल हैं ??
नबी के वंशज चाहे पापी ही क्यों न हों, अल्लाह उनसे विशेष प्रेम रखता है, ऐसा निराधार भ्रम पालने वालों को मैं याद दिलाना चाहूंगा कुरान मे एक बड़े नबी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बेटे का ज़िक्र, जो कि पापी था, और इसलिए जब वो जल प्रलय मे डूबा और हज़रत नूह ने अल्लाह को ये कहते हुए पुकारा कि ऐ अल्लाह मेरा बेटा मेरे घरवालों मे से था, ... तो अल्लाह की ओर से जवाब आया कि वो आपके घरवालों मे से नहीं था, और ऐसी बात न कहिए जिस बात का आपको ज्ञान न हो [कुरआन 11:46] ... यानि इस महान किताब मे अल्लाह ने खुद स्पष्ट कर दिया है कि अल्लाह किसी व्यक्ति को रक्त और वंश के आधार पर प्रेम और आशीर्वाद नहीं देता, बल्कि अल्लाह तो नबियों की जैविक सन्तानो को भी नबी का सम्बन्धी नहीं मानता, यदि ये सन्ताने पाप मे लिप्त रहती हों, ... तो स्पष्ट है कि कोई भी पापी व्यक्ति जिसका रक्त सम्बन्ध हकीकत मे नबी सल्ल. से हो भी, वो नबी की आल नहीं है अल्लाह के नज़दीक, जब तक वक्त रहते तौबा न कर ले ...॥
अल्लाहु आलम ॥
मंगलवार, 19 जनवरी 2021
जन्नत की हूर : आध्यात्मिकता में भोग की बातें क्यों ?
आपत्ति : इस्लाम में व्यक्ति को जन्नत में हूर अर्थात "सेक्स स्लेव" देने का लालच दिया जाता है, एक सवाल तो ये है कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भोग की ये बात क्यों ? और दूसरी बात ये कि यहां भी स्त्री पुरूष में पक्षपात दिखता है है, इस्लामी जन्नत में केवल पुरुषों को ही हूरें देने का वादा क्यों है, जन्नत में स्त्रियों के लिये जन्नत में बहत्तर तगड़े पुरुषों का वादा क्यों नही किया जाता...??
उत्तर : सबसे पहले तो ये जान लीजिये कि हूर का मतलब सेक्स स्लेव बिलकुल नहीं होता... कटाक्ष करने वाले लोगों को बता दूं कि 72 हूरों का ज़िक्र क़ुरान में कहीं भी नही है, ये एक झूठी बात है जिसे इस्लाम विरोधियों ने ही फैलाया है, (क़ुरआन के बाद सही बुख़ारी, व सही मुस्लिम में भी 72 हूरों वाली कोई हदीस नही, इसके अतिरिक्त जहाँ कुछ रिवायतों में 72 हूर का ज़िक्र है, विद्वानों के अनुसार वे रिवायतें ज़ईफ़ हैं, अर्थात उनकी प्रमाणिकता संदेहास्पद है..)
..... इस्लाम के अनुसार सही बात ये है कि नेक व्यक्तिओं जिनकी मौत विवाह से पहले हो गई थी जन्नत में उनका विवाह जन्नती स्त्रियों से करवा दिया जाएगा, जिन नेक व्यक्तियों के विवाह हो गए थे, तो उन प्रेमी पति पत्नियों को जन्नत में एक दूसरे से मिला दिया जाएगा, तो देखिये जिस तरह विवाहित पुरुषों को हूर के रूप में उनकी प्रिय पत्नी मिल जाएंगी, उसी तरह विवाहिता स्त्रियों को हूर के रूप में उनके सांसारिक जीवन के प्रेमी पति मिल जाएंगे,
..... रही कुँवारेपन में देह त्याग कर चुकी नेक लड़कियां तो उनके विवाह भी जन्नती पुरुषों से कर दिए जाएंगे... क्योंकि क़ुरान में वर्णित शब्द हूर का अर्थ है सुन्दर आँखों वाला साथी, हूर शब्द का कोई स्पेसिफिक जेंडर नही है, पुरुषों के परिप्रेक्ष्य में हूर शब्द स्त्रियों के लिए प्रयुक्त होगा और स्त्रियों के परिप्रेक्ष्य में हूर शब्द पुरुषों के लिए प्रयुक्त होगा.... यानी "हूर" का मतलब केवल स्त्री नही है... हूर पुरूष भी हो सकता है !!
