कुछ दोस्तों के मेंशन करने पर मालूम हुआ कि फ़िरऔन की लाश पर डॉ मौरिस बुकाय के परीक्षण वाले मेरे लेख के विरोध लखनऊ के एक भाई साहब ने एक लंबा लेख लिखा है, .... वैसे इन सारे एतराजों के जवाब मैं कोई चार पांच साल पहले एक संघी सज्जन को इनबॉक्स में दे चुका हूँ, पर अब चूँकि उन भाई साहब ने इन एतराजों को इकट्ठा करके अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर दिया है, तो मुझे भी सार्वजनिक रूप से जवाब देना पड़ेगा
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.....भाई साहब ने अपने लंबे लेख में हालांकि ये पहले बता दिया कि क़ुरान या उससे पूर्ववर्ती किताबों में केवल "फ़िरऔन" यानि उपाधि का ज़िक्र किया गया है, न कि उसके नाम का...
.. फिर इसके बाद न जाने क्यों उन्होंने लम्बी बात इस बहस में निकाली के वो लाश सेती, रामिसिस या मरनेप्टेह में से किसकी है और किसकी नही ..... दरअसल ये शरीर और इसके साथ अन्य शरीर जो 1898 में सामूहिक कब्रगाह से मिले थे, उन्हें आधुनिक वैज्ञानिकों ने रामिसिस द्वितीय और मरनेप्टेह वगैरह के शरीर माना है, ... इनमें कौन सा शरीर किसका है ये कन्फ्यूज़न इन आधुनिक वैज्ञानिकों के बीच है... इस बात में जिन गलतियों पर लेख में काफी सारा वक्त लगाया गया उसमे अगर गलती सिद्ध भी हो तो क़ुरान के दावे नही बल्कि आधुनिक वैज्ञानिकों के दावे गलत सिद्ध होंगे, ... क़ुरान ने तो एक मिस्री शासक फ़िरऔन की लाश के आश्चर्यजनक रूप से नष्ट न होने की बात कही थी, जो दावा इस शरीर के मिलने के साथ सही सिद्ध हो चुका है
.... लेख में एक बात ये कही गई कि मुस्लमान लाल सागर के पास से उस लाश के मिलने की बात कहते हैं, जबकि वो लाश नील नदी के पास एक कब्रगाह से मिली है,
...मैं मानता हूँ ये मेरी ही गलती है, मैंने अपने लेख में भूलवश उस कब्रगाह को लालसागर के पास बता दिया, दरअसल मिस्र से लौटे मेरे एक भाई ने मेरे इन्टरनेट पर आने से कुछ वर्ष पहले ही मुझे बताया था कि फ़िरऔन की लाश एक जलस्रोत के पास मिली थी, इन्टरनेट पर आने के बाद जब मैं वर्ष 2011 या 12 में मौरिस बुकाय पर लेख लिख रहा था, तब फ़िरऔन की लाश जिस कब्रगाह में मिली उसको नक्शे में देखकर मुझे वो जिस जलस्रोत के करीब लगी वो लालसागर था, मैंने ये बात लिख दी, हालाँकि नक्शे में पास दिखने वाला लालसागर उस कब्रगाह से कई किलोमीटर दूर था, और कब्रगाह के बिंदु से लगकर गुजरती जो पतली सी रेखा मुझे नज़र नही आई थी वो नील नदी थी ....चलिये मानता हूँ, मेरी गलती थी, लेकिन ये सिर्फ कन्फ्यूज़न था, वरना ये तथ्य सर्वविदित है कि ये लाशें नील नदी के पास से मिलीं, और नील नदी के पास ही मूसा अस० का पूरा किस्सा चलता है, यानि इस बात से ये तथ्य और मज़बूत होता है कि ये उसी फ़िरऔन का शरीर हो सकता है जिसकी चर्चा क़ुरान में है....!!
लाशों के मिलने का सही स्थान बताने में मुझसे चूक हुई, पर इससे मुख्य बात पर असर क्या पड़ता है ?? वो लाशें कहाँ से निकलीं, महत्वपूर्ण बात ये नही है ..... महत्वपूर्ण बात ये है कि डॉ मौरिस को इस शरीर में जो अद्भुत बात दिखी वो ये कि ये शरीर प्रॉपर ममी के रूप में नही था, फिर भी लगभग 3300 साल पुराना होकर भी नष्ट नही हुआ था, तिसपर उसके शरीर में समुद्री नमक मिला, नमक यानि सोडियम क्लोराइड की प्रकृति मांस या वनस्पतियों के भीतर जलधारिता बढाने की होती है, और चीज़ में पानी बढ़ने के कारण ही वो चीज़ गलने और नष्ट होने लगती अक्सर आपने पढ़ा होगा कि अपराधी हत्या करने के बाद लाश को जल्दी नष्ट करने के लिये उसे नमक के ढेर में दबा देते हैं.... और इधर लेख लिखने वाले भाई साहब ने अक्ल के घोड़े दौड़ाये कि नमक का प्रयोग ममी बनाने के लिये किया जाता होगा....!!!
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.... ममीफिकेशन प्रोसेस में सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल किया जाता तो लाश उसी वक्त गल सड़ कर खत्म हो जाती, नमक की प्रकृति है किसी भी चीज़ में जलधारिता बढाना, और ममी बनाने के लिये नमक से ठीक विपरीत प्रकृति की चीज़ की ज़रूरत थी, यानि ऐसी चीज़ जो शरीर का सारा पानी सुखा दे, यानी डीहाइड्रेट कर दे ताकि निर्जल हो चुका शरीर बैक्टीरिया के हमलों से बच जाए.... ममी बनाने के लिये जिस चीज़ का प्रयोग किया जाता था वो सोडियम का नमक से बिलकुल ही विपरीत कम्पाउंड Natron था जो बॉडी को डीहाइड्रेट करने के लिये इस्तेमाल किया जाता था .....
.... खैर डॉ बुकाय के लिये सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक बात यही थी कि शरीर में नमक की मौजूदगी के बावजूद शरीर गलकर नष्ट क्यों नही हुआ .... क़ुरान से इस शरीर की तीन बातें मिल रही थीं, पहली- शरीर का अब से लगभग साढ़े तीन हज़ार साल पुराना होना जो मूसा का काल था (मेरे विरोध में लेख लिखने वाले ने मूसा का काल ईसा से तीन हज़ार साल पहले लिखा जो गलत है, मूसा का काल ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व माना जाता है)
दूसरी- शरीर के समुद्र में डूबकर मरने के संकेत
और तीसरी- शरीर के किसी अज्ञात कारण से बचे रह जाने की बात
....... इन्ही बातों ने मौरिस को इस्लाम की तरफ आकृष्ट किया ...
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..उन भाई ने अपने लेख में दावा किया है कि डॉ मौरिस मुस्लिमों की चाटुकारिता में गलत बातें लिख रहे थे, दरअसल ये बात भी ये भाई इंटरनेट पर पड़े अपने मतलब के लेखों को पढ़कर कह रहे हैं, वरना अगर डॉ बुकाय की कोई गलतबयानी साबित हो गई होती तो एंटी इस्लामिक साइट्स पर विस्तार से उनकी निंदा में लेख होते, इतना संक्षिप्त जानकारी न होती जैसी आज इंटरनेट पर डॉ बुकाय के बारे में सर्च करने पर मिलती है, वास्तविकता ये है कि मॉर्डन साइंस और इस्लाम पर उनकी किताब का कोई जवाब आज तक किसी से दे नही मिला है, ... कोई इंसान चाटुकारिता में या पैसों के लालच में इतने मज़बूत तर्क नही पेश कर सकता जैसे डॉ बुकाय ने पेश किये हैं, और दूसरे के धर्म की प्रसंशा भी कोई इतनी आसानी से नही करने लगता, उसके लिये मन पर गहरा प्रभाव और साइंस समझने वाले, डॉ मौरिस जैसे लोगों के लिये अन्य कई बातों का प्रभाव ज़रूरी है
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... डॉ मौरिस बुकाय ने जिस शरीर पर परीक्षण करके उसे फ़िरऔन का शरीर माना, जबकि केमिस्ट्री का क ख ग न जानने वाले लखनऊ वाले भाई उस शरीर को ममी बनाये जाने के कारण सुरक्षित बचा मानने की बात पर ज़ोर दे रहे हैं, पर साक्ष्य बता रहे हैं कि ये शरीर ममी हरगिज़ नही है, ममी के शरीर के अंग निकाल कर उसपर मसाला लगाकर उसे पट्टियों से कवर कर दिया जाता था, तमाम ममियों के सर मुंडे हुए होते हैं , लेकिन इस शरीर पर पट्टियों का आवरण शरीर के कुछ अंगों पर है बाकी पर नही है, जबकि पुरातात्विक अवशेषों को संरक्षित करने की नीति ये है कि वो जिस अवस्था में मिली हों उन्हें ठीक उसी अवस्था में हमेशा रखा जाए, शरीर के इस प्रकार खुला रखे जाने से भी प्रतीत होता है कि इसका ममीफिकेशन नही किया गया था, और ये भी देखिये कि इसके सर पर बड़े बड़े बाल हैं,
... ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस ने 400 ईसापूर्व ममी बनने की प्रक्रिया देखी थी उसने साफ़ लिखा है कि शरीर के सारे अंदरूनी अंग निकाल कर, शरीर को पूरा शेव करने के बाद ही उसको डीहाइड्रेट करने के लिये Natron में रखा जाता था" ...फिर कुछ समय बाद शरीर को साफ़ करके अन्य तेल मसालों का लेप कर के पट्टियों से कवर किया जाता था...
..... हां, अंत में एक बात और, उस शरीर में, जिसपर डॉ मौरिस ने परीक्षण किये थे उसकी गर्दन की जगह लकड़ी फंसी होने की बात अशफ़ाक़ भाई ने अपने लेख में कही, और उससे जो शरीर को ममी बनाए जाने का अनुमान निकाला ये केवल अनुमान है ... मुझे नही पता के उस शरीर में लकड़ी फंसी होने की बात में सत्यता है या फिर वो भी समुद्री नमक से ममी बनाए जाने जैसी कल्पनाओं की उड़ान है,
... बहरहाल अगर लकड़ी फंसी होने की बात सही भी मान लूँ, तो ये लकड़ी समुद्र में डूबते समय उसके शरीर में जा फंसी हो इस बात की पूरी संभावना है, इससे उस शरीर का ममी बनाये जाना सिद्ध नही होता.... जो बात इन शवों के शरीर पर बालों आदि की मौजूदगी भी सिद्ध करती है,
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इस शरीर पर मांस चढ़ने और नाखूनों के बढ़ने की बात मुझे भी अतिश्योक्ति लगती है, मैंने ऐसा दावा भी नही किया.... मगर इस शरीर को साधारण ममी कहकर बात को आई गई भी नही किया जा सकता, ये बात हमारे उन मित्रों को समझनी होगी, जो विज्ञान का आधा अधूरा ज्ञान लेकर किसी भी तथ्य को झुठला देने की कोशिशों में लगे रहते हैं
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