मंगलवार, 25 मई 2021
बनू क़ुरैज़ा का मामला क्या था ?
बहुत से भाई हैं जो इब्न इस्हाक़, तबरी और हिशाम के द्वारा लिखे तथाकथित इस्लामी इतिहास में वर्णित "बनु क़ुरैज़ा" क़बीले के यहूदियों को मुस्लिमों द्वारा मौत की सज़ा दिए जाने के अन्यायपूर्ण वर्णनों पर सवाल उठाते हैं.... लेकिन इस मामले में सबसे पहले ये बात दिमाग में रख लेनी चाहिए कि नबी सल्ल० और सहाबा के विषय में तारीख़ के किस्से प्रमाणिक नही हैं, बल्कि इनसे ज़्यादा प्रमाणिक बातें सही हदीस की होती हैं
.
....तो हदीसों से इस मामले में ये पता चलता है कि बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे
लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ..
अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने की थी, जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया (अबु दाऊद 3004 व 3005)
फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए, ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए
अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा
इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते...
अंततः एक झड़प के बाद यहूदी पकड़े गए, और जब इन्हें सज़ा देने का समय आया तो बुख़ारी और मुस्लिम में दर्ज अहादीस के अनुसार इन लोगों ने साद बिन मुआज़ रज़ि० से अपना फैसला करवाना चाहा, साद बिन मुआज़ पहले यहूदी ही थे और कुछ समय पहले मुस्लिम हुए थे, बनू क़ुरैज़ा वालों ने शायद ये सोचा होगा कि पहले यहूदी रहने के नाते साद गलत तरीके से बनु क़ुरैज़ा वालों को फ़ायदा पहुंचाएंगे... मगर जब फ़ैसले का दारोमदार हज़रत साद पर आ गया और उसमें नबी सल्ल० का इन्टरफेयरेन्स नही रहा तो साद बिन मुआज़ ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले, और मुस्लिमों का नरसंहार करने की साज़िश करने वाले बनू कुरैज़ा के मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और लड़कों को गुलाम बनाया जाए ..
.
ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने शत्रुओं और षणयंत्र करने वालों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस में आप देख सकते हैं.... क्योंकि साद पहले से इस कानून के करीब रहे थे सो उन्होंने ये सज़ा बनु क़ुरैज़ा के दोषियों को दी....
.
.... वैसे हमें ये यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. से करवाने का इसरार किया होता तो जिन यहूदियों को हज़रत साद ने मौत की सज़ा दे दी, नबी सल्ल० उन पर भी रहम फ़रमा देते, जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी
फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी)
.
याद रखिए साद रज़ि० ने कत्ल करने की सजा उन्हीं पुरुषों और गुलाम बनाने की सज़ा उन्हीं स्त्रियों व किशोरों को दी थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे, और जो यहूदी मुस्लिमों के साथ युद्ध में शामिल नही थे, उनको बिल्कुल नहीं छेड़ा गया था..
.
.... इब्न इस्हाक़, एवम इनके बाद के इतिहासकारों ने बिना किसी आधार के भारी संख्या मे बनू कुरैज़ा के पुरूषों की हत्या की बात लिखी है, जो कि पूरी तरह अस्वीकार्य है, चूंकि इस्लाम मे जान के बदले जान का नियम है, तिस पर भी माफी को वरीयता दी गई है, ... तो उन यहूदियों द्वारा यदि अधिक मुस्लिम नहीं मारे गए थे तो मृत्युदण्ड भी अधिक लोगों को नहीं दिया जा सकता था ... उसपर इनमें से कई लोग अलग अलग कारणों से मौत की सजा से बचा लिए गए थे तो मौत की सजा पाने वालों का आंकड़ा मैं नहीं समझता कि 15-20 से ऊपर जा सकता है, यानी जितने मुसलमान इनकी वजह से मारे गए, उससे कम ही इनका आंकड़ा रहेगा...!!
.
..... और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे...
बल्कि मुस्लिमों को तो क़ुरआन में स्पष्ट आदेश दे दिया गया था कि युद्धबन्दियों को मुसलमान सदा के लिए गुलाम बनाकर नही रख सकते, बल्कि या तो उनसे कुछ अर्थदंड लेकर उन्हें रिहा कर दें, या बिना कुछ लिए, एहसान के तौर पर उनको रिहा कर दें.... इसके सिवाय तीसरा कोई रास्ता युद्धबन्दियों के लिए क़ुरआन ने नही बताया है ...(क़ुरआन 47:4) ... तो बनू क़ुरैज़ा के युद्धबन्दियों को भी कुछ समय बाद स्वतन्त्र कर दिया गया था....!!!
.....बनु क़ुरैज़ा से मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध करने आई स्त्रियों में बंदी बनाई गई एक स्त्री रेहाना बिन्त ज़ैद के विषय में भी तारीख़ ए तबरी आदि में जो बातें लिखी गई हैं कि नबी सल्ल० ने दासी के तौर पर रेहाना को अपने पास रखा था, वो क़ुरआन के उपरोक्त आदेश को देखते हुए विश्वास योग्य नहीं हैं, बल्कि वे स्रोत जो ये कहते हैं कि रेहाना बिन्त ज़ैद को आज़ाद कर दिया गया था, जिसके बाद वो मुस्लिम बन गईं, और उसके बाद सम्भवतः नबी सल्ल० के निकाह में वो आईं, वो क़ुरआन के अनुसार ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं
..... जबकि मौलाना शिबली नोमानी जैसे विद्वानों का ये भी विचार है कि रेहाना बिन्त ज़ैद को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, मुस्लिमों ने आज़ाद कर दिया था और वो अपने लोगों में जाकर रहने लगी थीं, उनका नबी सल्ल० के साथ कभी कोई सम्बन्ध नही रहा था.... यानी इस विषय में कोई एक प्रमाणिक बात नही है॥
.
... ये ध्यान रखिये कि क़ुरआन एकमात्र वो प्रमाणित पुस्तक है, जिसमें शुरू से लेकर आज तक कोई परिवर्तन नही आया, इसलिए मुस्लिम इतिहास के विषय में, सबसे प्रमाणिक बात क़ुरआन से पता चलती है,
.... फिर हदीसों को भी व्यक्ति के सच्चा होने का पूरा पता लगा लेने के उपरांत ही लिखा जाता था, इसलिये हदीसों की बातें भी मानी जाती हैं...
.... लेकिन हदीसों के लिखे जाने में जो सावधानी बरती गई, उस सावधानी का इस्लामी तारीख़ के नाम पर लिखी गई किताबों में सर्वथा अभाव रहा ... इब्ने इस्हाक़, हिशाम और तबरी ने क्रमशः नबी सल्ल० के सौ, दो सौ और ढाई सौ साल बाद आप सल्ल० का इतिहास लिपिबद्ध किया इन्होंने समाज में कहे सुने जा रहे किस्सों को कहने वाले व्यक्ति की नबी सल्ल० से सम्बद्धता है या नहीं, उसने जिन स्रोतों से ये बातें सुनी, वे कितने सच्चे थे, इन बातों पर ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपने विवेक के आधार पर उन किस्सों को लिख लिया, इसलिये ये किस्से लिखे जाने के समय ही संदिग्ध थे, और हम तक पहुँचते पहुँचते इनमें कितना बदलाव हो चुका है, ये कहना भी मुश्किल है, इसलिए तारीख की ये किताबें अधिक विश्वासयोग्य भी नही ठहरती हैं, ये ध्यान रखना चाहिए...!!!
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें