मंगलवार, 25 मई 2021
क्या क़ुरआन के अनुसार सूरज दलदल में डूबता है ?
कुरान पाक के खिलाफ अक्सर कुछ भाई लोग ये कहते मिल जाते हैं कि कुरान के अनुसार सूरज काले मटमैले पानी मे जा के डूबता है, अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए कई लोग कुरान पाक की ये आयत भी दिखाते हैं
" यहाँ तक कि वह ( ज़ुलकारनैन ) उस जगह पहुंच गया ,और उसने सूरज को काले मटमैले पानी के स्रोत मे डूबते हुआ पाया"
सूरा -अल कहफ़ 18:86
लेकिन ये कोई वीर बताने की ज़हमत नहीं करता कि इस आयत के आगे और पीछे क्या लिखा है ... अगर बता दें तो उनकी पोल न खुल जाएगी
दरअसल इन आयतों मे महान चक्रवर्ती सम्राट "ज़ुल्कारनैन" जो कि एक इन्सान ही थे, कोई देवता या नबी नही जिनके पास चमत्कारी शक्तियां हों, उनका किस्सा है और उनके विजय अभियानों का जिक्र है
ये राजा ही कई देशों को जीतते हुए जब अति पश्चिम मे गए और समुद्र के किनारे पहुंचे तो शाम का समय था, सूरज डूब रहा था, ज़ुल्कारनैन ने जैसा मंज़र उस वक्त देखा, उसी का वर्णन कुरान 18:86 मे है ॥
सूरज पानी मे डूबा, ये एक इन्सान का व्यू है जो आसमान मे उड़ कर धरती से दूर जाकर ये नहीं देख सकते थे कि सूरज कहाँ गया,
न कि यहाँ ये ज़िक्र है कि अल्लाह ने सूरज के साथ क्या किया
जिसको ये देखना है कि कुरान के अनुसार रात मे सूरज कहाँ जाता है, वो सूरह ज़ुमर की 5वीं आयत देखे जिसमे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर "लपेटता" है .... लपेटने का अर्थ है किसी चीज को ऊपर नीचे हर ओर से गोलाई मे कवर करना, यानि कुरान के अनुसार अल्लाह दुनिया पर हर ओर से सूर्य का प्रकाश डालता है, इसका अर्थ है कि जब रात मे सूरज छिप जाता है तो वो दुनिया के उल्टी तरफ के गोलार्ध पर उजाला फैला रहा होता है .. न कि समुद्र मे डूब कर उजाला फैलाना बंद कर देता है !!
और रही बात पानी के काला मटमैला होने की तो फैक्ट ये है कि समुद्र तट पर सूरज डूबते समय पानी का रंग काला और मटमैला ही दिखता है, ये आप समुद्र के किनारे जाकर देख सकते हैं, या समुद्र के छोर पर अस्त होते हुए सूरज के फोटो देख कर भी चेक कर सकते हैं...!!
जिहाद क्या है ?
जिहाद के बारे मे लगातार दुष्प्रचार किया जाता है कि जिहाद का अर्थ मुस्लिमों द्वारा हथियारों से लैस होकर, गैर मुस्लिमों की हत्या करने को उनसे युद्ध करना होता है, पर ये सरासर गलत है
बल्कि जब आप जिहाद शब्द का अर्थ भी देखेंगे, तो उस अर्थ का हिंसा से कोई सम्बन्ध नही निकलता । जिहाद का अर्थ युद्ध अथवा जनसंहार कतई नही होता, बल्कि जिहाद शब्द अरबी के "जहद" से बना है जिसका अर्थ होता है कोशिश या प्रयास करना, जरा प्रयास शब्द मे हिंसा ढूंढ के दिखाइए ....
इस्लाम मे जिहाद का अर्थ है "किसी भी प्रकार की बुराई को मिटाने के लिए कोशिश करना"..... फिर चाहे कोई बुराई गैर मुस्लिम समाज मे हो, या मुस्लिम समाज मे कोई बुराई पनप गई हो, या खुद हमारे अन्दर ही कोई बुराई पैदा हो गई हो, हर बुराई का खात्मा करने के लिए मुसलमान को प्रतिबद्ध होना चाहिए...
वस्तुत: जिहाद का सम्बन्ध खून खराबे या हथियार उठाने से नही है ..... अब जैसे इस हदीस पर ध्यान दीजिए कि प्यारे नबी स. ने फरमाया सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद वो है जो एक व्यक्ति खुद अपने चरित्र की बुराइयों के खिलाफ करता है .....(तिबरानी)
ज़ाहिर है कि कोई व्यक्ति जब सबसे उच्च श्रेणी का जिहाद करेगा, तो वो अपने चरित्र की बुराई के खिलाफ जिहाद करेगा तो इसमें हथियार उठाने या खून बहाने की कोई सम्भावना ही नही है, .... और जब वो व्यक्ति अपने चरित्र की बुराइयों को खत्म कर लेगा तो फिर आगे परिस्थितियोंवश अगर उसे कभी युद्ध भी करना पड़ जाए तो भी वो किसी पर अत्याचार करने की सोच भी नही सकता
इसी प्रकार एक और हदीस मे जिक्र है कि आप स.अ.व. ने फरमाया कि ये एक बेहतर जिहाद है कि अत्याचारी शासक के सामने शासक के विरुद्ध इन्साफ की कोई बात कह दी जाए (सुनन अल-निसाई)
और जैसी धारणा जिहाद का कुप्रचार करने वालों ने समाज की बना दी है कि जिहाद का अर्थ इस्लाम को फैलाने के लिए गैर मुस्लिमों से जबरन युद्ध करना है वैसा तो बिल्कुल भी नही है, इस्लाम कभी भी मुसलमान को खुद कोई भी युद्ध शुरू करने की इजाजत नही देता
प्यारे नबी स.अ.व. ने एक जंग के मौके पर लोगों को खिताब करते हुए फरमाया है
" ऐ लोगों खुद कभी दुश्मन से लड़ाई भिड़ाई करने की चाहत न करो, बल्कि अल्लाह से दुआ किया करो कि वो दुश्मन के शर से तुम्हारी हिफाज़त करे ।
लेकिन जब (शत्रु हमला कर दे तो) बहुत मजबूरी मे तुम्हें दुश्मन के मुकाबले जंग करनी पड़ जाए तो न्याय पर कायम रहते हुए युद्ध लड़ो.. (सहीह मुस्लिम)
अर्थात् हथियार उठाना तो बहुत मजबूरी की बात है जबकि गैर मुस्लिम इस्लाम का खात्मा करने के लिए मुस्लिमों पर आक्रामक हो गए हों तभी मुसलमान को आत्मरक्षा मे युद्ध करने की इजाजत है और इस युद्ध मे भी न्याय का पूरा ध्यान एक मुस्लिम को रखने के निर्देश दिए गए हैं ।
कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो, महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो
संक्षेप मे, जिहाद शान्तिप्रिय लोगों को कष्ट देने का नाम नहीं बल्कि जिहाद तो नाम है लोगों के कष्ट दूर करने को एक मुस्लिम द्वारा खुद कष्ट उठाने का ...
जिहाद हर वो भलाई का काम है जिसे करने मे एक मुस्लिम को थोड़ा भी कष्ट उठाना पड़े ,और वो अल्लाह की रज़ा के लिए कष्ट उठाकर भी वो काम कर जाए ... ये है जिहाद , और समाज से बुराई मिटाने का प्रयास अर्थात् जिहाद एक सत्कार्य है, न कि कोई पाप ये अब आपके सामने भी स्पष्ट हो गया है ..!!
इस्लाम मे युद्ध की अनुमति आत्मरक्षा के लिए है,
अनेक लोगों मे इस्लाम के विषय मे एक भ्रम ये है, कि इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की इस्लाम मे इजाजत है, और स्वयं इस्लाम के पैगंबर स. ने इस्लाम को फैलाने के लिए काफिरों से युद्ध किए.... इस्लाम फैलाने के लिए तलवार उठाने की इसी इजाजत के कारण आज दुनियाभर मे अनेक सशस्त्र इस्लामी जिहादी संगठन पैदा हो गए हैं, जिन्होंने विश्व भर मे आतंक फैला रखा है ....
... जबकि असल बात ये है कि इस्लाम मे इस्लाम को फैलाने के लिए तलवार उठाने की कतई इजाजत नही है .... बेशक नबी स. ने अरब के काफिरों से युद्ध किए लेकिन वो युद्ध उन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए नही किए थे, बल्कि उन्हें वो युद्ध मजबूरन करने पड़े, इस्लाम को "बचाने" के लिए !
इस्लाम को फैलाना और इस्लाम को बचाना, दोनों बातों मे बड़ा फर्क है ...
चौदह सौ वर्ष पहले के अरब मूर्ति-पूजक गैर मुसलिम समाज के व्यवहार की ओर हम ध्यान दें तो पता चलता है, वे अरब बड़े ही हिंसक प्रवृत्ति के लोग हुआ करते थे... इसी माहौल मे जब नबी स. ने मक्का के लोगों को इस्लाम की दावत देनी शुरू की, लोगों को नवजात बच्चियों की हत्या करने से रोकने लगे, गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने से लोगों को रोकने लगे , मूर्ति पूजा से लोगों को रोका और एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया
और आप स. की इन बातों से प्रभावित होकर मक्का के कुछ गरीब लोगों और कुछ गुलामों ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो अरब के अमीर और प्रभावशाली वो लोग जो अपने हिंसक रीति रिवाज़ो से प्रेम करते थे, इस बात से चिढ़ गए ,और उन्होने उन गरीब नव मुस्लिमों को मार पीटकर उनका धर्म छुड़वा देना चाहा ताकि इस्लाम की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए
लेकिन ऐसा न हुआ, उन गरीब मुसलमानों ने खुद को बुरी तरह प्रताड़ित किए जाने के बावजूद इस्लाम का त्याग न किया .. और उन नव मुस्लिमों का इस्लाम से इस कदर प्रेम देखकर अरब के गैर मुस्लिम और बौखला गए और मुस्लिमों पर और सख्ती से अत्याचार करने लगे ... लेकिन इसका असर उल्टा ही हुआ, और नव मुस्लिमों के मुंह से इस्लाम की प्यारी प्यारी तालीमात का जिक्र सुनकर इस्लाम कुबूल करने वालो की तादाद बढ़ती गई.
लगभग 11 वर्ष तक मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार किए ..... उन्होंने अपने अनेक गुलामो के यातनाएँ देकर अंग भंग कर दिए क्योंकि उन गुलामो ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, और कुछ गरीब मुसलमानों को यातनाएँ दे देकर मार डाला....... लेकिन मुस्लिम शांति और इस्लाम के मार्ग पर अडिग रहे .... न मुस्लिमों ने पलटकर कभी किसी पर वार किया और न ही इस्लाम से हटे कई मुसलमान इन भयंकर तकलीफो से बचने के लिए प्यारे नबी स. की सलाह पर मक्का से बाहर ऐसी जगहों पर चले गए जहाँ वे शांति से अपने धर्म इस्लाम का पालन करते हुए जीवन गुज़ार सकें.
और जब मक्का मे रहना एकदम दूभर हो गया और पैगंबर स. के कत्ल की कोशिशें मक्का के गैर मुस्लिम करने लगे तो पैगंबर मोहम्मद स. भी बाकी मुसलमानों के साथ मक्का से मदीना प्रस्थान कर गए
लेकिन इसके बावजूद मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुसलमानों का पीछा नही छोड़ा, उन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
और फिर मुस्लिमों के मदीना पहुंचने के दूसरे वर्ष, मक्का के काफिरो ने मुस्लिमों पर चढ़ाई कर दी , इसके पहले हमेशा मुस्लिमों ने काफिरो के अत्याचारों को पैगंबर स. के हुक्म पर चुपचाप बर्दाश्त कर लिया था, और यदि काफिरो की मुस्लिमों पर ये चढ़ाई केवल मुस्लिमों को बंदी बनाने, मुस्लिमो को मारने पीटने या मुस्लिमों की माल दौलत छीनने के लिए होती तो बात कुछ और होती, लेकिन अब तो सारे मुस्लिमों की हत्या कर के इस्लाम के खात्मे का अरमान लेकर काफिरो ने चढ़ाई की थी, अत: मुस्लिमों की जान की हिफाज़त के लिए और इस्लाम का अस्तित्व बचाने के लिए मुस्लिमों को आत्मरक्षा मे युद्ध की इज़ाज़त दी गई... इसके बाद भी पैगम्बर स. के जमाने मे काफिरो ने बार बार मुस्लिमों पर चढ़ाई की और मुस्लिमों ने सदा आत्मरक्षा मे और काफिरो से मुस्लिमों की जान बचाने के लिए बहुत मजबूर होकर तलवार उठाई न कि गैर मुस्लिमों को तलवार का भय दिखाकर जबरन मुसलमान बनाने के लिए
क्योंकि इस्लाम मे ये बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी को विवश कर के इस्लाम कुबूल कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, अल्लाह जिसे चाहता है वो व्यक्ति केवल समझाने मात्र से मुस्लिम बन जाता है .... पवित्र कुरान मे लिखा है
"अगर तुम्हारा रब्ब चाहता, तो इस धरती मे जितने लोग हैं, वे सारे के सारे ईमान ले आते . फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे ईमान वाले बन जाएं ?"
[ पवित्र कुरान 10:99 ]
रही बात इस्लाम के प्रसार की, तो उसके लिए केवल दो ही कारण उत्तरदायी थे, एक तो मुस्लिमों द्वारा इस्लामी शिक्षा के प्रवचन दिए जाना, और दूसरा मुस्लिमों के नए आचार व्यवहार, जिनसे प्रभावित होकर लोग स्वत: ही इस्लाम कुबूल कर लेते थे
आतंकवाद और इस्लाम: दो विपरीत ध्रुव
पिछले दिनों नाइजीरिया मे "बोको हराम" नाम के एक हराम संगठन ने वहाँ की तकरीबन 200
अबला लड़कियों को अगवा कर के इस कुकर्म को इस्लाम से जोड़ने की साजिश की
बीबीसी के
इण्टरव्यू मे मलाला यूसुफज़ई ने उन आतंकवादियो को मुसलमान मानते हुए उन्हें कुरान
शरीफ पढ़ने की नसीहत की , यानि मलाला जैसी 15 साल की कमउम्र और अनुभवहीन लड़की को
भी मालूम है कि आतंकवाद की मनाही है कुरान मे ..... हर उस मुस्लिम परिवार मे बच्चों
को बहुत छुटपन से ही कुरान की शिक्षा दी जाती है जो परिवार धर्म से थोड़ा भी लगाव
रखता है ... ऐसे मे कोई ये कैसे सोच सकता है कि मलाला जैसी कम उमर लड़की जो इस्लामी
तालीम से ज्यादा झुकाव पश्चिमी तालीम की तरफ रखती है, उसे तो कुरान का ज्यादा ज्ञान
है लेकिन उस से कहीं ज्यादा उम्र वाले मुसलमानों को कुरान का ज्ञान ही नही होगा और
वो भी ऐसे मुसलमान जो कि इस्लाम के प्रेम मे मरने मारने की हद तक पहुंचने का दावा
करते हों .... जाहिर है जब छोटे छोटे मुस्लिम बच्चों को भी इस्लाम की शांति की सीख
का ज्ञान है तो फिर कोई परिपक्व बुद्धि वाला और इस्लाम से अतिरिक्त लगाव का दावा
करने वाला व्यक्ति इस्लाम की इतनी अहम शिक्षा को न जानता हो ऐसा हो ही नही सकता
...... कुरान स्पष्ट रूप से और बार बार कहता है कि कोई मुसलमान से बुरा सुलूक करे
तो भी मुसलमान उससे भला सुलूक करे, लड़ाई झगड़े को अपनी ओर से भरसक टालने की कोशिश
की जाए, किसी भी निर्दोष की हत्या, चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उसकी हत्या
महापाप है, किसी भी स्त्री का बलात्कार चाहे वो दुश्मन की स्त्री क्यों न हो,
महापाप है, और यदि युद्ध करना पड़े तो भी दुश्मन के स्त्रियों बच्चों और युद्ध मे
भाग न लेने वाले शांतिप्रिय पुरुषों की सुरक्षा का ध्यान रखो कुरान की इन शिक्षाओ
का पालन न करना हराम है .... और जबकि दुनिया भर के इस्लामी विद्वान बार बार बोको
हराम और तहरीके तालिबान को चेता चुके हैं , कि ये आतंकवादी अल्लाह की आज्ञा की
अवहेलना कर रहे हैं, और इस्लाम ने जिन कामों को सबसे ज्यादा बुरा गुनाह बताया है वो
ही गुनाह ये आतंकी कर के दोजखी बन रहे हैं .... इसके बावजूद ये आतंकी संगठन अल्लाह
की आज्ञा को फालतू मानकर अपनी दुष्ट मनमर्जी चलाये और फिर दावा करें कि वो ये
