मंगलवार, 25 मई 2021

इस्लाम मे व्यभिचार का दंड

इस्लाम मे व्यभिचार का दण्ड .... विरोधी ऐसा दिखाते हैं, जैसे इस्लाम मे किसी भी तरह के व्यभिचार पर मौत का दण्ड है, और वो भी केवल औरत को .... पर ऐसा नहीं है ॥ एडल्टरी यानि व्यभिचार की तीन कैटेगरीज़ हैं पहली किसी पुरुष का किसी स्त्री के साथ जबरन बलात्कार ... इसमें पुरुष के लिए कठोरतम दण्ड मौत की सजा है जबकि स्त्रियों के साथ सहानुभूति ॥ दूसरी कैटेगरी जिसमें अविवाहित स्त्री पुरुष कामोत्तेजना को निकालने के वैध मार्ग के अभाव मे एक दूसरे की सहमति से सहवास करते हैं, इस मे मौत की सजा नहीं है बल्कि 100 कोड़े का दण्ड स्त्री पुरुष दोनों को है ! तीसरी कैटेगरी, जब विवाहित स्त्री पुरुष अपने पति और पत्नी को धोखा देकर अन्य किन्हीं स्त्री पुरूषों के साथ सहमति से सम्भोग करते हैं तो उन दोनो के लिए कठोर दण्ड है (न कि केवल स्त्री के लिए ) .... ये दण्ड यदि कानून मौत की सजा निर्धारित करे तब भी वो न्यायोचित है ... कैसे न्यायोचित है और व्यभिचार पर दण्ड क्यों है वो मेरे इस लेख पर पढ़ लें और कृपया कोई भी प्रश्न इस लेख को पूरा और ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद ही करें .... कुछ भाईयों की इस्लामी शरीयत मे वर्णित सख्त सज़ाओं के प्रावधान के विषय मे विशेषकर दो आपत्तियां जताते हैं .... पहली आपत्ति ये, कि चोरी या व्यभिचार जैसे "छोटे" अपराधों पर शरीयत मे अपराधी के हाथ काटने और मृत्युदण्ड जैसी सख्त सज़ाएं देना क्रूरता और अमानवीयता है .. और दूसरी ये कि शरीयत मे हत्या और बलात्कार आदि जैसे अपराधों पर भी मृत्युदण्ड देना ठीक नही क्योंकि जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो किसी के प्राण लेने का भी हमें कोई अधिकार नही है ....!! मित्रों । अस्ल में होता ये है कि व्यभिचार की सजा का विरोध करने वाले लोग अक्सर खुद को किसी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट दिलाने की बात दिमाग मे रखकर व्यभिचार की गम्भीर सजा पर आपत्तियां जताते हैं, लेकिन वे ही लोग अपने दिल पर हाथ रखकर सोचे कि क्या वे अपनी मां, बहन, बेटी, पिता और बेटों को भी कई अलग अलग लोगों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने को प्रोत्साहित करना चाहेंगे ..?? निश्चय ही वे ऐसा नहीं चाहेंगे, बल्कि वे चाहेंगे कि उनके माता पिता एक दूसरे के प्रति वफादार रहें, और उनका जीवनसाथी उनके प्रति निष्ठावान रहे वे नही चाहेंगे कि उनके माता पिता, बहन बेटी या पत्नी के अवैध सम्बन्धो के कारण उनके घर की सुख शांति और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाए , इसलिए वे अपने परिवारीजनो को इस प्रकार के किसी भी सम्बन्ध से हर हाल मे दूर रखना चाहेंगे शरीयत मे बताई गई सज़ाओं का मोटिफ भी यही है , कि उसके कार्यक्षेत्र मे आने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को किसी भी कुकर्म से भरसक बचाकर रखे .... और जैसा कि मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि, शरीयत मे कुछ विशेष अपराधों के लिए सख्त सज़ाओं का प्रावधान इसलिए नहीं कि ईश्वर अपने बंदो को मरवा देना चाहता है, बल्कि ये प्रावधान इसलिए है ताकि जो व्यक्ति थोड़े से आनन्द की प्राप्ति के लिए कोई अपराध करना चाहता हो, तो वो उस अपराध की भयंकर सजा के बारे मे सोचकर बुरी तरह से डर जाए, और अपराध करने की सोच ही न पाए .... फिर जब अपराध ही न होगा तो मौत की सज़ा से मारा कौन जाएगा ?? लेकिन इस सख्त कानून के लागू होने के बावजूद यदि कोई अपराधी कानून को धता बता कर दण्डनीय अपराध करे तो इसका मतलब यही है कि उस अपराधी ने पकड़े जाने की हालत मे अपना अन्जाम जानते बूझते ये अपराध करने का फैसला किया था, अगर वो सख्त सजा से डर जाता तो ये अपराध ही न करता .... तो फिर जो व्यक्ति खुद सख्त सजा पाने को तैयार हो उस समाज मे बिगाड़ पैदा करने वाले अपराधी से किसी को भी किसी तरह की सहानुभूति क्यों हो ?? दूसरी बात शरीयत यदि अन्यायपूर्ण ढंग से काम करे, यानि किसी निरपराध को दण्ड दे, या फिर किसी मुजरिम को उसके जुर्म पर