आधुनिक दृष्टिकोण में इस्लाम
मंगलवार, 25 मई 2021
बनू क़ुरैज़ा का मामला क्या था ?
बहुत से भाई हैं जो इब्न इस्हाक़, तबरी और हिशाम के द्वारा लिखे तथाकथित इस्लामी इतिहास में वर्णित "बनु क़ुरैज़ा" क़बीले के यहूदियों को मुस्लिमों द्वारा मौत की सज़ा दिए जाने के अन्यायपूर्ण वर्णनों पर सवाल उठाते हैं.... लेकिन इस मामले में सबसे पहले ये बात दिमाग में रख लेनी चाहिए कि नबी सल्ल० और सहाबा के विषय में तारीख़ के किस्से प्रमाणिक नही हैं, बल्कि इनसे ज़्यादा प्रमाणिक बातें सही हदीस की होती हैं
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....तो हदीसों से इस मामले में ये पता चलता है कि बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे
लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ..
अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने की थी, जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया (अबु दाऊद 3004 व 3005)
फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए, ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए
अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा
इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते...
अंततः एक झड़प के बाद यहूदी पकड़े गए, और जब इन्हें सज़ा देने का समय आया तो बुख़ारी और मुस्लिम में दर्ज अहादीस के अनुसार इन लोगों ने साद बिन मुआज़ रज़ि० से अपना फैसला करवाना चाहा, साद बिन मुआज़ पहले यहूदी ही थे और कुछ समय पहले मुस्लिम हुए थे, बनू क़ुरैज़ा वालों ने शायद ये सोचा होगा कि पहले यहूदी रहने के नाते साद गलत तरीके से बनु क़ुरैज़ा वालों को फ़ायदा पहुंचाएंगे... मगर जब फ़ैसले का दारोमदार हज़रत साद पर आ गया और उसमें नबी सल्ल० का इन्टरफेयरेन्स नही रहा तो साद बिन मुआज़ ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले, और मुस्लिमों का नरसंहार करने की साज़िश करने वाले बनू कुरैज़ा के मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और लड़कों को गुलाम बनाया जाए ..
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ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने शत्रुओं और षणयंत्र करने वालों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस में आप देख सकते हैं.... क्योंकि साद पहले से इस कानून के करीब रहे थे सो उन्होंने ये सज़ा बनु क़ुरैज़ा के दोषियों को दी....
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.... वैसे हमें ये यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. से करवाने का इसरार किया होता तो जिन यहूदियों को हज़रत साद ने मौत की सज़ा दे दी, नबी सल्ल० उन पर भी रहम फ़रमा देते, जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी
फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी)
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याद रखिए साद रज़ि० ने कत्ल करने की सजा उन्हीं पुरुषों और गुलाम बनाने की सज़ा उन्हीं स्त्रियों व किशोरों को दी थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे, और जो यहूदी मुस्लिमों के साथ युद्ध में शामिल नही थे, उनको बिल्कुल नहीं छेड़ा गया था..
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.... इब्न इस्हाक़, एवम इनके बाद के इतिहासकारों ने बिना किसी आधार के भारी संख्या मे बनू कुरैज़ा के पुरूषों की हत्या की बात लिखी है, जो कि पूरी तरह अस्वीकार्य है, चूंकि इस्लाम मे जान के बदले जान का नियम है, तिस पर भी माफी को वरीयता दी गई है, ... तो उन यहूदियों द्वारा यदि अधिक मुस्लिम नहीं मारे गए थे तो मृत्युदण्ड भी अधिक लोगों को नहीं दिया जा सकता था ... उसपर इनमें से कई लोग अलग अलग कारणों से मौत की सजा से बचा लिए गए थे तो मौत की सजा पाने वालों का आंकड़ा मैं नहीं समझता कि 15-20 से ऊपर जा सकता है, यानी जितने मुसलमान इनकी वजह से मारे गए, उससे कम ही इनका आंकड़ा रहेगा...!!
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..... और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे...
बल्कि मुस्लिमों को तो क़ुरआन में स्पष्ट आदेश दे दिया गया था कि युद्धबन्दियों को मुसलमान सदा के लिए गुलाम बनाकर नही रख सकते, बल्कि या तो उनसे कुछ अर्थदंड लेकर उन्हें रिहा कर दें, या बिना कुछ लिए, एहसान के तौर पर उनको रिहा कर दें.... इसके सिवाय तीसरा कोई रास्ता युद्धबन्दियों के लिए क़ुरआन ने नही बताया है ...(क़ुरआन 47:4) ... तो बनू क़ुरैज़ा के युद्धबन्दियों को भी कुछ समय बाद स्वतन्त्र कर दिया गया था....!!!
.....बनु क़ुरैज़ा से मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध करने आई स्त्रियों में बंदी बनाई गई एक स्त्री रेहाना बिन्त ज़ैद के विषय में भी तारीख़ ए तबरी आदि में जो बातें लिखी गई हैं कि नबी सल्ल० ने दासी के तौर पर रेहाना को अपने पास रखा था, वो क़ुरआन के उपरोक्त आदेश को देखते हुए विश्वास योग्य नहीं हैं, बल्कि वे स्रोत जो ये कहते हैं कि रेहाना बिन्त ज़ैद को आज़ाद कर दिया गया था, जिसके बाद वो मुस्लिम बन गईं, और उसके बाद सम्भवतः नबी सल्ल० के निकाह में वो आईं, वो क़ुरआन के अनुसार ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं
..... जबकि मौलाना शिबली नोमानी जैसे विद्वानों का ये भी विचार है कि रेहाना बिन्त ज़ैद को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, मुस्लिमों ने आज़ाद कर दिया था और वो अपने लोगों में जाकर रहने लगी थीं, उनका नबी सल्ल० के साथ कभी कोई सम्बन्ध नही रहा था.... यानी इस विषय में कोई एक प्रमाणिक बात नही है॥
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... ये ध्यान रखिये कि क़ुरआन एकमात्र वो प्रमाणित पुस्तक है, जिसमें शुरू से लेकर आज तक कोई परिवर्तन नही आया, इसलिए मुस्लिम इतिहास के विषय में, सबसे प्रमाणिक बात क़ुरआन से पता चलती है,
.... फिर हदीसों को भी व्यक्ति के सच्चा होने का पूरा पता लगा लेने के उपरांत ही लिखा जाता था, इसलिये हदीसों की बातें भी मानी जाती हैं...