इस्लाम के लिए कर रहे है तो इससे बड़ा झूठ मैं नहीं समझता कि कुछ और होगा ऐसे लोग
या तो गैर मुस्लिम होते हैं, जो इस्लाम को बदनाम करने के लिए ये स्वांग रचते हैं ,
या यदि इनमे से कोई व्यक्ति पहले कभी मुस्लिम था भी तो अल्लाह की आज्ञा की जानबूझ
कर और उद्दण्डता पूर्वक अवहेलना कर के समाज मे आतंकवाद फैलाने के कारण उसी दिन
इस्लाम से खारिज हो चुके हैं जिस दिन इन्होंने पहली कोई हराम आतंकी वारदात कर के
उसे इस्लाम से जोड़कर , इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश को अंजाम दिया था खुद ध्यान
लगाकर सोचिए कि बोको हराम जैसे ये आतंकी संगठन अपने इस्लामी ज्ञान से भरपूर होने का
दावा करते हैं .... और पश्चिमी शिक्षा के विरोध जैसे महत्वहीन मुद्दे पर पराई
लड़कियों को अगवा करने और उनकी इज़्ज़त का सौदा करने जैसे नाकाबिल ए माफी बदतरीन
गुनाह करते है.... जिनकी इस्लाम मे बहुत सख्त सजा है और हर मुसलमान को पता है कि
इस्लाम मे औरत की इज्जत से खिलवाड़ को सबसे बड़ा और सबसे घिनौना पाप कहा गया है ...
तो बोको हराम के इस हराम कारनामे को कोई इस्लाम से किस तरह जोड़ सकता है ?? स्पष्ट
है कि ये बोको हराम या तहरीक ए तालिबान या फिर इन्डियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी
संगठन मुस्लिमों के नही बल्कि मुस्लिमों के गैर मुस्लिम या बद अकीदा दुश्मनों के
हैं मलाला जैसी कम उम्र लड़की से अभी इतनी गहरी सोच की आशा नहीं की जा सकती कि वो
इस्लामी आतंकवाद के पीछे छिपी इस्लाम के दुश्मनों की गहरी साजिश को समझ सके मगर
बाकी सबकी समझ को क्या हुआ है ??
हिन्दू शब्द का अर्थ ?
कभी कभी मै बड़ा दुखी हो जाता हूँ ये देखकर कि हिन्दू मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने के लिए कितनी अधिक जगहों पर झूठ के किले खड़े किए गए हैं
अब देखिए अभी हमारे एक हिन्दू भाई ने हमसे कहा कि बाहर से मुस्लिम आये या अरबी आये तो उन्होंने यहाँ के लोगों की मुर्खता को, अथवा उनके काले होने को "हिन्दू" नाम दिया ......
ये प्रपंच मै काफी समय से देख रहा हूँ कि कुछ लोग ( विषेशकर आर्य समाजी ) ये सिद्ध करने मे लगे हुए हैं कि अरब के लोगों ने भारतीयों को हिंदू कहकर एक गाली दी है ...और हिंदू का अर्थ होता है..... मूर्ख, दास या फिर काला..॥
अवश्य ही ये आर्य समाजी इस बात से ध्यान भटकाने को ये प्रपंच रच रहे हैं, कि स्वयं आर्य जब विदेश से भारत आए तो यहाँ के मूल निवासियों को उन्होंने अनार्य, दास, शूद्र, राक्षस और असुर कहा था
अब इन्हीं आर्य समाजियों मे से कोई मुझे ये बताए कि अरब के लोग क्या भारतीयों से अधिक गोरे होते हैं, जो उनको भारतीयों की त्वचा का रंग अनोखा लगा ??
