मंगलवार, 26 जनवरी 2021

क़ुरआन में मोहकम और मुतशाबेह आयतें क्या हैं ?

 क़ुरआन में मोहकम और "मुताशाबेह" (इस शब्द में "त" को थोड़ा सा खींचा जाएगा इसलिये मैं "त" में आ की मात्रा लगा रहा हूँ, वैसे आमतौर पर मात्रा नही लगाते, क्योंकि "आ" की मात्रा के बराबर शब्द को नही खींचा जाता) आयतों के विषय में अपने हिसाब से समझकर सवाल उठाने वाले लोग सवाल करते हैं कि अल्लाह ने क़ुरआन को इंसानों की हिदायत के लिए नाज़िल करने का दावा किया है तो अल्लाह ने क़ुरआन में "मुताशाबेह" आयतें क्यों नाज़िल कीं जिनके बारे में अल्लाह कहता है कि इन आयतों को इंसान समझ ही नहीं सकता, सिर्फ़ अल्लाह समझ सकता है....!!!

.... ऐसी इंसान को न समझ आने वाली आयतें क़ुरआन में नाज़िल करके अल्लाह ने क़ुरआन के आसान होने की अपनी ही बात से अंतर्विरोध नही पैदा किया ??

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..... दरअसल ऐसा सवाल अरबी की बेसिक जानकारी भी न होने की वजह से लोग करते हैं, ... वरना थोड़ी बहुत अरबी की समझ रखने वाले भी जानते हैं कि "मुताशाबेह"  शब्द का अर्थ होता है "मिलती जुलती शक्ल वाली कोई चीज़" ... और मोहकम का अर्थ होता है "किसी चीज़ को मज़बूत या स्पष्ट बनाना", 

... इन नामों से ही ज़ाहिर हो जाता है कि क़ुरआन की इस आयत में बात क्या कही जा रही है, .... 

"वो अल्लाह ही है जिसने तुमपर अपनी ओर से किताब उतारी, उसमें कुछ मोहकम (सुदृढ़) आयतें हैं जो किताब का मूल और सारगर्भित रूप हैं और दूसरी मुतशाबेह, तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ हैं वो उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाल लें हालाँकि ख़ुदा के सिवा उनका असली मतलब कोई नहीं जानता, और जो लोग ज्ञान के पक्के वो कहते हैं, कि हम हर उस बात पर ईमान लाए, जो हमारे रब ही की ओर से हैं।" और चेतते तो केवल वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं (सूरह आले इमरान, आयत 7)

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 ..... असल में यहां अल्लाह का ये फ़रमान है कि मुताशाबेह आयतें जो अल्लाह के स्थान, परलोक, इंसान की मौत के बाद और इंसान के दुनिया में अस्तित्व लेने से पूर्व की स्थितियों के बारे में बताती हैं वो केवल मिसालों के माध्यम से कही गई बातें हैं और उनकी सही सही तस्वीर समझना इंसान के वश की बात इसलिए नही है क्योंकि इंसान ने कभी उन स्थितियों को अपनी आंख से नही देखा... तो ऐसी स्थितियों पर एक ख़ाका सा खींचा गया है जिसे पूरी तौर पर इंसान तभी समझ पायेगा जब वो मरने के बाद उन स्थितियों को खुद अनुभव कर लेगा... क़ुरआन में ये भी कहा गया है ये मुताशाबेह यानी मिसाली आयतें असल क़ुरआन नही हैं,

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.... असल क़ुरआन मोहकम आयतें हैं जो दुनिया में आदर्श तरीके से जीने के बारे में इंसान को हुक़्म देती हैं और इंसान को उन्हीं स्पष्ट आयतों पर ध्यान देना चाहिए, ... लेकिन लेकिन जिन लोगों के दिलों में टेढ़ है, यानी जो लोग शैतान के कब्जे में हैं वो मुताशाबेह आयतों को लेकर या मुसलमानों के साथ उपहास करते हैं, या उनको तरह तरह से बहकाने की कोशिश में लगे रहते हैं कि आयतों का गलत अर्थ निकालकर अल्लाह के बन्दों को राह से भटका सकें.

