अक्सर कुछ हदीसों की बुनियाद पर ये कहा जाता है कि क़ुरआन नबी सल्ल० के ज़माने में एक किताब की शक्ल में नही लिखा गया था और क़ुरआन की सूरतों के पढ़ने या याद करने के लिए भी कोई क्रम नही था, नबी सल्ल० की वफ़ात के कई साल बाद जाकर क़ुरआन को एक किताब की शक्ल देने की कोशिश की गई और लकड़ी, चमड़े, हड्डी वगैरह पर लिखी आयतों को ढूंढ कर एक किताब में लिखा गया... इस बीच क़ुरआन की कई आयतों के खो जाने की हदीसें भी मिलती हैं और ये हदीसों में मिलता है कि अलग अलग प्रकार की क़ुरआन लिख ली गई थीं, जिन्हें बाद में हज़रत उस्मान रज़ि० ने जलवा दिया था... ऐसे में क़ुरआन की विश्वसनीयता का क्या प्रमाण रह जाता है ??
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उत्तर- ये एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है कि नबी सल्ल० के सामने क़ुरआन एक किताब की सूरत में नही लिखा गया था... असलियत इसके उलट है, मैं हमेशा आपसे कहता हूं कि पहले क़ुरआन पढ़िये और फिर हदीसों को क़ुरआन की बात के मुताबिक़ समझिये, और क़ुरआन के मुताबिक बात कहने वाली हदीसों को कुबूल कीजिये और क़ुरआन से टकराने वाली बातों को छोड़ दीजिये....
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... क़ुरआन में सूरह क़ियामा, सूरह नम्बर 75 की 16 से 19 तक आयतों को पढ़िये "(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो ! उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है ! तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह उस किरअत की इत्तेबा करना ! फिर उस के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है"
... मौलाना हमीद्दुदीन फ़राही के मुताबिक़ यहां अल्लाह ने नबी सल्ल० को ये भरोसा दिलाया है कि जो काफ़िर इस क़ुरआन के एक ही बार में पूरा न नाज़िल होने का ताना देते हैं, उनके तानों से रसूल परेशान न हों बल्कि इस किताब का जमा करना (यानी सारी आयतों को एक जगह एक तरतीब से रखना) फिर किरअत करना/पढ़वा देना (यानी नई तरतीब के साथ याद भी करा देना) अल्लाह ने अपने ज़िम्मे लिया है और नबी सल्ल० की ज़िंदगी में ही ये काम कर देने का भरोसा अल्लाह ने उन्हें उसी दौर में दिला दिया था, जब आप सल्ल० मक्का में ही थे और मदीना तशरीफ़ नही लाये थे.... ज़ाहिर है जिब्रील नबी सल्ल० के ज़रिये ही अल्लाह की बात दुनिया तक पहुँचाते थे, सो अल्लाह के ये तमाम वादे नबी सल्ल० के ज़माने में ही पूरे होने ज़रूरी थे,
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.... क़ुरआन की इन आयतों को देखने के बाद अब हदीसों को देखिये.... बुख़ारी शरीफ़ किताब 61, हदीस नम्बर-519 और 520 पर दर्ज हदीसें देखिये कि "हर साल रमज़ान में नबी सल्ल० के सामने जिब्रील क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा करते थे, फिर आप सल्ल० उसे पूरा पूरा जिब्रील को सुनाया करते थे और जिस साल आप सल्ल० की वफ़ात हुई उस साल नबी सल्ल० ने दो बार पूरे क़ुरआन पाक को जिब्रील अलैहिस्सलाम के सामने दोहराया" तो पक्के तौर पर इस बात पर मुहर लग जाती है कि ये क़ुरआन को एक नई तरतीब से जमा करके, नबी सल्ल० के सामने वो किरअत पढ़कर आप सल्ल० को याद करा देने के अल्लाह के उसी वादे पर अमल था जो वादा क़ुरआन की सूरह क़ियामा मे मौजूद है,
.... यही किरत और तरतीब आप सल्ल० ने तमाम सहाबा को भी बताई और अनगिनत सहाबा ने इसे पूरा पूरा क्रमवार याद कर लिया,
.... इसके अलावा बुख़ारी शरीफ़ किताब-61, हदीस-525 में ये भी मिलता है कि उबई इब्ने क़ाब, मुआज़ बिन जबल, ज़ैद बिन साबित और अबू ज़ैद, इन चार अंसारी सहाबियों ने नबी सल्ल० के ज़माने में ही क़ुरआन को जमा कर लिया था....