मैंने तो यही देखा है कि अरब के लोगों की त्वचा का रंग भी भारतीय लोगों के समान ही होता है..... साथ ही अरब मे नितान्त काले रंग के हब्शी भी रहते हैं जिन्हें प्यारे नबी स.अ.व. ने गोरी चमड़ी वालों के समान ही श्रेष्ठ बताया था, और रंग, नस्ल या क्षेत्रीयता के आधार पर ऊंच नीच करने वालों की भर्त्सना की थी ... पवित्र कुरान मे भी मुस्लिमों के लिए स्पष्ट आदेश है कि किसी भी व्यक्ति को बुरे नाम से न पुकारो.... तो भला कोई मुस्लिम किसी को कैसे मूर्ख या काला या दास जैसे अभद्र नामो से पुकार सकता था ??
बेशक अरब लोगों ने ही इस देश को हिन्द कहा था ...
हिन्द एक अरबी नाम है जो उस समय वहाँ भले घराने की लड़कियों के लिए प्रचलित था ... स्वयं पैगंबर की एक कजिन का नाम भी हिन्द था ॥
हिन्द का अर्थ अरबी मे है सौ ऊंटो का दल .... अरब मे ऊंट ऐश्वर्य और साधन सम्पन्नता का प्रतीक थे ..... इसलिए हिन्द भी एक नाम के रूप मे सुख ऐश्वर्य और अमीरी का प्रतीक है
इसके अतिरिक्त हिन्द शब्द का एक और अर्थ है "तीर या तलवार" ..... अरबी डिक्शनरी मे ऐसे नाम का गूढ़ अर्थ है, ताकतवर और रक्षा करने वाला । जैसे मेरे ही घर वाले मुझे "सैफ" कहकर बुलाते हैं ... सैफ भी एक अरबी शब्द है, और इस का अर्थ भी तलवार है ... सैफ नाम का गूढ़ अर्थ भी ताकत वाला और रक्षक होता है ॥
जब अरब भारत आए तो उन्होंने सिन्ध की अपेक्षा इस देश को हिन्द कहना पसंद किया और ये नाम उन्होंने एक अच्छी भावना से ही दिया ।
हिन्द से जोड़कर ही भारत वासियों के लिए "हिन्दू" एवं "हिन्दी" का प्रयोग अरबवासी करने लगे जिसका अर्थ था कि सम्बन्धित व्यक्ति हिन्द देश का वासी है ...... अट्ठारहवी शताब्दी तक हिंदू शब्द किसी धार्मिक समूह के लिए प्रयुक्त नहीं किया जाता था, तब अरबवासी भारत के मुस्लिमों को भी हिंदू कहा करते थे .... बल्कि आज भी अरब मे भारतीय मुस्लिमों को हिंदी कहा जाता है ....
खुद सोचिए भला यदि हिंद, हिंदी या हिंदू का अर्थ बुरा होता और विधर्मियों का मजाक उड़ाने को ये शब्द रचे गए होते तो यही शब्द अरब के लोग मुस्लिमों के लिए क्यों बोलते ???
मुता मैरिज इस्लाम का अंग नही
जिस तरह इस्लाम के खिलाफ बिल्कुल झूठा और अश्लील प्रचार कुछ कट्टरतावादी इस्लाम विरोधियों द्वारा किया जा रहा है, उससे ऐसा भ्रम बनाया जा रहा है जैसे सारी कुप्रथाओं का जनक, और सारी बुराइयों की जड़ इस्लाम ही हो, और इस्लाम की आलोचना कर के ही दुनिया से बुराइयों को मिटाया जा सकता है, ... पर इसके पीछे वास्तविकता ये है कि इस्लाम मे बुराइयों का शोर मचा कर वो लोग अपनी सोसायटी की कमियों को छिपाने की कोशिशें करते हैं, और अपनी सोसायटी की बुराइयों को आलोचना से बचाकर, उन्हें हमेशा चालू रखना चाहते हैं
जैसे कुछ लोगों ने मुता मैरिज को बेस बनाकर इस्लाम पर ये आरोप लगाकर इण्टरनेट पर प्रसारित किया
//.... क्या आप जानते हैं कि दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ वेश्यावृति ना सिर्फ वैध है बल्कि इसे इस्लाम में प्रोत्साहित भी किया जाता है और एक धार्मिक कार्य माना जाता है, इस्लाम में “मुता” शादी शब्द ला कर वेश्यावृति को कानूनी जामा पहनाया गया है…. जिसे यात्री विवाह भी कहा जाता है..! ये एक प्रकार से अनुबंध आधार पर अल्पावधि विवाह है, और कुछ घंटों के लिए भी हो सकती है…!