ऐसा कठोर दण्ड दे, जिसके बारे मे मुजरिम को पहले से चेतावनी न दी गई हो , तब तो शरीयत की सज़ाओं पर ऐतराज करने का कोई तुक भी है.... लेकिन शरीयत कानून सिर्फ अपराधियों के लिए बुरा है , ये सदाचारी, शांतिप्रिय और निरपराध लोगों पर कोई सख्ती नहीं करता, बल्कि ये तो कानून का पालन करने वाले सज्जन लोगों का जीवन सुगम ही बनाता है.... पता नहीं वे लोग अपराधियों के क्या लगते हैं, जो शरीयत का विरोध किया करते हैं ...??? शरीयत कानून किसी के जुर्म करने से पहले ही उस जुर्म के लिए नियत सज़ाओं का ऐलान कर देता है, ताकि वो जुर्म करने को इच्छुक कोई भी व्यक्ति उस जुर्म का अंजाम पहले से जान रखे , और सजा के भय से ही सही, खुद को जुर्म करने से बचाए रखे ..... यदि इसके बावजूद कोई व्यक्ति अपराध कर बैठता है तब भी शरीयत दोषी को अन्यायपूर्ण ढंग से सजा नही देती, बल्कि पहले कोर्ट मे जुर्म के सभी पहलुओं पर विचार किया जाता है, देखा जाता है कि अपराध अगर किसी मजबूरी के तहत विवश होकर किया गया है, तो सज़ा माफ या कम भी की जा सकती है उदाहरणार्थ विवाह न हो पाने के कारण अपनी कामोत्तेजना के आगे विवश होकर यदि कुंवारे स्त्री पुरुष व्यभिचार कर बैठें, तो उन्हें मौत की सजा शरीयत नहीं देगी, मौत की सजा केवल उनके लिए है जो लोग विवाहित होकर भी व्यभिचार मे लिप्त रहे हों , यानि जिनके पास अपनी कामवासना की पूर्ति का वैध साधन होने के बावजूद, यानि कामोत्तेना से विवश होकर नहीं बल्कि जिन्होंने केवल मनमानी करने को कानून का उल्लंघन किया हो, केवल वे ही लोग कठोर सजा के अधिकारी हैं शरीयत की नजर मे .......... इसी तरह भूख या गरीबी से विवश हो कर कोई व्यक्ति चोरी कर बैठे तो शरीयत उसका हाथ काटने का हुक्म नहीं देती बल्कि हाथ काटने की सजा केवल उसको सुनाई जाती है जो व्यक्ति बिना किसी मजबूरी के सिर्फ ऐश करने के लिए चोरियां किया करता है यानि, कठोर सजा केवल उन्हीं व्यक्तियों को उनका जुर्म कोर्ट मे पूरी तरह सिद्ध हो जाने के बाद दी जाती है जो सजा के अंजाम से भली भांति परिचित होकर भी, किसी मजबूरी या दबाव के न होने के बावजूद, कोई अनुचित लाभ या अनुचित आनंद लेने के लिए अपराध करते हैं शरीयत का विरोध अक्सर इस सोच के कारण किया जाता है क्योंकि लोग सोचते हैं कि जिन देशों इतने कठोर कानून होते हैं , वहाँ का हर नागरिक एक घुटन और तनाव मे जीता होगा,पर ऐसा नहीं है, आप विश्व के उन अनेक विकसित देशों का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ नशीली वस्तुओं के व्यापार और भ्रष्टाचार जैसे मामूली जुर्म पर मौत की सजा देने का कानून लागू है, लेकिन खुशहाली इन देशों मे भारत से कहीं अधिक ही पाई जाती है अमरीका जैसे विकसित देश में ही विभिन्न अपराधों पर बिना किसी रियायत के लगातार मृत्युदण्ड दिया जाता है, अमेरिका मे कानूनों का सख्ती से पालन किया जाता है, कितने लोग सोचते हैं कि अमेरिका के नागरिकों का जीवनस्तर भारतीयों से खराब है ??? बल्कि भारत के मुकाबले इन देशों मे जीवन प्रत्याशा,स्वास्थ्य और खुशहाली कहीं अधिक है क्या घुटन और तनाव के वातावरण मे जनता का अच्छा स्वास्थ्य और खुशहाली सम्भव है ?? नही न.... बल्कि इन देशों मे लागू कठोर कानूनों ने वहाँ आम जनता का जीवन भ्रष्टाचार, गुण्डागर्दी और किसी भी प्रकार के अपराध के डर से बिल्कुल मुक्त कर दिया है, जिससे वे लोग ऐसा चिंतामुक्त और खुशहाल जीवन जीने लगे हैं जैसे जीवन की आज हम अपने देश मे रहते हुए कल्पना भी मुश्किल से कर पाते हैं वास्तव में किसी भी देश मे न्याय व्यवस्था बनाए रखने के लिए ,वहां के निवासियों मे कानून का डर होना जरूरी है, और कानून का डर होने के लिए उस कानून मे सख्त सजाओं का प्रावधान होना भी जरूरी है, इसी कारण हमारे देश भारत और चीन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, जापान तथा अमेरिका समेत 39 देशों ने 2012 में संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में मृत्युदण्ड उन्मूलन के लिए रखे गये वैश्विक प्रस्ताव का विरोध किया था,

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें