मंगलवार, 25 मई 2021

मुता मैरिज इस्लाम का अंग नही

जिस तरह इस्लाम के खिलाफ बिल्कुल झूठा और अश्लील प्रचार कुछ कट्टरतावादी इस्लाम विरोधियों द्वारा किया जा रहा है, उससे ऐसा भ्रम बनाया जा रहा है जैसे सारी कुप्रथाओं का जनक, और सारी बुराइयों की जड़ इस्लाम ही हो, और इस्लाम की आलोचना कर के ही दुनिया से बुराइयों को मिटाया जा सकता है, ... पर इसके पीछे वास्तविकता ये है कि इस्लाम मे बुराइयों का शोर मचा कर वो लोग अपनी सोसायटी की कमियों को छिपाने की कोशिशें करते हैं, और अपनी सोसायटी की बुराइयों को आलोचना से बचाकर, उन्हें हमेशा चालू रखना चाहते हैं जैसे कुछ लोगों ने मुता मैरिज को बेस बनाकर इस्लाम पर ये आरोप लगाकर इण्टरनेट पर प्रसारित किया //.... क्या आप जानते हैं कि दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है, इस्लाम में “मुता” शादी शब्द ला कर वेश्यावृति को कानूनी जामा पहनाया गया है…. जिसे यात्री विवाह भी कहा जाता है..! ये एक प्रकार से अनुबंध आधार पर अल्पावधि विवाह है, और कुछ घंटों के लिए भी हो सकती है…! जहाँ हिन्दू धर्म में स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और उन्हें देवी तक की संज्ञा दी गयी है वहीँ इस्लाम में स्रियों को भोग-विलास की “मात्र एक वस्तु” बना रखने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है . नोट: इस्लाम को छोड़कर दुनिया के सभी धर्मों में चरित्रवान रहने पर जोर दिया गया है और वेश्यावृति को पाप मानते हुए उसे एक घिनौने अपराध की संज्ञा दी गई है…..// .... कितना अच्छा होता कि मेरा धर्म अच्छा और तुम्हारा धर्म बुरा के आरोप प्रत्यारोप मे पड़ने की बजाय इन भाईयों ने अपने समाज मे धर्म के नाम पर चल रहा स्त्रियों का दैहिक शोषण रोका होता ... हम तो यही समझते हैं कि हर धर्म अपने मूल मे पवित्र धर्म है, लेकिन ढोंगी धर्माधिकारियों ने निजी लाभों को पाने के लिए अश्लील और आपत्तिजनक चीजों को धर्म का जामा पहना दिया है ॥ बहरहाल, इस्लाम पर लगाए गए आरोप पर आते हैं, जैसा कि हम सब जानते हैं कि इस्लाम के नियम कोई एक दिन मे अवतरित नही हुए, बल्कि ये नियम 23 साल तक धीरे धीरे कर के लोगों के बीच लाये जाते रहे ताकि वे लोग एकदम अचानक से अपनी वर्षों की बनाई हुई पक्की आदतों के विरुद्ध कई सारे नियम देखकर बिदक न जाएँ, खुद में सुधार करने में अधिक मेहनत देखकर हतोत्साहित न हो जाएं, बल्कि ऐसा हो कि वो पहले कुछ अच्छी आदतें अपनाकर उनके अभ्यस्त हो जाएं, तब उनको नए सुधारों की प्रेरणा दी जाए ताकि उनका उत्साह ऊँचा बना रहे, और वे नित नए सुधार करते जाएँ... ..... यही मामला, तत्कालीन अरबी कुरीति मुताह के विरुद्ध भी लागू किया गया ..... मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज है जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था, वास्तव में ये स्वच्छन्द काम तृप्ति का एक तरीका था, जिसे अरब के लोगों ने विवाह का आवरण पहना दिया था.... जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया, इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें ... तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे .... सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है...!! और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए '' ..... तो सुन्नी इस्लाम में मुताह को पूरी तरह से हराम माना जाता है, परन्तु मुताह हराम होने की घोषणा से पूर्व जब मुताहः की मनाही की घोषणा नबी सल्ल० ने नही की थी व आप सल्ल० के सामने ही लोग मुताह विवाह किया करते थे, तो नबी सल्ल० अल्लाह का इस विषय में कोई आदेश अवतरित न होने के कारण इस विषय पर मौन रहते थे, इसी समय की कुछ घटनाओं का वर्णन कुछ हदीस साहित्य में है जिनके कारण मुस्लिमों का एक छोटा सा वर्ग भूलवश मुताह को इस्लाम में अनुमतिप्राप्त विवाह मान बैठा है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं कि प्रैक्टिकली वो लोग भी मुताह को व्यवहार में लाना सही नही समझते होंगे, क्योंकि मुताह अपनी प्रकृति में ही निर्लज्जता का बोध कराता है ख़ैर विश्व में मुस्लिमों की लगभग 95 फ़ीसद सुन्नी मुसलमानों की आबादी मुताह को पूरी तरह हराम मानती है, क्योंकि मुताह को हराम ठहराने वाली अहादीस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, जिस कारण मुताह को जायज़ समझने की भूल कोई बिरले ही करेगा

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