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.... दूसरी ओर आप लोग इस सम्बन्ध में सबसे ऊपर "सम्भोग" की बात को रखते हैं... जबकि सोचिये कि यदि आपके विवाह को दो तीन वर्ष हो चुके हैं, तो क्या आज भी आप अपनी पत्नी को "सेक्स डॉल" के ही रूप में देखते हैं ?? आप अपनी पत्नी को बिलकुल इस शक्ल में नही देखते होंगे, क्योंकि विवाह के कुछ ही समय बाद सम्भोग दम्पति के लिये गौड़ विषय हो जाता है, उसकी जगह उनके लिए भावनात्मक सम्बन्ध ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, साथ रहकर जीवन के उतार चढ़ाव को पार करने का आनन्द महत्वपूर्ण हो जाता है, साथी द्वारा दूसरे साथी के लिए बढ़ती जाती सहानुभूति की भावना का सुख महत्वपूर्ण हो जाता है, एक दूसरे से कह सुनकर दिल हल्का करने की सुविधा महत्वपूर्ण हो जाती है .....
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..... कहीं आप ये तो नही सोचते कि वृद्ध दम्पति में से एक के मरने पर दूसरा इसलिये रोता है कि अब वो सम्भोग किससे करेगा/करेगी...?? ऐसा नहीं है क्योंकि वृद्धावस्था में अधिकांश लोगों की सेक्स क्षमता क्षीण हो जाती है और, वे सेक्स की ज़रूरत भी कभी महसूस नही करते, तब एक साथी के मरने पर दूसरा इसलिये रोता है कि उसके सुख दुःख का साथी बिछड़ गया है....
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....... ये है दुनिया में वैवाहिक संबंध का सही रूप जहाँ जीवन बहुत थोड़ा है, और इस थोड़े से समय में सेक्स को लेकर उत्तेजना और उत्साह का समय उससे भी बहुत बहुत छोटा... अब इसके बाद सोचिये ऐसे जीवन और ऐसे सम्बन्ध के बारे में, जो कि अनन्त हो, ..... क्या ऐसे सम्बन्ध में व्यक्ति को केवल सेक्स का ही लालच दिखेगा ?? तब, जब सांसारिक जीवन में उनमे से अधिकांश व्यक्तियों के लिए सेक्स गौड़ विषय हो चुका हो....?
.. माफ़ कीजिये पर यदि जन्नती विवाह के नाम पर केवल सेक्स ही सेक्स आपके मस्तिष्क में घूमने लगता है तो खुद आप ही यौन कुंठा के शिकार हैं... क्योंकि क़ुरआन कहीं जन्नत में सेक्स करने का वर्णन नहीं करता... क़ुरआन और अहादीस स्पष्ट करती हैं कि सांसारिक जीवन की तमाम गंदी और घृणित चीज़ों का अस्तित्व जन्नत में नही होगा... जन्नत में जो कुछ होगा उसका स्वरूप पवित्र होगा ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि जन्नत में पति पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्धों का स्वरूप सांसारिक जीवन के स्वरूप जैसा नही होगा, बल्कि कुछ अलग ही अकल्पनीय ढंग का होगा, जो स्वरूप पूरी तरह पवित्रता से भरा होगा... इन बिंदुओं पर गौर करने के बाद आपको जन्नती दाम्पत्य में शुद्ध भावनात्मक प्रेम ही दिखेगा कोई अशोभनीय बात न दिखेगी ... पूर्वाग्रहों को परे रख, सोचकर तो देखिये !!!
सोमवार, 18 जनवरी 2021
क़ुरआन की कम्पाइलिंग कब हुई ?
अक्सर कुछ हदीसों की बुनियाद पर ये कहा जाता है कि क़ुरआन नबी सल्ल० के ज़माने में एक किताब की शक्ल में नही लिखा गया था और क़ुरआन की सूरतों के पढ़ने या याद करने के लिए भी कोई क्रम नही था, नबी सल्ल० की वफ़ात के कई साल बाद जाकर क़ुरआन को एक किताब की शक्ल देने की कोशिश की गई और लकड़ी, चमड़े, हड्डी वगैरह पर लिखी आयतों को ढूंढ कर एक किताब में लिखा गया... इस बीच क़ुरआन की कई आयतों के खो जाने की हदीसें भी मिलती हैं और ये हदीसों में मिलता है कि अलग अलग प्रकार की क़ुरआन लिख ली गई थीं, जिन्हें बाद में हज़रत उस्मान रज़ि० ने जलवा दिया था... ऐसे में क़ुरआन की विश्वसनीयता का क्या प्रमाण रह जाता है ??
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उत्तर- ये एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है कि नबी सल्ल० के सामने क़ुरआन एक किताब की सूरत में नही लिखा गया था... असलियत इसके उलट है, मैं हमेशा आपसे कहता हूं कि पहले क़ुरआन पढ़िये और फिर हदीसों को क़ुरआन की बात के मुताबिक़ समझिये, और क़ुरआन के मुताबिक बात कहने वाली हदीसों को कुबूल कीजिये और क़ुरआन से टकराने वाली बातों को छोड़ दीजिये....
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... क़ुरआन में सूरह क़ियामा, सूरह नम्बर 75 की 16 से 19 तक आयतों को पढ़िये "(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो ! उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है ! तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह उस किरअत की इत्तेबा करना ! फिर उस के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है"
... मौलाना हमीद्दुदीन फ़राही के मुताबिक़ यहां अल्लाह ने नबी सल्ल० को ये भरोसा दिलाया है कि जो काफ़िर इस क़ुरआन के एक ही बार में पूरा न नाज़िल होने का ताना देते हैं, उनके तानों से रसूल परेशान न हों बल्कि इस किताब का जमा करना (यानी सारी आयतों को एक जगह एक तरतीब से रखना) फिर किरअत करना/पढ़वा देना (यानी नई तरतीब के साथ याद भी करा देना) अल्लाह ने अपने ज़िम्मे लिया है और नबी सल्ल० की ज़िंदगी में ही ये काम कर देने का भरोसा अल्लाह ने उन्हें उसी दौर में दिला दिया था, जब आप सल्ल० मक्का में ही थे और मदीना तशरीफ़ नही लाये थे.... ज़ाहिर है जिब्रील नबी सल्ल० के ज़रिये ही अल्लाह की बात दुनिया तक पहुँचाते थे, सो अल्लाह के ये तमाम वादे नबी सल्ल० के ज़माने में ही पूरे होने ज़रूरी थे,
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.... क़ुरआन की इन आयतों को देखने के बाद अब हदीसों को देखिये.... बुख़ारी शरीफ़ किताब 61, हदीस नम्बर-519 और 520 पर दर्ज हदीसें देखिये कि "हर साल रमज़ान में नबी सल्ल० के सामने जिब्रील क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा करते थे, फिर आप सल्ल० उसे पूरा पूरा जिब्रील को सुनाया करते थे और जिस साल आप सल्ल० की वफ़ात हुई उस साल नबी सल्ल० ने दो बार पूरे क़ुरआन पाक को जिब्रील अलैहिस्सलाम के सामने दोहराया" तो पक्के तौर पर इस बात पर मुहर लग जाती है कि ये क़ुरआन को एक नई तरतीब से जमा करके, नबी सल्ल० के सामने वो किरअत पढ़कर आप सल्ल० को याद करा देने के अल्लाह के उसी वादे पर अमल था जो वादा क़ुरआन की सूरह क़ियामा मे मौजूद है,
.... यही किरत और तरतीब आप सल्ल० ने तमाम सहाबा को भी बताई और अनगिनत सहाबा ने इसे पूरा पूरा क्रमवार याद कर लिया,
.... इसके अलावा बुख़ारी शरीफ़ किताब-61, हदीस-525 में ये भी मिलता है कि उबई इब्ने क़ाब, मुआज़ बिन जबल, ज़ैद बिन साबित और अबू ज़ैद, इन चार अंसारी सहाबियों ने नबी सल्ल० के ज़माने में ही क़ुरआन को जमा कर लिया था....
....जबकि दूसरी अहादीस से मालूम चलता है कि क़ुरआन की आयतों को नबी सल्ल० के हुक़्म पर लिखने वाले कातिबों की तादाद कहीं ज़्यादा थी, तो सिर्फ इन चार लोगों का ज़िक्र क्यों ?? मालूम चलता है कि यहां पूरी क़ुरआन को जमा करके एक किताब की शक्ल देने का ज़िक्र है, न कि चन्द सूरतों को, और क्योंकि ज़ैद बिन साबित रज़ि० उस वक्त नबी सल्ल० के साथ होते थे जब आप सल्ल० जिब्रील को नई तरतीब के साथ क़ुरआन सुनाते थे, तो हम समझ सकते हैं कि ज़ैद बिन साबित और बाक़ी तीनों अंसारी सहाबा ने भी क़ुरआन के जमा करते वक्त नई तरतीब का एहतमाम किया था, तो इस तरह क़ुरआन अपनी मौजूदा तरतीब के साथ ही नबी सल्ल० के सामने ही किताब की शक्ल में भी मौजूद था और इसी तरतीब के साथ सैंकड़ों की तादाद में सहाबा को हिफ़्ज़ तो था ही...
... और आप सल्ल० ने हज्जतुल विदा में इसी किताब के भरोसे फ़रमाया था कि तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक तो अल्लाह की किताब और दूसरे अपनी सुन्नत, इनको मज़बूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह न होगे" ....
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.... और जब अलग अलग जगह लिखी हुई और सैंकड़ों सहाबा की स्मृति में क़ुरआन की सारी आयतें महफ़ूज़ थीं तो अलग अलग स्थानों पर रखी आयतों के खो जाने की हदीसों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, उनसे क़ुरआन की सम्पूर्णता को कोई फ़र्क नही पड़ता....!!
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....अब सवाल उठता है कि बुख़ारी की हदीस में फिर क्या लिखा है कि यमामा की जंग में जब बड़ी तादाद में क़ुरआन को बाय हार्ट याद करने वाले सहाबियों की शहादत हो गई तब ये डर दरपेश आया कि कहीं क़ुरआन न खो जाए इसलिए उसे लिखकर रख लेने का आइडिया आया....??
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..... देखिये, दरअसल वहां मामला क़ुरआन की आयतों के खो जाने का नही था, क्योंकि हदीसों के मुताबिक़ ही क़ुरआन तो किताब की शक्ल में नबी सल्ल० के ज़माने से ही मौजूद थी, तो यमामा की जंग के बाद के मौक़े पर क़ुरआन के खोने का नही बल्कि क़ुरआन के असल डायलेक्ट, जिसमें वो नाज़िल हुआ था उसके संरक्षण की फ़िक्र का मामला था.... यमामा की जंग में शहीद होने वाले सहाबियों के लिये हदीस में लफ़्ज़ "क़ुर्रा" आया है, जो लफ़्ज़ 'क़ारी' का बहुवचन है, और क़ारी का मतलब होता है वो शख्स जो क़ुरआन को विशेष लहजे और उच्चारण के साथ यानी एक विशेष बोली में पढ़ सकता है, यानी ये शहीद वो लोग थे जिन्हें आप सल्ल० ने विशेष ढंग से क़ुरआन की किरअत सिखाई थी... दरअसल उस समय अरब में सात अलग अलग प्रकार की अरबी बोलियां (किरअतें) प्रचलित थीं .... ऐसा हर एक भाषा में होता है, हमारी हिंदी में भी अनेकों बोलियां प्रचलित हैं जिनमें एक ही शब्द को अनेकों तरह के उच्चारण के साथ बोला जाता है पर उससे उसका अर्थ नहीं बदलता, उदाहरण के लिए "विश्वास" शुद्ध हिंदी का शब्द है, लेकिन इसी शब्द के दूसरे डायलेक्ट "बिस्वास" को हमारे देश में बड़ी संख्या में बोला जाता है, इससे शब्द का अर्थ नहीं बदलता, लेकिन उच्चारण बदल जाता है और अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलने वाला व्यक्ति देहात के किसी व्यक्ति को इमला बोलकर "विश्वास" लिखवाए तो अपनी आदत और सुविधा के कारण लिखने वाला व्यक्ति "बिस्वास" ही लिख देगा, हालांकि उससे कहा गया मैसेज नही बदलेगा, यही मामला क़ुरआन के साथ था, अरब में उस समय थोड़े थोड़े फ़र्क के साथ सात तरह की किरअत यानी बोलियां प्रचलित थीं, और जब वो सहाबा जिन्होंने क़ुरआन कंठस्थ किया था वो दूर के क्षेत्रों में जाकर कातिबों को क़ुरआन सुनाते तो क़ातिब कई स्थानों पर नेचुरली अपने उच्चारण के अनुसार किसी शब्द को लिख दिया करते थे, इससे अमूमन क़ुरआन की बात में कोई फ़र्क नही आता था, ... नबी सल्ल० के करीबी सहाबा ने जब इन अलग ढंग से कहे जा रहे शब्दों पर नबी सल्ल० का ध्यान दिलाया तो ग़ालिबन नबी सल्ल० ने ये कहा कि जिस किरअत में लोगों को ज़्यादा सुविधा हो रही है, उसी में उन्हें पढ़ने दो, क्योंकि क़ुरआन की बात तो बदल नही रही, इसलिए ये कोई बिग डील नहीं है... पर हदीस में लिखे जाने के वक्त तक आप सल्ल० की उस बात को इतना बदल दिया गया कि हदीस में बात ये लिख दी गई कि क़ुरआन सात अलग अलग किरअतों में नाज़िल हुआ है, जो बात सही नहीं है...!!