.... लेकिन हदीसों के लिखे जाने में जो सावधानी बरती गई, उस सावधानी का इस्लामी तारीख़ के नाम पर लिखी गई किताबों में सर्वथा अभाव रहा ... इब्ने इस्हाक़, हिशाम और तबरी ने क्रमशः नबी सल्ल० के सौ, दो सौ और ढाई सौ साल बाद आप सल्ल० का इतिहास लिपिबद्ध किया इन्होंने समाज में कहे सुने जा रहे किस्सों को कहने वाले व्यक्ति की नबी सल्ल० से सम्बद्धता है या नहीं, उसने जिन स्रोतों से ये बातें सुनी, वे कितने सच्चे थे, इन बातों पर ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपने विवेक के आधार पर उन किस्सों को लिख लिया, इसलिये ये किस्से लिखे जाने के समय ही संदिग्ध थे, और हम तक पहुँचते पहुँचते इनमें कितना बदलाव हो चुका है, ये कहना भी मुश्किल है, इसलिए तारीख की ये किताबें अधिक विश्वासयोग्य भी नही ठहरती हैं, ये ध्यान रखना चाहिए...!!!
रक्त सम्बन्धियों से विवाह: उचित या अनुचित ?
मुस्लिमों द्वारा अपने चाचा, मामा, बुआ की बेटियों से विवाह करने की प्रथा पर हमारे कुछ गैर मुस्लिम भाईयों का बड़ी घृणा के साथ कहना है कि मुस्लिम अपनी ही बहनों के ही भाई नहीं होते, और मुस्लिमों की गन्दी नज़र ने उनकी अपनी बहनें ही नहीं बच पातीं ........
भाईयों आपका ये कटाक्ष सर आंखो पर लेते हुए मैं ये कहना चाहता हूँ कि मुस्लिमों को सिर्फ अपनी बहनों का ही नही बल्कि इसकी, उसकी, आपकी, मेरी सभी की बहनों का भाई बनने का, यानि संसार की सारी लड़कियों का भाई बनने का आदेश दिया गया है, चाहे वो लड़कियां किसी भी धर्म, जाति समुदाय की हों, उनके मान-सम्मान उनके सतीत्व और उनके जीवन की रक्षा हमें ठीक उसी प्रकार करनी है, जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है ...!!!!
अब भाई, रहा सवाल इस बात का कि जो मुस्लिम अपनी ही चचेरी, ममेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों से विवाह करते हैं, ये उचित है या अनुचित, सराहनीय कार्य है या घृणास्पद ?
तो इस बारे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि क्योंकि ऐसे विवाह की हर धर्म मे अनुमति है, तो आप चाहे जिस भी धर्म को उचित मानें, ये विवाह भी आपको उचित ही मानना होगा .....
ऐसे विवाह की विशेषता ये है कि क्योंकि वधू, वर पक्ष के किसी अपने ही प्रिय सम्बन्धी की ही बेटी होती है, इसलिए दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या की संभावना शून्य, और वधू के मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न की संभावना बिलकुल क्षीण रहती है ... पति को अपने ससुराल पक्ष का इस कारण और लिहाज़ रहता है, कि वो पहले से उनके रिश्तेदार हैं, इसलिए अकारण वो पत्नी को त्यागने आदि से खुद को रोकता है...
फिर ऐसे विवाह मे विशेषकर लड़की के विवाह मे आसानी रहती है, लड़की यदि गुणवती है तो उसके गुणों से मुग्ध हो कर, और यदि गुणवती नहीं भी है तो भी उसके परिवार से प्रेम के कारण खानदान से ही लड़की के रिश्ते आ जाते हैं, क्योंकि लड़की को देखने वाला उसका भावी ससुराल पक्ष उसके घर मे सदा से ही आता जाता रहा है
पति पत्नी या उनके परिवारों के आपस मे व्यवहार न मिल पाने के कारण विवाह के टूटने का भय भी इस विवाह मे न्यून है क्योंकि दोनों परिवार वर वधू के जन्म से भी पहले से एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, और एक दूसरे के व्यवहार को वर्षों अच्छी तरह परखने, और विवाह के लिए वर वधू की सहमति के बाद ही आपस मे ये नया सम्बन्ध जोड़ते हैं .... और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि करीबी सम्बन्धियों मे विवाह की प्रथा से लड़के लड़कियों के विवाह मे देरी की नौबत नही आती, जिससे नई पीढ़ी मे भटकाव की समस्या भी नही आने पाती, जबकि अन्य परिवारों मे रिश्ता ढूंढने और पसंद करने मे कई वर्ष लग जाते हैं, इसके बाद भी विवाह के सफल न होने का डर अलग ...!! इन्हीं सारे कारणों से मैं तो करीबी रिश्तेदारियों मे विवाह की प्रथा को एक सराहनीय कार्य मानता हूँ ...!!
इस्लाम मे व्यभिचार का दंड
इस्लाम मे व्यभिचार का दण्ड .... विरोधी ऐसा दिखाते हैं, जैसे इस्लाम मे किसी भी तरह के व्यभिचार पर मौत का दण्ड है, और वो भी केवल औरत को .... पर ऐसा नहीं है ॥
एडल्टरी यानि व्यभिचार की तीन कैटेगरीज़ हैं पहली किसी पुरुष का किसी स्त्री के साथ जबरन बलात्कार ... इसमें पुरुष के लिए कठोरतम दण्ड मौत की सजा है जबकि स्त्रियों के साथ सहानुभूति ॥ दूसरी कैटेगरी जिसमें अविवाहित स्त्री पुरुष कामोत्तेजना को निकालने के वैध मार्ग के अभाव मे एक दूसरे की सहमति से सहवास करते हैं, इस मे मौत की सजा नहीं है बल्कि 100 कोड़े का दण्ड स्त्री पुरुष दोनों को है ! तीसरी कैटेगरी, जब विवाहित स्त्री पुरुष अपने पति और पत्नी को धोखा देकर अन्य किन्हीं स्त्री पुरूषों के साथ सहमति से सम्भोग करते हैं तो उन दोनो के लिए कठोर दण्ड है (न कि केवल स्त्री के लिए
) ....
ये दण्ड यदि कानून मौत की सजा निर्धारित करे तब भी वो न्यायोचित है ... कैसे न्यायोचित है और व्यभिचार पर दण्ड क्यों है वो मेरे इस लेख पर पढ़ लें और कृपया कोई भी प्रश्न इस लेख को पूरा और ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद ही करें
.... कुछ भाईयों की इस्लामी शरीयत मे वर्णित सख्त सज़ाओं के प्रावधान के विषय मे विशेषकर दो आपत्तियां जताते हैं ....
पहली आपत्ति ये, कि चोरी या व्यभिचार जैसे "छोटे" अपराधों पर शरीयत मे अपराधी के हाथ काटने और मृत्युदण्ड जैसी सख्त सज़ाएं देना क्रूरता और अमानवीयता है ..
और दूसरी ये कि शरीयत मे हत्या और बलात्कार आदि जैसे अपराधों पर भी मृत्युदण्ड देना ठीक नही क्योंकि जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो किसी के प्राण लेने का भी हमें कोई अधिकार नही है ....!!
मित्रों । अस्ल में होता ये है कि व्यभिचार की सजा का विरोध करने वाले लोग अक्सर खुद को किसी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट दिलाने की बात दिमाग मे रखकर व्यभिचार की गम्भीर सजा पर आपत्तियां जताते हैं, लेकिन वे ही लोग अपने दिल पर हाथ रखकर सोचे कि क्या वे अपनी मां, बहन, बेटी, पिता और बेटों को भी कई अलग अलग लोगों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने को प्रोत्साहित करना चाहेंगे ..??
निश्चय ही वे ऐसा नहीं चाहेंगे, बल्कि वे चाहेंगे कि उनके माता पिता एक दूसरे के प्रति वफादार रहें, और उनका जीवनसाथी उनके प्रति निष्ठावान रहे
वे नही चाहेंगे कि उनके माता पिता, बहन बेटी या पत्नी के अवैध सम्बन्धो के कारण उनके घर की सुख शांति और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाए , इसलिए वे अपने परिवारीजनो को इस प्रकार के किसी भी सम्बन्ध से हर हाल मे दूर रखना चाहेंगे
शरीयत मे बताई गई सज़ाओं का मोटिफ भी यही है , कि उसके कार्यक्षेत्र मे आने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को किसी भी कुकर्म से भरसक बचाकर रखे .... और जैसा कि मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि, शरीयत मे कुछ विशेष अपराधों के लिए सख्त सज़ाओं का प्रावधान इसलिए नहीं कि ईश्वर अपने बंदो को मरवा देना चाहता है, बल्कि ये प्रावधान इसलिए है ताकि जो व्यक्ति थोड़े से आनन्द की प्राप्ति के लिए कोई अपराध करना चाहता हो, तो वो उस अपराध की भयंकर सजा के बारे मे सोचकर बुरी तरह से डर जाए, और अपराध करने की सोच ही न पाए .... फिर जब अपराध ही न होगा तो मौत की सज़ा से मारा कौन जाएगा ??
लेकिन इस सख्त कानून के लागू होने के बावजूद यदि कोई अपराधी कानून को धता बता कर दण्डनीय अपराध करे तो इसका मतलब यही है कि उस अपराधी ने पकड़े जाने की हालत मे अपना अन्जाम जानते बूझते ये अपराध करने का फैसला किया था, अगर वो सख्त सजा से डर जाता तो ये अपराध ही न करता .... तो फिर जो व्यक्ति खुद सख्त सजा पाने को तैयार हो उस समाज मे बिगाड़ पैदा करने वाले अपराधी से किसी को भी किसी तरह की सहानुभूति क्यों हो ??
दूसरी बात शरीयत यदि अन्यायपूर्ण ढंग से काम करे, यानि किसी निरपराध को दण्ड दे, या फिर किसी मुजरिम को उसके जुर्म पर ऐसा कठोर दण्ड दे, जिसके बारे मे मुजरिम को पहले से चेतावनी न दी गई हो , तब तो शरीयत की सज़ाओं पर ऐतराज करने का कोई तुक भी है....
लेकिन शरीयत कानून सिर्फ अपराधियों के लिए बुरा है , ये सदाचारी, शांतिप्रिय और निरपराध लोगों पर कोई सख्ती नहीं करता, बल्कि ये तो कानून का पालन करने वाले सज्जन लोगों का जीवन सुगम ही बनाता है.... पता नहीं वे लोग अपराधियों के क्या लगते हैं, जो शरीयत का विरोध किया करते हैं ...???
शरीयत कानून किसी के जुर्म करने से पहले ही उस जुर्म के लिए नियत सज़ाओं का ऐलान कर देता है, ताकि वो जुर्म करने को इच्छुक कोई भी व्यक्ति उस जुर्म का अंजाम पहले से जान रखे , और सजा के भय से ही सही, खुद को जुर्म करने से बचाए रखे .....
यदि इसके बावजूद कोई व्यक्ति अपराध कर बैठता है तब भी शरीयत दोषी को अन्यायपूर्ण ढंग से सजा नही देती, बल्कि पहले कोर्ट मे जुर्म के सभी पहलुओं पर विचार किया जाता है, देखा जाता है कि अपराध अगर किसी मजबूरी के तहत विवश होकर किया गया है, तो सज़ा माफ या कम भी की जा सकती है
उदाहरणार्थ विवाह न हो पाने के कारण अपनी कामोत्तेजना के आगे विवश होकर यदि कुंवारे स्त्री पुरुष व्यभिचार कर बैठें, तो उन्हें मौत की सजा शरीयत नहीं देगी, मौत की सजा केवल उनके लिए है जो लोग विवाहित होकर भी व्यभिचार मे लिप्त रहे हों , यानि जिनके पास अपनी कामवासना की पूर्ति का वैध साधन होने के बावजूद, यानि कामोत्तेना से विवश होकर नहीं बल्कि जिन्होंने केवल मनमानी करने को कानून का उल्लंघन किया हो, केवल वे ही लोग कठोर सजा के अधिकारी हैं शरीयत की नजर मे
.......... इसी तरह भूख या गरीबी से विवश हो कर कोई व्यक्ति चोरी कर बैठे तो शरीयत उसका हाथ काटने का हुक्म नहीं देती बल्कि हाथ काटने की सजा केवल उसको सुनाई जाती है जो व्यक्ति बिना किसी मजबूरी के सिर्फ ऐश करने के लिए चोरियां किया करता है
यानि, कठोर सजा केवल उन्हीं व्यक्तियों को उनका जुर्म कोर्ट मे पूरी तरह सिद्ध हो जाने के बाद दी जाती है जो सजा के अंजाम से भली भांति परिचित होकर भी, किसी मजबूरी या दबाव के न होने के बावजूद, कोई अनुचित लाभ या अनुचित आनंद लेने के लिए अपराध करते हैं
शरीयत का विरोध अक्सर इस सोच के कारण किया जाता है क्योंकि लोग सोचते हैं कि जिन देशों इतने कठोर कानून होते हैं , वहाँ का हर नागरिक एक घुटन और तनाव मे जीता होगा,पर ऐसा नहीं है, आप विश्व के उन अनेक विकसित देशों का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ नशीली वस्तुओं के व्यापार और भ्रष्टाचार जैसे मामूली जुर्म पर मौत की सजा देने का कानून लागू है, लेकिन खुशहाली इन देशों मे भारत से कहीं अधिक ही पाई जाती है
अमरीका जैसे विकसित देश में ही विभिन्न अपराधों पर बिना किसी रियायत के लगातार मृत्युदण्ड दिया जाता है, अमेरिका मे कानूनों का सख्ती से पालन किया जाता है, कितने लोग सोचते हैं कि अमेरिका के नागरिकों का जीवनस्तर भारतीयों से खराब है ??? बल्कि भारत के मुकाबले इन देशों मे जीवन प्रत्याशा,स्वास्थ्य और खुशहाली कहीं अधिक है
क्या घुटन और तनाव के वातावरण मे जनता का अच्छा स्वास्थ्य और खुशहाली सम्भव है ?? नही न....
बल्कि इन देशों मे लागू कठोर कानूनों ने वहाँ आम जनता का जीवन भ्रष्टाचार, गुण्डागर्दी और किसी भी प्रकार के अपराध के डर से बिल्कुल मुक्त कर दिया है, जिससे वे लोग ऐसा चिंतामुक्त और खुशहाल जीवन जीने लगे हैं जैसे जीवन की आज हम अपने देश मे रहते हुए कल्पना भी मुश्किल से कर पाते हैं
वास्तव में किसी भी देश मे न्याय व्यवस्था बनाए रखने के लिए ,वहां के निवासियों मे कानून का डर होना जरूरी है, और कानून का डर होने के लिए उस कानून मे सख्त सजाओं का प्रावधान होना भी जरूरी है, इसी कारण हमारे देश भारत और चीन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, जापान तथा अमेरिका समेत 39 देशों ने 2012 में संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में मृत्युदण्ड उन्मूलन के लिए रखे गये वैश्विक प्रस्ताव का विरोध किया था,
मेराज के सफर में इसरा
मेरे एक आर्य समाजी भाई ने मुझसे पूछा था कि क्या गधे उड़ सकते हैं ? अस्ल मे भाई का इशारा मेराज के वाकये मे नबी सल्ल. के पास भेजे गए शुभ्र श्वेत और बहुत तीव्रगामी जानवर बुर्राक़ की ओर था ...
और भाई को विश्वास नही आ रहा था कि गधे या घोड़े जैसा जानवर आकाश मे उड़ कर नबी सल्ल. को सातवें आसमान पर कैसे ले जा सकता है ?
हालांकि अल्लाह के हुक्म से कुछ भी आम आदत से अलग और चमत्कारी बात हो जाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है.... और इस चमत्कार मे हर वो व्यक्ति विश्वास करता है जो नास्तिक नही है . क्योंकि किसी भी धर्म मे विश्वास करने वाला व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व मे विश्वास करता है , और ईश्वर स्वयं एक चमत्कार है, क्योंकि विश्वास ये है कि ईश्वर ने विज्ञान का निर्माण किया है, और वो ही विज्ञान के नियमों का संचालन करता है, अत: विज्ञान के नियम ईश्वर के अधीन हैं, न कि ईश्वर विज्ञान के अधीन है, तो ईश्वर को मानने का अर्थ है विज्ञान की ईश्वर के सम्मुख हार, और ईश्वर द्वारा कोई भी चमत्कार कर सकने को स्वीकारना... और अलहम्दुलिल्लाह प्रश्न पूछने वाले मेरे भाई भी ईश्वर मे विश्वास रखते हैं
बहरहाल प्रश्न पर आते हैं, और पता करते हैं कि क्या वाकई मेराज की घटना मे नबी सल्ल. किसी जानवर पर बैठकर आसमान पर गए थे...???
मेराज की घटना के बारे मे सबसे महत्वपूर्ण बात ये जान लेनी चाहिए कि इस मेराज के वाकये के वास्तव मे दो भाग हैं, जिन्हें (1) इसरा, और (2) मेराज, ( الإسراء والمعراج, ) कहा जाता है जिसमें इसरा का मतलब है रातों रात सफर करना यानि इसरा का अर्थ जमीनी यात्रा है और मेराज का मतलब है ऊंचाई पर उठना
सवाल करने वालो के लिए ये भी जानना ज़रूरी है कि इसरा वल मेराज के सफर के बारे मे मुसलमानों मे दो किस्म के खयाल हैं, बड़ा तबका ये मानता है कि नबी सल्ल. मेराज पर जिस्म के साथ गए थे , जैसा कि अल्लाह के हुक्म से होना बिल्कुल मुश्किल नहीं है , वहीं कुछ मुस्लिमों का ये ख्याल भी है कि इस सफर पर नबी सल्ल. का जिस्म नही केवल आप सल्ल. की रूह गई थी, इनके इस ख्याल का आधार उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ि. का ये कौल है कि " मेराज का वाकया हुज़ूर सल्ल. की रूह के साथ ही पेश आया था और आप सल्ल. के जिस्म ने अपनी जगह नहीं छोड़ी थी " अम्मा आइशा रज़ि. के इस क़ौल को अल-ताबरी और इब्न कसीर जैसे विद्वानों ने अपनी तफ्सीरात मे नक्ल किया है... जो लोग इसरा वल मेराज को रूहानी सफर मानते हैं उनका अकीदा है कि कुरान की भाषा अलन्कारिक है इसलिए मेराज के विषय मे कुरान की आयतों का शाब्दिक अर्थ ले लेने से घटना को सही प्रकार समझा नहीं जा सकता
बहरहाल क्योंकि अधिकतर मुस्लिम जनसमुदाय और मुसलमान विद्वान कुरान मे जो कुछ जैसा जैसा लिखा है, उस बात को उस आयत के शाब्दिक अर्थ लेकर वैसे का वैसा मानते हैं और उसके लिए अक्सर सही इस्नाद वाली अहादीस की मदद लेते हैं, तो एक आम मुसलमान होने के नाते कुरान पाक की आयतों पर वैसे का वैसा यकीन करते हुए मै भी इस घटना के पहले भाग इसरा को आप सल्ल. का जिस्मानी तौर पर किया हुआ सफर मानता हूँ , उस हिसाब से घटना को देखिए
भाई ने बुर्राक़ को गधा कहा, निश्चित ही हमें चिढ़ाने के लिए, वैसे बुर्राक़ का वर्णन एक अलग ही अनोखे जीव के रूप मे हुआ है, बुर्राक़ के बारे मे पवित्र कुरान मे नहीं लिखा है ! और बुखारी शरीफ से अधिक विस्तार से बुर्राक़ के बारे मे मुस्लिम शरीफ मे लिखा है........
और सही मुस्लिम किताब-1, हदीस-309 मे लिखा है कि एक रात जिब्रील अ.स. मक्का मे नबी सल्ल. के पास बुर्राक़ नामी एक चमकदार सफेद रंग का खूबसूरत जानवर लाए ये जानवर कद मे गधे से कुछ ऊंचा और खच्चर से कुछ छोटा था, ( ये चाल मे इतना तेज़ था कि) इसका खुर इतनी दूर जाके पड़ता था जहाँ तक नजर जाती थी
इस बुर्राक़ पर बैठकर ज़रा सी ही देर मे आप सल्ल. मक्का से 767 मील (1234 किमी.) दूर येरूशलम के बैतुल मुकद्दस पहुंच गए , जहाँ नबी सल्ल. ने बुर्राक़ को बाहर बान्ध दिया और खुद बैतुल मुकद्दस मे जाकर आप सल्ल. ने दो रकअत नमाज़ पढ़ी
इसके बाद इसके बाद जिब्रील अ.स. नबी सल्ल. को मेराज पर ले गए.... यहाँ ये नहीं लिखा कि नबी सल्ल. दोबारा बुर्राक़ पर बैठे फिर मेराज पर गए
और बुर्राक़ की चाल की तेजी का जिक्र करते हुए भी यही लिखा है कि बुर्राक़ के पैर कितनी कितनी दूर पड़ते थे
वहीं बुखारी शरीफ, किताब-8, हदीस 345 मे लिखा है कि जिब्रील अ.स. नबी करीम सल्ल. का हाथ पकड़कर मेराज पर ले गए थे
यानि कहीं भी स्पष्ट रूप से ये नही लिखा कि बुर्राक़ आकाश मे उड़ सकता था या बुर्राक़ पर बैठकर सीधे आसमान पर गए थे ...... इन सब तथ्यों से यही सिद्ध होता है कि बुर्राक इस यात्रा के केवल जमीनी भाग यानि इसरा से सम्बन्धित है
इसरा की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है इसके बारे मे सबसे विश्वसनीय किताब पवित्र कुरान की ये आयत कि
" महिमावान है वो रब्ब जो अपने बंदे को रातों रात मस्जिद ए हराम से मस्जिद ए अक्सा तक ले गया .."
[अल-इसरा, आयत-1]
इसरा और मेराज की घटना मे लोगों को मेराज की अपेक्षा इसरा की बात ही अधिक अविश्वसनीय लगी (क्योंकि सिदरतुल मुन्तहा आदि कहाँ है ये अल्लाह और उसके रसूल के अतिरिक्त किसी को मालूम नही है ) अत: लोगों ने ये ही शंका जताई कि कोई भी व्यक्ति एक ही रात मे 1200 किमी. की दूरी तक जाकर और फिर वहाँ से लौट कर कैसे आ सकता है ?
तो जैसा कि सही बुखारी , वॉल्यूम 5, किताब 58, हदीस 226 मे लिखा है, आप सल्ल. ने लोगों को बैतुल मुकद्दस का नक्शा बताना शुरू कर दिया जैसा कि उन्होंने रात मे बैतुल मुकद्दस को देखा था ,
इसके अतिरिक्त आप सल्ल. ने कीकर के उस अभिशप्त पेड़ के बारे मे भी बताया जिसका कुरान मे जिक्र है और जिसे आप सल्ल. ने बैतुल मुकद्दस के रास्ते मे देखा था
अत: वे लोग जो पहले कभी बैतुल मुकद्दस देख आए थे , नबी सल्ल. के बताए बैतुल मुकद्दस के वर्णन को एकदम सटीक पाकर उन्हें इस बात का विश्वास हो गया कि नबी सल्ल. रात ही रात मे येरूशलम जा आए हैं, क्योंकि इस से पहले नबी करीम कभी येरूशलम नही गए थे , और मस्जिद को बगैर देखे उस की यथास्थिति को इतनी सटीक तौर पर जानना किसी के लिए भी असम्भव ही था !!
हां अंत मे ये कहना चाहता हूँ, कि इसरा अथवा मेराज की घटना को चमत्कार से ज्यादा आप सल्ल. का सम्मान के रूप मे देखा जाना चाहिए
इसरा वल मेराज पर विश्वास करना मुस्लिम आस्था का महत्वपूर्ण भाग है पर इसको यदि कोई गैर मुस्लिम चमत्कार न मानना चाहे, तो उसके आगे इसे हमें सिद्ध करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि मेराज की घटना 1400 साल पहले घटित हुई थी और हमेशा के लिए उस घटना की कुरानी आयत के अतिरिक्त कोई और निशानी नहीं बनाई गई है अत: कोई न मानना चाहे , न माने.... वे इस्लाम के उच्च नैतिक नियमों को ही माना लें, तो इतना काफी है.....!!!
क्या क़ुरआन के अनुसार सूरज दलदल में डूबता है ?
कुरान पाक के खिलाफ अक्सर कुछ भाई लोग ये कहते मिल जाते हैं कि कुरान के अनुसार सूरज काले मटमैले पानी मे जा के डूबता है, अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए कई लोग कुरान पाक की ये आयत भी दिखाते हैं
" यहाँ तक कि वह ( ज़ुलकारनैन ) उस जगह पहुंच गया ,और उसने सूरज को काले मटमैले पानी के स्रोत मे डूबते हुआ पाया"
सूरा -अल कहफ़ 18:86
लेकिन ये कोई वीर बताने की ज़हमत नहीं करता कि इस आयत के आगे और पीछे क्या लिखा है ... अगर बता दें तो उनकी पोल न खुल जाएगी
दरअसल इन आयतों मे महान चक्रवर्ती सम्राट "ज़ुल्कारनैन" जो कि एक इन्सान ही थे, कोई देवता या नबी नही जिनके पास चमत्कारी शक्तियां हों, उनका किस्सा है और उनके विजय अभियानों का जिक्र है
ये राजा ही कई देशों को जीतते हुए जब अति पश्चिम मे गए और समुद्र के किनारे पहुंचे तो शाम का समय था, सूरज डूब रहा था, ज़ुल्कारनैन ने जैसा मंज़र उस वक्त देखा, उसी का वर्णन कुरान 18:86 मे है ॥
सूरज पानी मे डूबा, ये एक इन्सान का व्यू है जो आसमान मे उड़ कर धरती से दूर जाकर ये नहीं देख सकते थे कि सूरज कहाँ गया,
न कि यहाँ ये ज़िक्र है कि अल्लाह ने सूरज के साथ क्या किया
जिसको ये देखना है कि कुरान के अनुसार रात मे सूरज कहाँ जाता है, वो सूरह ज़ुमर की 5वीं आयत देखे जिसमे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर "लपेटता" है .... लपेटने का अर्थ है किसी चीज को ऊपर नीचे हर ओर से गोलाई मे कवर करना, यानि कुरान के अनुसार अल्लाह दुनिया पर हर ओर से सूर्य का प्रकाश डालता है, इसका अर्थ है कि जब रात मे सूरज छिप जाता है तो वो दुनिया के उल्टी तरफ के गोलार्ध पर उजाला फैला रहा होता है .. न कि समुद्र मे डूब कर उजाला फैलाना बंद कर देता है !!
और रही बात पानी के काला मटमैला होने की तो फैक्ट ये है कि समुद्र तट पर सूरज डूबते समय पानी का रंग काला और मटमैला ही दिखता है, ये आप समुद्र के किनारे जाकर देख सकते हैं, या समुद्र के छोर पर अस्त होते हुए सूरज के फोटो देख कर भी चेक कर सकते हैं...!!
जिहाद क्या है ?
जिहाद के बारे मे लगातार दुष्प्रचार किया जाता है कि जिहाद का अर्थ मुस्लिमों द्वारा हथियारों से लैस होकर, गैर मुस्लिमों की हत्या करने को उनसे युद्ध करना होता है, पर ये सरासर गलत है
बल्कि जब आप जिहाद शब्द का अर्थ भी देखेंगे, तो उस अर्थ का हिंसा से कोई सम्बन्ध नही निकलता । जिहाद का अर्थ युद्ध अथवा जनसंहार कतई नही होता, बल्कि जिहाद शब्द अरबी के "जहद" से बना है जिसका अर्थ होता है कोशिश या प्रयास करना, जरा प्रयास शब्द मे हिंसा ढूंढ के दिखाइए ....
इस्लाम मे जिहाद का अर्थ है "किसी भी प्रकार की बुराई को मिटाने के लिए कोशिश करना"..... फिर चाहे कोई बुराई गैर मुस्लिम समाज मे हो, या मुस्लिम समाज मे कोई बुराई पनप गई हो, या खुद हमारे अन्दर ही कोई बुराई पैदा हो गई हो, हर बुराई का खात्मा करने के लिए मुसलमान को प्रतिबद्ध होना चाहिए...
वस्तुत: जिहाद का सम्बन्ध खून खराबे या हथियार उठाने से नही है ..... अब जैसे इस हदीस पर ध्यान दीजिए कि प्यारे नबी स. ने फरमाया सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद वो है जो एक व्यक्ति खुद अपने चरित्र की बुराइयों के खिलाफ करता है .....(तिबरानी)
ज़ाहिर है कि कोई व्यक्ति जब सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद करेगा, तो वो अपने चरित्र की बुराई के खिलाफ जिहाद करेगा तो इसमें हथियार उठाने या खून बहाने की कोई सम्भावना ही नही है, .... और जब वो व्यक्ति अपने चरित्र की बुराइयों को खत्म कर लेगा तो फिर आगे परिस्थितियोंवश अगर उसे कभी युद्ध भी करना पड़ जाए तो भी वो किसी पर अत्याचार करने की सोच भी नही सकता
इसी प्रकार एक और हदीस मे जिक्र है कि आप स.अ.व. ने फरमाया कि ये एक बेहतर जिहाद है कि अत्याचारी शासक के सामने शासक के विरुद्ध इन्साफ की कोई बात कह दी जाए (सुनन अल-निसाई)
और जैसी धारणा जिहाद का कुप्रचार करने वालों ने समाज की बना दी है कि जिहाद का अर्थ इस्लाम को फैलाने के लिए गैर मुस्लिमों से जबरन युद्ध करना है वैसा तो बिल्कुल भी नही है, इस्लाम कभी भी मुसलमान को खुद कोई भी युद्ध शुरू करने की इजाजत नही देता
प्यारे नबी स.अ.व. ने एक जंग के मौके पर लोगों को खिताब करते हुए फरमाया है
" ऐ लोगों खुद कभी दुश्मन से लड़ाई भिड़ाई करने की चाहत न करो, बल्कि अल्लाह से दुआ किया करो कि वो दुश्मन के शर से तुम्हारी हिफाज़त करे ।
लेकिन जब (शत्रु हमला कर दे तो) बहुत मजबूरी मे तुम्हें दुश्मन के मुकाबले जंग करनी पड़ जाए तो न्याय पर कायम रहते हुए युद्ध लड़ो.. (सहीह मुस्लिम)
अर्थात् हथियार उठाना तो बहुत मजबूरी की बात है जबकि गैर मुस्लिम इस्लाम का खात्मा करने के लिए मुस्लिमों पर आक्रामक हो गए हों तभी मुसलमान को आत्मरक्षा मे युद्ध करने की इजाजत है और इस युद्ध मे भी न्याय का पूरा ध्यान एक मुस्लिम को रखने के निर्देश दिए गए हैं ।
कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो, महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो
संक्षेप मे, जिहाद शान्तिप्रिय लोगों को कष्ट देने का नाम नहीं बल्कि जिहाद तो नाम है लोगों के कष्ट दूर करने को एक मुस्लिम द्वारा खुद कष्ट उठाने का ...
जिहाद हर वो भलाई का काम है जिसे करने मे एक मुस्लिम को थोड़ा भी कष्ट उठाना पड़े ,और वो अल्लाह की रज़ा के लिए कष्ट उठाकर भी वो काम कर जाए ... ये है जिहाद , और समाज से बुराई मिटाने का प्रयास अर्थात् जिहाद एक सत्कार्य है, न कि कोई पाप ये अब आपके सामने भी स्पष्ट हो गया है ..!!
इस्लाम मे युद्ध की अनुमति आत्मरक्षा के लिए है,
अनेक लोगों मे इस्लाम के विषय मे एक भ्रम ये है, कि इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की इस्लाम मे इजाजत है, और स्वयं इस्लाम के पैगंबर स. ने इस्लाम को फैलाने के लिए काफिरों से युद्ध किए.... इस्लाम फैलाने के लिए तलवार उठाने की इसी इजाजत के कारण आज दुनियाभर मे अनेक सशस्त्र इस्लामी जिहादी संगठन पैदा हो गए हैं, जिन्होंने विश्व भर मे आतंक फैला रखा है ....
... जबकि असल बात ये है कि इस्लाम मे इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की कतई इजाजत नही है .... बेशक नबी स. ने अरब के काफिरों से युद्ध किए लेकिन वो युद्ध उन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए नही किए थे, बल्कि उन्हें वो युद्ध मजबूरन करने पड़े, इस्लाम को "बचाने" के लिए !
इस्लाम को फैलाना और इस्लाम को बचाना, दोनों बातों मे बड़ा फर्क है ...
चौदह सौ वर्ष पहले के अरब मूर्ति-पूजक गैर मुसलिम समाज के व्यवहार की ओर हम ध्यान दें तो पता चलता है, वे अरब बड़े ही हिंसक प्रवृत्ति के लोग हुआ करते थे... इसी माहौल मे जब नबी स. ने मक्का के लोगों को इस्लाम की दावत देनी शुरू की, लोगों को नवजात बच्चियों की हत्या करने से रोकने लगे, गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने से लोगों को रोकने लगे , मूर्ति पूजा से लोगों को रोका और एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया
और आप स. की इन बातों से प्रभावित होकर मक्का के कुछ गरीब लोगों और कुछ गुलामों ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो अरब के अमीर और प्रभावशाली वो लोग जो अपने हिंसक रीति रिवाज़ो से प्रेम करते थे, इस बात से चिढ़ गए ,और उन्होने उन गरीब नव मुस्लिमों को मार पीटकर उनका धर्म छुड़वा देना चाहा ताकि इस्लाम की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए
लेकिन ऐसा न हुआ, उन गरीब मुसलमानों ने खुद को बुरी तरह प्रताड़ित किए जाने के बावजूद इस्लाम का त्याग न किया .. और उन नव मुस्लिमों का इस्लाम से इस कदर प्रेम देखकर अरब के गैर मुस्लिम और बौखला गए और मुस्लिमों पर और सख्ती से अत्याचार करने लगे ... लेकिन इसका असर उल्टा ही हुआ, और नव मुस्लिमों के मुंह से इस्लाम की प्यारी प्यारी तालीमात का जिक्र सुनकर इस्लाम कुबूल करने वालो की तादाद बढ़ती गई.
लगभग 11 वर्ष तक मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार किए ..... उन्होंने अपने अनेक गुलामो के यातनाएँ देकर अंग भंग कर दिए क्योंकि उन गुलामो ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, और कुछ गरीब मुसलमानों को यातनाएँ दे देकर मार डाला....... लेकिन मुस्लिम शांति और इस्लाम के मार्ग पर अडिग रहे .... न मुस्लिमों ने पलटकर कभी किसी पर वार किया और न ही इस्लाम से हटे कई मुसलमान इन भयंकर तकलीफो से बचने के लिए प्यारे नबी स. की सलाह पर मक्का से बाहर ऐसी जगहों पर चले गए जहाँ वे शांति से अपने धर्म इस्लाम का पालन करते हुए जीवन गुज़ार सकें.
और जब मक्का मे रहना एकदम दूभर हो गया और पैगंबर स. के कत्ल की कोशिशें मक्का के गैर मुस्लिम करने लगे तो पैगंबर मोहम्मद स. भी बाकी मुसलमानों के साथ मक्का से मदीना प्रस्थान कर गए
लेकिन इसके बावजूद मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुसलमानों का पीछा नही छोड़ा, उन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
और फिर मुस्लिमों के मदीना पहुंचने के दूसरे वर्ष, मक्का के काफिरो ने मुस्लिमों पर चढ़ाई कर दी , इसके पहले हमेशा मुस्लिमों ने काफिरो के अत्याचारों को पैगंबर स. के हुक्म पर चुपचाप बर्दाश्त कर लिया था, और यदि काफिरो की मुस्लिमों पर ये चढ़ाई केवल मुस्लिमों को बंदी बनाने, मुस्लिमो को मारने पीटने या मुस्लिमों की माल दौलत छीनने के लिए होती तो बात कुछ और होती, लेकिन अब तो सारे मुस्लिमों की हत्या कर के इस्लाम के खात्मे का अरमान लेकर काफिरो ने चढ़ाई की थी, अत: मुस्लिमों की जान की हिफाज़त के लिए और इस्लाम का अस्तित्व बचाने के लिए मुस्लिमों को आत्मरक्षा मे युद्ध की इज़ाज़त दी गई... इसके बाद भी पैगम्बर स. के जमाने मे काफिरो ने बार बार मुस्लिमों पर चढ़ाई की और मुस्लिमों ने सदा आत्मरक्षा मे और काफिरो से मुस्लिमों की जान बचाने के लिए बहुत मजबूर होकर तलवार उठाई न कि गैर मुस्लिमों को तलवार का भय दिखाकर जबरन मुसलमान बनाने के लिए
क्योंकि इस्लाम मे ये बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी को विवश कर के इस्लाम कुबूल कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, अल्लाह जिसे चाहता है वो व्यक्ति केवल समझाने मात्र से मुस्लिम बन जाता है .... पवित्र कुरान मे लिखा है
"अगर तुम्हारा रब्ब चाहता, तो इस धरती मे जितने लोग हैं, वे सारे के सारे ईमान ले आते . फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे ईमान वाले बन जाएं ?"
[ पवित्र कुरान 10:99 ]
रही बात इस्लाम के प्रसार की, तो उसके लिए केवल दो ही कारण उत्तरदायी थे, एक तो मुस्लिमों द्वारा इस्लामी शिक्षा के प्रवचन दिए जाना, और दूसरा मुस्लिमों के नए आचार व्यवहार, जिनसे प्रभावित होकर लोग स्वत: ही इस्लाम कुबूल कर लेते थे
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