....जबकि दूसरी अहादीस से मालूम चलता है कि क़ुरआन की आयतों को नबी सल्ल० के हुक़्म पर लिखने वाले कातिबों की तादाद कहीं ज़्यादा थी, तो सिर्फ इन चार लोगों का ज़िक्र क्यों ?? मालूम चलता है कि यहां पूरी क़ुरआन को जमा करके एक किताब की शक्ल देने का ज़िक्र है, न कि चन्द सूरतों को, और क्योंकि ज़ैद बिन साबित रज़ि० उस वक्त नबी सल्ल० के साथ होते थे जब आप सल्ल० जिब्रील को नई तरतीब के साथ क़ुरआन सुनाते थे, तो हम समझ सकते हैं कि ज़ैद बिन साबित और बाक़ी तीनों अंसारी सहाबा ने भी क़ुरआन के जमा करते वक्त नई तरतीब का एहतमाम किया था, तो इस तरह क़ुरआन अपनी मौजूदा तरतीब के साथ ही नबी सल्ल० के सामने ही किताब की शक्ल में भी मौजूद था और इसी तरतीब के साथ सैंकड़ों की तादाद में सहाबा को हिफ़्ज़ तो था ही...
... और आप सल्ल० ने हज्जतुल विदा में इसी किताब के भरोसे फ़रमाया था कि तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक तो अल्लाह की किताब और दूसरे अपनी सुन्नत, इनको मज़बूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह न होगे" ....
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.... और जब अलग अलग जगह लिखी हुई और सैंकड़ों सहाबा की स्मृति में क़ुरआन की सारी आयतें महफ़ूज़ थीं तो अलग अलग स्थानों पर रखी आयतों के खो जाने की हदीसों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, उनसे क़ुरआन की सम्पूर्णता को कोई फ़र्क नही पड़ता....!!
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....अब सवाल उठता है कि बुख़ारी की हदीस में फिर क्या लिखा है कि यमामा की जंग में जब बड़ी तादाद में क़ुरआन को बाय हार्ट याद करने वाले सहाबियों की शहादत हो गई तब ये डर दरपेश आया कि कहीं क़ुरआन न खो जाए इसलिए उसे लिखकर रख लेने का आइडिया आया....??
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..... देखिये, दरअसल वहां मामला क़ुरआन की आयतों के खो जाने का नही था, क्योंकि हदीसों के मुताबिक़ ही क़ुरआन तो किताब की शक्ल में नबी सल्ल० के ज़माने से ही मौजूद थी, तो यमामा की जंग के बाद के मौक़े पर क़ुरआन के खोने का नही बल्कि क़ुरआन के असल डायलेक्ट, जिसमें वो नाज़िल हुआ था उसके संरक्षण की फ़िक्र का मामला था.... यमामा की जंग में शहीद होने वाले सहाबियों के लिये हदीस में लफ़्ज़ "क़ुर्रा" आया है, जो लफ़्ज़ 'क़ारी' का बहुवचन है, और क़ारी का मतलब होता है वो शख्स जो क़ुरआन को विशेष लहजे और उच्चारण के साथ यानी एक विशेष बोली में पढ़ सकता है, यानी ये शहीद वो लोग थे जिन्हें आप सल्ल० ने विशेष ढंग से क़ुरआन की किरअत सिखाई थी... दरअसल उस समय अरब में सात अलग अलग प्रकार की अरबी बोलियां (किरअतें) प्रचलित थीं .... ऐसा हर एक भाषा में होता है, हमारी हिंदी में भी अनेकों बोलियां प्रचलित हैं जिनमें एक ही शब्द को अनेकों तरह के उच्चारण के साथ बोला जाता है पर उससे उसका अर्थ नहीं बदलता, उदाहरण के लिए "विश्वास" शुद्ध हिंदी का शब्द है, लेकिन इसी शब्द के दूसरे डायलेक्ट "बिस्वास" को हमारे देश में बड़ी संख्या में बोला जाता है, इससे शब्द का अर्थ नहीं बदलता, लेकिन उच्चारण बदल जाता है और अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलने वाला व्यक्ति देहात के किसी व्यक्ति को इमला बोलकर "विश्वास" लिखवाए तो अपनी आदत और सुविधा के कारण लिखने वाला व्यक्ति "बिस्वास" ही लिख देगा, हालांकि उससे कहा गया मैसेज नही बदलेगा, यही मामला क़ुरआन के साथ था, अरब में उस समय थोड़े थोड़े फ़र्क के साथ सात तरह की किरअत यानी बोलियां प्रचलित थीं, और जब वो सहाबा जिन्होंने क़ुरआन कंठस्थ किया था वो दूर के क्षेत्रों में जाकर कातिबों को क़ुरआन सुनाते तो क़ातिब कई स्थानों पर नेचुरली अपने उच्चारण के अनुसार किसी शब्द को लिख दिया करते थे, इससे अमूमन क़ुरआन की बात में कोई फ़र्क नही आता था, ... नबी सल्ल० के करीबी सहाबा ने जब इन अलग ढंग से कहे जा रहे शब्दों पर नबी सल्ल० का ध्यान दिलाया तो ग़ालिबन नबी सल्ल० ने ये कहा कि जिस किरअत में लोगों को ज़्यादा सुविधा हो रही है, उसी में उन्हें पढ़ने दो, क्योंकि क़ुरआन की बात तो बदल नही रही, इसलिए ये कोई बिग डील नहीं है... पर हदीस में लिखे जाने के वक्त तक आप सल्ल० की उस बात को इतना बदल दिया गया कि हदीस में बात ये लिख दी गई कि क़ुरआन सात अलग अलग किरअतों में नाज़िल हुआ है, जो बात सही नहीं है...!!
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.... बहरहाल, यमामा की जंग के बाद की हदीस पर आते हैं.... तो बुख़ारी शरीफ़ की किताब-61, हदीस-509 के मुताबिक हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने मिलने बुलाया, और जब वो हज़रत अबु बक्र रज़ि० के पास पहुँचे तो वहां हज़रत उमर रज़ि० भी मौजूद थे, हज़रत अबू बक्र ने हज़रत ज़ैद से फ़रमाया कि यमामा की जंग में बहुत बड़ी तादाद में कारियों (कुर्रा) की शहादत हुई, और अंदेशा ये है कि आनेवाले वक्त में जो जंगें होंगी उनमे और ऐसे किरअत जानने वाले लोगों की शहादत हो सकती है जो अभी ज़िंदा हैं, जिससे क़ुरआन का एक अहम हिस्सा (यहां मुराद उस किरअत से है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ था, और इसे ही नबी सल्ल० ने सहाबा को सिखाया था) हमसे खो न जाये, इसलिये ऐ ज़ैद क्योंकि आप सच्चे इंसान हैं और नबी सल्ल० के लिए क़ुरआन लिखा करते थे, इसलिए आप उन आयतों को ढूंढिये (जिन्हें पहली बार नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था और आप सल्ल० ने उनको सुनकर उसकी किरअत की तस्दीक की थी, ताकि उन सब आयतों को इकट्ठा करके मास्टर कॉपी के तौर पर सुरक्षित कर लिया जाए और उसी किरअत के आधार पर क़ुरआन की और कई प्रतियां तैयार कर ली जाएं जिनको पढ़कर जल्द से जल्द और नए क़ारी तैयार हो सकें....
..... सोचकर देखिये कि जब इसी हदीस के मुताबिक़ क़ुरआन को पूरा कंठस्थ करने वाले बहुत से क़ारी अभी ज़िंदा हैं और बुख़ारी 61-525 के अनुसार क़ुरआन को नबी सल्ल० के ज़माने में ही जमा कर लेने वाले ज़ैद बिन साबित रज़ि० से मुखातिब हुआ जा रहा है, तब क़ुरआन की मूल आयतों की खोज का मक़सद सिवाय इसके क्या हो सकता है कि कुरआन की असल डायलेक्ट की तस्दीक की जाए, क्योंकि इस हदीस में क़ुरआन की किसी आयत के खो जाने का तो कहीं ज़िक्र है नही )
... ज़ैद बिन साबित ने शुरू में इस बात की ज़रूरत न होने की बात कही कि जब नबी ने अपनी ज़िंदगी में ये काम नहीं किया (किसी एक किरअत को रखने का आग्रह नही किया) तो हम लोग क्यों ऐसा करें ?? लेकिन बाद में ज़ैद बिन साबित मान गए, और क्योंकि उन्होंने क़ुरआन को बाय हार्ट याद भी किया था और पूरी लिखी हुई भी उनके पास मौजूद थी जिसमें बस कहीं कहीं डायलेक्ट/किरअत का हल्का सा फ़र्क हो सकता था सो अपनी और अन्य सहाबा की याददाश्त और पास मौजूद क़ुरआन की प्रति के आधार पर उन्होंने क़ुरआन की प्रत्येक उस आयत को ढूंढ लिया जिसे नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था, आख़िर में सूरह तौबा की कुछ आयतें जिनका ज़ैद बिन साबित रज़ि० को नबी सल्ल० द्वारा किरअत किया जाना याद था, वो कहीं नहीं मिलीं, और जाकर हज़रत अबी खुज़यमा रज़ि० के पास मिलीं, और जब इस तरह पूरा क़ुरआन शरीफ़ इकट्ठा हो गया तो इस पूरे ज़खीरे को हज़रत अबू बक्र के पास रखवा दिया गया, (क्योंकि ये खोज क़ुरआन के अहम हिस्से, उसकी असल किरअत के खो न जाने के डर से की गई थी, इसलिये इसकी बहुत सारी कॉपियां इसी समय बनाना ज़रूरी था, जो कि लगातार इस मास्टरकॉपी की मदद से बनवाई गईं) हज़रत अबु बक्र रज़ि० की वफ़ात के बाद ये हज़रत उमर के पास रहा और फिर हज़रत उमर के बाद बीवी हफ़सा रज़ि० के पास इसे महफ़ूज़ रखा गया....!!!
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... अब हमें ये मालूम है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में क़ुरआन की सारी मूल आयतों को एक जगह जमा करके रख दिया गया था, .... पर क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी अलग अलग वक्त की दो हदीसें मौजूद हैं जिनमें ज़ैद बिन साबित पर क़ुरआन की तरमीम का ज़िम्मा डाला गया था, एक हदीस यमामा के जंग के बाद की है और दूसरी इसके कई साल बाद हज़रत उस्मान की खिलाफत के दौर में इराक़ और शाम के लोगों में क़ुरआन की किरअत को लेकर इख़्तिलाफ़ के अंदेशे के वक़्त की.... दोनों अहादीस में रावियों ने हज़रत ज़ैद से एक ही बात कहलवाई है कि हमें नबी सल्ल० के वक्त में अलग अलग चीज़ों पर लिखी गई तमाम आयतें मिल गईं, मगर क़ुरआन की कुछ आयतें जो मुझे नबी सल्ल० की किरअत में याद थीं वो कहीं नही मिलीं, और आख़िरकार हज़रत खुज़यमा रज़ि० के पास वो मिलीं... फ़र्क़ इतना है कि पहली हदीस में अबी खुज़यमा रज़ि० के पास से मिली आयतें सूरह तौबा की बताई गई हैं और दूसरी हदीस में खुज़यमा बिन साबित रज़ि० के पास से सूरह अहज़ाब की"....
... लेकिन जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में सारी मूल आयतें इकट्ठा कर ली गई थीं, और उन्हें एक जगह सुरक्षित रख दिया गया था तो उन्हें दोबारा ढूंढने का सवाल कैसे उठता है ?? चाहे कोई भी आयत हो, हज़रत अबू बक्र के ज़माने की हदीस में बताया गया है कि तमाम आयतें मिल गई थीं.... यानी हज़रत ज़ैद बिन साबित का ये क़ौल पहली ही बार यानी हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने का है, रावियों ने जिसका वक्त भी गड्डमड्ड किया और आयतों के नाम भी और आयतें जिन सहाबियों से मिलीं उनके एक से नाम ज़ाहिर करते हैं कि ये एक ही बात एक ही सहाबी का ज़िक्र है जिसे ठीक से याद नहीं रखा गया
.... इसी तरह बुख़ारी किताब-61, हदीस-510 में लिखा है कि हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़माने में जब ज़ैद बिन साबित रज़ि० और दूसरे कातिबों को क़ुरआन की प्रतियां बनाने के लिए उस्मान रज़ि० ने नियुक्त किया तो बीवी हफ़सा रज़ि० से उन्होंने वो मास्टर कॉपी मंगाई जिसे हज़रत अबू बक्र के ज़माने में जमा किया गया था, इसके बाद हज़रत उस्मान ये बात कहते हैं कि किरअत में जहां बाक़ी के तीन कातिबों का हज़रत ज़ैद बिन साबित से इत्तेफाक न हो तो वो कुरैशी किरअत में क़ुरआन लिख लें, क्योंकि क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में नाज़िल हुआ था.... सवाल ये उठता है कि जब उनके सामने क़ुरैशी किरअत में लिखी हुई तमाम आयतों का मजमुआ मौजूद है तो किरअत में हज़रत ज़ैद से इत्तेफाक, या नाइत्तेफाकी का सवाल ही क्या ? वो तो अपने सामने मौजूद मास्टर कॉपी से नकल करेंगे न ? क्योंकि किरअत के हिसाब से वो मास्टर कॉपी ही परफेक्ट थी, इसीलिये तो उसे मंगाया गया था
...... ज़ाहिर होता है कि जैसे क़ुरआन की एक आयत खुज़यमा रज़ि० के पास मिलने की बात को दोनों हदीसों में गड्डमड्ड कर दिया गया, उसी तरह किरअत के मामले में ज़ैद बिन साबित रज़ि० से नाइत्तेफ़ाक़ी होने पर क़ुरैशी किरअत में कातिबों को क़ुरआन लिखने का हुक़्म देने की बात का सही वक्त भी इन एक सी दो हदीसों में रावियों ने गड्डमड्ड कर दिया है....
.... तर्क से सोचें तो ये हुक़्म उस वक्त का मालूम होता है जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में यमामा की जंग के बाद शुद्ध किरअत में जल्द से जल्द क़ुरआन की ढेर सारी कॉपियां बनाने का प्रयास किया जा रहा था, ताकि कारियों की एक बड़ी तादाद बनाई जा सके, लेकिन अभी तक पूरी मास्टर कॉपी को जमा नहीं किया जा सका था अलबत्ता काफ़ी सारी आयतों के मिल जाने बाद ये तय था कि पूरी क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में ही नाज़िल हुई है, और उसके पहले क्योंकि हज़रत ज़ैद बिन साबित के पास पूरी लिखित क़ुरआन मौजूद थी जिसमे कहीं कहीं क़ुरैशी किरअत नही थी सो अरब के लोगों के लिए क़ुरआन की अन्य प्रतियां बनाते हुए कातिबों के सामने ज़ैद बिन साबित की क़ुरआन मास्टर कॉपी के तौर पर रखी गई थी, इस हिदायत के साथ कि उसमें जहां ज़ैद बिन साबित ने क़ुरैशी किरअत न लिखी हो, वहां क़ुरैशी किरअत लिखकर कॉपीज़ बना ली जाएं....
.... फिर ये मालूम चलता है कि हज़रत उस्मान के ज़माने में किरअत को लेकर अरब में कोई नाइत्तेफ़ाकी नही थी, बल्कि नाइत्तेफ़ाकी का डर सिर्फ शाम और इराक़ के बीच था, यानी दूरदराज के इलाकों में जहाँ क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन नही पहुँची थी, इससे भी एक इशारा मिलता है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने से क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन के अरब में पढ़े सीखे जाने का सिलसिला जारी था....
.... सो हज़रत उस्मान रज़ि० ने अपनी ख़िलाफ़त के दौर में सिर्फ इतना किया कि उन्होंने उसी मास्टर कॉपी की मदद से और नई कॉपियां बनाने के लिए क़ुरआन के विशेषज्ञ हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को भी बुलाया और अन्य कातिबों को भी, इन सबने क़ुरैशी किरअत में क़ुरआन की प्रतियां बनाईं जिन्हें शाम और ईराक़ के अलग अलग प्रांतों में भिजवाकर हज़रत उस्मान ने अन्य किरअतों में लिखी क़ुरआन की प्रतियों को जनता के पास से उठा लेने का हुक्म दिया....
.... अन्य किरअतों को जलवा देने का हुक्म भी एक गढ़ी हुई बात महसूस होती है क्योंकि एक तो अन्य किरअतों में लिखी अल्लाह की ही बात थी, जिसको नष्ट करने की बात से ही नबी सल्ल० के साथी डरेंगे, और फिर अगर अन्य किरअतों को हज़रत उस्मान रज़ि० ने इस हद तक जाकर नष्ट करवाया होता तो ये किरअतें आज तक अरब देशों में मौजूद न होतीं, और पढ़ी और पढ़ाई न जा रही होतीं....
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.... बहरहाल हज़रत अबु बक्र रज़ि० और हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़मानों में क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी दोनों हदीसों को देखकर पता चलता है कि वहां मामला क़ुरआन को एक किताब का रूप देने का नही बल्कि दोनों ही वाकयों में क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन की कॉपियां बनाने का एक ही मामला था ....
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... और अंत में सूरह अबसा की वो आयतें, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि नबी सल्ल० के ज़माने में महज़ चमड़े और हड्डी पर नही, बल्कि क़ुरआन किताब की शक्ल में मौजूद थी..... "वे (क़ुरआन की आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत हैं, तो जो चाहे उसे याद कर ले - पवित्र पन्नों में अंकित हैं, प्रतिष्ठि्त, उच्च !! ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है, जो प्रतिष्ठित और नेक हैं" (क़ुरआन, 80:11-16)
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