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.... तो ऐसा नहीं है कि इंसान मुताशाबेह आयतों को बिल्कुल ही नहीं समझ सकता, बल्कि परलोक के बारे में क़ुरआन में जो मिसालें दी गई हैं, उन आयतों से इंसान परलोक के विषय में कल्पना कर सकता है, पर उसकी ये कल्पना किस हद तक सही बैठी, इस बात का फैसला इस जीवन में नही हो सकता.... हां ये है कि बात को समझने लायक एक आइडिया उसको मिल जाएगा, 

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......ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि इंसान किसी भी अनजानी चीज़ के लिए अगर अनुमान लगाता है तो उस अनुमान को वो अपने किसी पुराने अनुभव के आधार पर लगाने की कोशिश करता है, पर अगर बताई जा रही चीज़ की मिसाल उस व्यक्ति की पहले से देखी गई किसी वस्तु से न मिलती हो तो व्यक्ति के लिए बताई जा रही वस्तु की पूरी तरह सही कल्पना करना सन्देहास्पद रहता है, ..... ये स्पष्ट है कि किसी अनदेखी चीज़ को बताने का सबसे सही तरीका यही होता है कि उसे उसकी जानी समझी चीज़ों की मिसाल देकर बात को समझाने की कोशिश की जाए, जिससे वो बात को काफी हद तक सही सही समझ सके... 

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...चौदहवीं शताब्दी में इब्नबतूता ने अपने देश के लोगों को अपने यात्रा वृतांत में देखे एक अनोखे फल के बारे में बताने की कोशिश की जो फल उनके देश में नही पाया जाता था और किसी ने नही देखा था, ....

.... इब्नबतूता ने लिखा कि "ये लकड़ी का फल इंसान की खोपड़ी जैसा दिखता है, इसमें भी दो आंखें और मुँह की बनावट दिखाई देती है, और इसमें इंसान के सर में लगे बालों की तरह ही बाल भी होते हैं...."

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.... क्योंकि इस फल जैसी कोई चीज़ उनके देशवासियों ने पहले देखी नही थी, सो उन्होंने मिलते जुलते उदाहरण से बात को समझाने की कोशिश की... हालांकि इस वर्णन से उनके देश के लोगों ने किसी फल कल्पना कर ही ली होगी, लेकिन वो कल्पना एक हद तक ही उस फल जैसी होगी, ... आपको बता दूं कि ये वर्णन इब्नबतूता ने नारियल के फल का किया था, वाक़ई में उन्होंने उदाहरण तो मिलता ही जुलता दिया था... लेकिन नारियल की असल तस्वीर उनके देशवासियों को तभी समझ आई होगी, जब उन लोगों ने नारियल को अपनी आंखों से देख लिया होगा....!!!

.... यही मामला मुताशाबेह आयतों का है... हमारे एक अनुमान लगाने लायक उदाहरण दे दिया गया है, बाक़ी पूरी असलियत उन बातों को साकार देख लेने के बाद समझ आ जाएगी

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...... अब क्योंकि हमारे ज़िंदा रहते न हम मौत के बाद की परिस्थितियों का अनुभव कर सकते हैं और न हमारे सांसारिक जीवन के लिये मौत के बाद के जीवन के दृश्यों को साकार देखना जरूरी ही है.... बल्कि हमारे सांसारिक जीवन के लिए परोपकार करते हुए जीना, सामाजिक न्याय और प्रेम का वातावरण बनाना और अपराधों पर अंकुश लगाना ज़्यादा ज़रूरी है, सो इन्ही सारे सांसारिक जीवन के लिए दिशानिर्देश देने वाली मोहकम यानी स्पष्ट आयतों के बारे में कहा गया कि असल क़ुरआन ये हैं और इन पर ही ध्यान देना और पूर्ण रूप में समझना ज़्यादा ज़रूरी है, सो ये आयतें स्पष्ट हैं ही !!!

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