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.... बहरहाल, यमामा की जंग के बाद की हदीस पर आते हैं.... तो बुख़ारी शरीफ़ की किताब-61, हदीस-509 के मुताबिक हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने मिलने बुलाया, और जब वो हज़रत अबु बक्र रज़ि० के पास पहुँचे तो वहां हज़रत उमर रज़ि० भी मौजूद थे, हज़रत अबू बक्र ने हज़रत ज़ैद से फ़रमाया कि यमामा की जंग में बहुत बड़ी तादाद में कारियों (कुर्रा) की शहादत हुई, और अंदेशा ये है कि आनेवाले वक्त में जो जंगें होंगी उनमे और ऐसे किरअत जानने वाले लोगों की शहादत हो सकती है जो अभी ज़िंदा हैं, जिससे क़ुरआन का एक अहम हिस्सा (यहां मुराद उस किरअत से है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ था, और इसे ही नबी सल्ल० ने सहाबा को सिखाया था) हमसे खो न जाये, इसलिये ऐ ज़ैद क्योंकि आप सच्चे इंसान हैं और नबी सल्ल० के लिए क़ुरआन लिखा करते थे, इसलिए आप उन आयतों को ढूंढिये (जिन्हें पहली बार नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था और आप सल्ल० ने उनको सुनकर उसकी किरअत की तस्दीक की थी, ताकि उन सब आयतों को इकट्ठा करके मास्टर कॉपी के तौर पर सुरक्षित कर लिया जाए और उसी किरअत के आधार पर क़ुरआन की और कई प्रतियां तैयार कर ली जाएं जिनको पढ़कर जल्द से जल्द और नए क़ारी तैयार हो सकें....
..... सोचकर देखिये कि जब इसी हदीस के मुताबिक़ क़ुरआन को पूरा कंठस्थ करने वाले बहुत से क़ारी अभी ज़िंदा हैं और बुख़ारी 61-525 के अनुसार क़ुरआन को नबी सल्ल० के ज़माने में ही जमा कर लेने वाले ज़ैद बिन साबित रज़ि० से मुखातिब हुआ जा रहा है, तब क़ुरआन की मूल आयतों की खोज का मक़सद सिवाय इसके क्या हो सकता है कि कुरआन की असल डायलेक्ट की तस्दीक की जाए, क्योंकि इस हदीस में क़ुरआन की किसी आयत के खो जाने का तो कहीं ज़िक्र है नही )
... ज़ैद बिन साबित ने शुरू में इस बात की ज़रूरत न होने की बात कही कि जब नबी ने अपनी ज़िंदगी में ये काम नहीं किया (किसी एक किरअत को रखने का आग्रह नही किया) तो हम लोग क्यों ऐसा करें ?? लेकिन बाद में ज़ैद बिन साबित मान गए, और क्योंकि उन्होंने क़ुरआन को बाय हार्ट याद भी किया था और पूरी लिखी हुई भी उनके पास मौजूद थी जिसमें बस कहीं कहीं डायलेक्ट/किरअत का हल्का सा फ़र्क हो सकता था सो अपनी और अन्य सहाबा की याददाश्त और पास मौजूद क़ुरआन की प्रति के आधार पर उन्होंने क़ुरआन की प्रत्येक उस आयत को ढूंढ लिया जिसे नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था, आख़िर में सूरह तौबा की कुछ आयतें जिनका ज़ैद बिन साबित रज़ि० को नबी सल्ल० द्वारा किरअत किया जाना याद था, वो कहीं नहीं मिलीं, और जाकर हज़रत अबी खुज़यमा रज़ि० के पास मिलीं, और जब इस तरह पूरा क़ुरआन शरीफ़ इकट्ठा हो गया तो इस पूरे ज़खीरे को हज़रत अबू बक्र के पास रखवा दिया गया, (क्योंकि ये खोज क़ुरआन के अहम हिस्से, उसकी असल किरअत के खो न जाने के डर से की गई थी, इसलिये इसकी बहुत सारी कॉपियां इसी समय बनाना ज़रूरी था, जो कि लगातार इस मास्टरकॉपी की मदद से बनवाई गईं) हज़रत अबु बक्र रज़ि० की वफ़ात के बाद ये हज़रत उमर के पास रहा और फिर हज़रत उमर के बाद बीवी हफ़सा रज़ि० के पास इसे महफ़ूज़ रखा गया....!!!
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... अब हमें ये मालूम है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में क़ुरआन की सारी मूल आयतों को एक जगह जमा करके रख दिया गया था, .... पर क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी अलग अलग वक्त की दो हदीसें मौजूद हैं जिनमें ज़ैद बिन साबित पर क़ुरआन की तरमीम का ज़िम्मा डाला गया था, एक हदीस यमामा के जंग के बाद की है और दूसरी इसके कई साल बाद हज़रत उस्मान की खिलाफत के दौर में इराक़ और शाम के लोगों में क़ुरआन की किरअत को लेकर इख़्तिलाफ़ के अंदेशे के वक़्त की.... दोनों अहादीस में रावियों ने हज़रत ज़ैद से एक ही बात कहलवाई है कि हमें नबी सल्ल० के वक्त में अलग अलग चीज़ों पर लिखी गई तमाम आयतें मिल गईं, मगर क़ुरआन की कुछ आयतें जो मुझे नबी सल्ल० की किरअत में याद थीं वो कहीं नही मिलीं, और आख़िरकार हज़रत खुज़यमा रज़ि० के पास वो मिलीं... फ़र्क़ इतना है कि पहली हदीस में अबी खुज़यमा रज़ि० के पास से मिली आयतें सूरह तौबा की बताई गई हैं और दूसरी हदीस में खुज़यमा बिन साबित रज़ि० के पास से सूरह अहज़ाब की"....
... लेकिन जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में सारी मूल आयतें इकट्ठा कर ली गई थीं, और उन्हें एक जगह सुरक्षित रख दिया गया था तो उन्हें दोबारा ढूंढने का सवाल कैसे उठता है ?? चाहे कोई भी आयत हो, हज़रत अबू बक्र के ज़माने की हदीस में बताया गया है कि तमाम आयतें मिल गई थीं.... यानी हज़रत ज़ैद बिन साबित का ये क़ौल पहली ही बार यानी हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने का है, रावियों ने जिसका वक्त भी गड्डमड्ड किया और आयतों के नाम भी और आयतें जिन सहाबियों से मिलीं उनके एक से नाम ज़ाहिर करते हैं कि ये एक ही बात एक ही सहाबी का ज़िक्र है जिसे ठीक से याद नहीं रखा गया
.... इसी तरह बुख़ारी किताब-61, हदीस-510 में लिखा है कि हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़माने में जब ज़ैद बिन साबित रज़ि० और दूसरे कातिबों को क़ुरआन की प्रतियां बनाने के लिए उस्मान रज़ि० ने नियुक्त किया तो बीवी हफ़सा रज़ि० से उन्होंने वो मास्टर कॉपी मंगाई जिसे हज़रत अबू बक्र के ज़माने में जमा किया गया था, इसके बाद हज़रत उस्मान ये बात कहते हैं कि किरअत में जहां बाक़ी के तीन कातिबों का हज़रत ज़ैद बिन साबित से इत्तेफाक न हो तो वो कुरैशी किरअत में क़ुरआन लिख लें, क्योंकि क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में नाज़िल हुआ था.... सवाल ये उठता है कि जब उनके सामने क़ुरैशी किरअत में लिखी हुई तमाम आयतों का मजमुआ मौजूद है तो किरअत में हज़रत ज़ैद से इत्तेफाक, या नाइत्तेफाकी का सवाल ही क्या ? वो तो अपने सामने मौजूद मास्टर कॉपी से नकल करेंगे न ? क्योंकि किरअत के हिसाब से वो मास्टर कॉपी ही परफेक्ट थी, इसीलिये तो उसे मंगाया गया था
...... ज़ाहिर होता है कि जैसे क़ुरआन की एक आयत खुज़यमा रज़ि० के पास मिलने की बात को दोनों हदीसों में गड्डमड्ड कर दिया गया, उसी तरह किरअत के मामले में ज़ैद बिन साबित रज़ि० से नाइत्तेफ़ाक़ी होने पर क़ुरैशी किरअत में कातिबों को क़ुरआन लिखने का हुक़्म देने की बात का सही वक्त भी इन एक सी दो हदीसों में रावियों ने गड्डमड्ड कर दिया है....
.... तर्क से सोचें तो ये हुक़्म उस वक्त का मालूम होता है जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में यमामा की जंग के बाद शुद्ध किरअत में जल्द से जल्द क़ुरआन की ढेर सारी कॉपियां बनाने का प्रयास किया जा रहा था, ताकि कारियों की एक बड़ी तादाद बनाई जा सके, लेकिन अभी तक पूरी मास्टर कॉपी को जमा नहीं किया जा सका था अलबत्ता काफ़ी सारी आयतों के मिल जाने बाद ये तय था कि पूरी क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में ही नाज़िल हुई है, और उसके पहले क्योंकि हज़रत ज़ैद बिन साबित के पास पूरी लिखित क़ुरआन मौजूद थी जिसमे कहीं कहीं क़ुरैशी किरअत नही थी सो अरब के लोगों के लिए क़ुरआन की अन्य प्रतियां बनाते हुए कातिबों के सामने ज़ैद बिन साबित की क़ुरआन मास्टर कॉपी के तौर पर रखी गई थी, इस हिदायत के साथ कि उसमें जहां ज़ैद बिन साबित ने क़ुरैशी किरअत न लिखी हो, वहां क़ुरैशी किरअत लिखकर कॉपीज़ बना ली जाएं....
.... फिर ये मालूम चलता है कि हज़रत उस्मान के ज़माने में किरअत को लेकर अरब में कोई नाइत्तेफ़ाकी नही थी, बल्कि नाइत्तेफ़ाकी का डर सिर्फ शाम और इराक़ के बीच था, यानी दूरदराज के इलाकों में जहाँ क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन नही पहुँची थी, इससे भी एक इशारा मिलता है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने से क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन के अरब में पढ़े सीखे जाने का सिलसिला जारी था....
.... सो हज़रत उस्मान रज़ि० ने अपनी ख़िलाफ़त के दौर में सिर्फ इतना किया कि उन्होंने उसी मास्टर कॉपी की मदद से और नई कॉपियां बनाने के लिए क़ुरआन के विशेषज्ञ हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को भी बुलाया और अन्य कातिबों को भी, इन सबने क़ुरैशी किरअत में क़ुरआन की प्रतियां बनाईं जिन्हें शाम और ईराक़ के अलग अलग प्रांतों में भिजवाकर हज़रत उस्मान ने अन्य किरअतों में लिखी क़ुरआन की प्रतियों को जनता के पास से उठा लेने का हुक्म दिया....
.... अन्य किरअतों को जलवा देने का हुक्म भी एक गढ़ी हुई बात महसूस होती है क्योंकि एक तो अन्य किरअतों में लिखी अल्लाह की ही बात थी, जिसको नष्ट करने की बात से ही नबी सल्ल० के साथी डरेंगे, और फिर अगर अन्य किरअतों को हज़रत उस्मान रज़ि० ने इस हद तक जाकर नष्ट करवाया होता तो ये किरअतें आज तक अरब देशों में मौजूद न होतीं, और पढ़ी और पढ़ाई न जा रही होतीं....
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.... बहरहाल हज़रत अबु बक्र रज़ि० और हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़मानों में क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी दोनों हदीसों को देखकर पता चलता है कि वहां मामला क़ुरआन को एक किताब का रूप देने का नही बल्कि दोनों ही वाकयों में क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन की कॉपियां बनाने का एक ही मामला था ....
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... और अंत में सूरह अबसा की वो आयतें, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि नबी सल्ल० के ज़माने में महज़ चमड़े और हड्डी पर नही, बल्कि क़ुरआन किताब की शक्ल में मौजूद थी..... "वे (क़ुरआन की आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत हैं, तो जो चाहे उसे याद कर ले - पवित्र पन्नों में अंकित हैं, प्रतिष्ठि्त, उच्च !! ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है, जो प्रतिष्ठित और नेक हैं" (क़ुरआन, 80:11-16)
रविवार, 17 जनवरी 2021
इस्लाम मे महिला पैगम्बर का न होना, क्या अल्लाह द्वारा स्त्रियों के प्रति पक्षपात है ?
औरत और पर्दा
क्या दोज़ख़ औरतों से भरी होगी ?
अक्सर ये आपत्ति जताई जाती है कि मेराज की रात मे रसूल सल्ल. ने दोज़ख मे बहुतायत से औरतों को देखा.. इसका अर्थ है कि अल्लाह स्त्री पुरुषों में लिंग के आधार पर भेद करता है और स्त्रियों को केवल उनके स्त्री होने के अपराध में दोज़ख मे भर देगा....!!!
.... आइये इस आपत्ति का उत्तर देख लें...!!!
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.... बेशक ऐसा कुछ हदीसो मे दर्ज है कि नबी सल्ल. ने जन्नत मे गरीब और सताए हुए लोगों को बहुतायत से पाया जबकि दोज़ख मे स्त्रियों को,
..... पर ऐसे दृश्य नबी सल्ल. ने क्यों देखे और क्यों उनका वर्णन किया ये समझने के लिए आपको ये बात दिमाग़ मे बिठानी चाहिए कि नबी सल्ल. अल्लाह की ओर से मानवजाति के लिए नियुक्त एक आध्यात्मिक गुरु हैं, और उन्हें जो कुछ भी दिखाया सुनाया जाता है वो अकारण नही, बल्कि मानवजाति को कोई अच्छी शिक्षा देने के लिए ही दिखाया सुनाया जाता है
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.... मेराज की रात को भी सिर्फ एक सैर या नबी सल्ल. को सम्मानित करने की दृष्टि से देखने की बजाय अपने दृष्टिकोण को थोड़ा और विकसित कीजिए, क्योंकि इस यात्रा के कई मकसद थे जिन्हें समझने की जरूरत है ...
.... सबसे पहले ये समझने की ज़रूरत है कि मेराज की रात की घटनाओं को कुरआन पाक सूरह बनी इसराईल की 60 वीं आयत मे एक "रुया" यानि प्रतीकात्मक दृश्य बताया गया है.... यानी इस रात में नबी सल्ल० द्वारा देखी, व अनुभव की गई बातों के गहरे निहितार्थ थे.... जैसे इस रात मे हज़रत मोहम्मद सल्ल० की तमाम नबियों से मुलाक़ात के पीछे ये निहितार्थ था, कि हर नबी एक दूसरे का मित्र और भाई है, और मुस्लिमों को भी हर नबी का उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना नबी सल्ल० का, मस्जिद ए अक्सा के स्थान पर पहुँचने का निहितार्थ था कि तमाम इसराइली नबियों की इबादतगाह रहा वो स्थल भी मुसलमानों के लिए क़ाबा शरीफ़ के बाद एक बरकतों वाला तीर्थ स्थल रहेगा
.... इसी अनुक्रम मे नबी सल्ल. को जन्नत और दोज़ख के प्रतीकात्मक दृश्य दिखाए गए थे, आप ये इस्लामी वविश्वास जानते होंगे कि भविष्य में होने वाली क़यामत से पहले तक इस संसार में मरने वाला कोई भी व्यक्ति जन्नत या दोज़ख में नही गया है, और अभी सभी मृतक एक ऐसे आयाम में हैं जिसे "बरज़ख़" कहा जाता है.... सो जब मेराज की रात में नबी सल्ल० को जन्नत में गरीब और सताए हुए लोग दिखाए गए, तो वो उस समय की वास्तविकता नही था, बल्कि केवल एक शैक्षिक दृश्य था, जिसके पीछे दुनिया में दुख और अभाव सह लेने, पर अत्याचार का मार्ग न लेने वाले लोगों को सांत्वना देने का उद्देश्य था जिन्होंने सत्यनिष्ठा पर चलते हुए कष्टपूर्ण जीवन गुजारना स्वीकारा है, तो उनके लिए ये खुशखबरी है कि वे तमाम सब्र करने वाले लोग जन्नत के अधिकारी होंगे...
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...इसी तरह इस रात मे दोज़ख मे औरतों को बहुतायत से आप सल्ल. को दिखाया जाना भी उस समय की वास्तविकता न होकर केवल एक प्रतीकात्मक व शैक्षिक दृश्य था,
...औरतों के बड़ी संख्या मे दोज़ख मे होने वाली हदीस मे आगे ये लिखा है कि क्योंकि औरतें अपने पति के साथ अकारण ही नाशुक्रगुज़ारी करती हैं, इस कारण स्त्रियों का दोज़ख मे होना दिखाया गया ... इस हदीस मे ये बात केवल ये शिक्षा देने के लिए की गई है कि अपनी मृत्यु से पहले ही स्त्रियाँ अपने दोज़ख मे जाने के एक सम्भावित कारण को जान लें और इस कारण, यानि नाशुक्री की आदत को त्यागकर अपना जन्नत मे जाना सुनिश्चित कर लें....
...... पवित्र क़ुरआन में बार बार तमाम स्त्री पुरुषों से यही कहा गया है कि वो जीवन मे अपने कर्म सुधार लें तो उनका जन्नत में जाना निश्चित हो जाएगा, और जन्नत और दोज़ख का फ़ैसला प्रत्येक के कर्मों के आधार पर होगा, न कि लिंग के आधार पर
..... न किसी के स्त्री होने के आधार पर उसे दोज़ख में भेज दिया जाएगा और न किसी के केवल पुरूष होने भर पर वो जन्नत का अधिकारी हो जाएगा... पवित्र कुरआन में स्त्री पुरूष में कर्मों के प्रतिदान में समानता की ये बात बहुत स्पष्टता से इस तरह बता दी गई है
..... " मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठा्पूर्वक आज्ञापालन करनेवाले पुरुष और निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करनेवाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्य रखनेवाली स्त्रियाँ, विनम्रता दिखानेवाले पुरुष और विनम्रता दिखानेवाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देनेवाले पुरुष और सदक़ा देनेवाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखनेवाले पुरुष और रोज़ा रखनेवाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करनेवाले पुरुष और रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करनेवाले पुरुष और याद करनेवाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है"
(सूरह अहज़ाब, आयत-35)
..... तो वास्तव मे शबे मेराज मे नबी सल्ल. को दिखाए गए वो दृश्य केवल भले पुरूषों और भली स्त्रियों को छोटी छोटी उन गलतियों के प्रति भी चेताते हैं, जिनकी ओर आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता, और इन गलतियों को करते वक्त कोई ये नहीं सोचता कि वो गलत कर रहा है, तो नबी सल्ल० द्वारा इन छोटी छोटी गलतियों के प्रति भी ईमानवाले स्त्री पुरुषों को सचेत कर के उन्हें पूरी तरह पवित्र हो जाने की सीख दी गई है, ... वास्तव मे उस समय तक कोई भी प्राणी जन्नत या दोज़ख मे नही गया था, और न ही अकारण कोई स्त्री या पुरुष दोजख मे कभी जाएंगे ही, बल्कि उस वृत्तांत पर ध्यान देकर सावधान हो जाने वाले लोग तो अपना दोज़ख़ में जाना टाल लेंगे ... इन शा अल्लाह...!!