जहाँ हिन्दू धर्म में स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और उन्हें देवी तक की संज्ञा दी गयी है वहीँ इस्लाम में स्रियों को भोग-विलास की “मात्र एक वस्तु” बना रखने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ी है . नोट: इस्लाम को छोड़कर दुनिया के सभी धर्मों में चरित्रवान रहने पर जोर दिया गया है और वेश्यावृति को पाप मानते हुए उसे एक घिनौने अपराध की संज्ञा दी गई है…..//
.... कितना अच्छा होता कि मेरा धर्म अच्छा और तुम्हारा धर्म बुरा के आरोप प्रत्यारोप मे पड़ने की बजाय इन भाईयों ने अपने समाज मे धर्म के नाम पर चल रहा स्त्रियों का दैहिक शोषण रोका होता ... हम तो यही समझते हैं कि हर धर्म अपने मूल मे पवित्र धर्म है, लेकिन ढोंगी धर्माधिकारियों ने निजी लाभों को पाने के लिए अश्लील और आपत्तिजनक चीजों को धर्म का जामा पहना दिया है ॥
बहरहाल, इस्लाम पर लगाए गए आरोप पर आते हैं, जैसा कि हम सब जानते हैं कि इस्लाम के नियम कोई एक दिन मे अवतरित नही हुए, बल्कि ये नियम 23 साल तक धीरे धीरे कर के लोगों के बीच लाये जाते रहे ताकि वे लोग एकदम अचानक से अपनी वर्षों की बनाई हुई पक्की आदतों के विरुद्ध कई सारे नियम देखकर बिदक न जाएँ, खुद में सुधार करने में अधिक मेहनत देखकर हतोत्साहित न हो जाएं, बल्कि ऐसा हो कि वो पहले कुछ अच्छी आदतें अपनाकर उनके अभ्यस्त हो जाएं, तब उनको नए सुधारों की प्रेरणा दी जाए ताकि उनका उत्साह ऊँचा बना रहे, और वे नित नए सुधार करते जाएँ...
..... यही मामला, तत्कालीन अरबी कुरीति मुताह के विरुद्ध भी लागू किया गया
..... मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज है जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था, वास्तव में ये स्वच्छन्द काम तृप्ति का एक तरीका था, जिसे अरब के लोगों ने विवाह का आवरण पहना दिया था.... जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया, इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें
... तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे .... सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है...!!
और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए ''
..... तो सुन्नी इस्लाम में मुताह को पूरी तरह से हराम माना जाता है, परन्तु मुताह हराम होने की घोषणा से पूर्व जब मुताहः की मनाही की घोषणा नबी सल्ल० ने नही की थी व आप सल्ल० के सामने ही लोग मुताह विवाह किया करते थे, तो नबी सल्ल० अल्लाह का इस विषय में कोई आदेश अवतरित न होने के कारण इस विषय पर मौन रहते थे, इसी समय की कुछ घटनाओं का वर्णन कुछ हदीस साहित्य में है जिनके कारण मुस्लिमों का एक छोटा सा वर्ग भूलवश मुताह को इस्लाम में अनुमतिप्राप्त विवाह मान बैठा है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूं कि प्रैक्टिकली वो लोग भी मुताह को व्यवहार में लाना सही नही समझते होंगे, क्योंकि मुताह अपनी प्रकृति में ही निर्लज्जता का बोध कराता है
ख़ैर विश्व में मुस्लिमों की लगभग 95 फ़ीसद सुन्नी मुसलमानों की आबादी मुताह को पूरी तरह हराम मानती है, क्योंकि मुताह को हराम ठहराने वाली अहादीस पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, जिस कारण मुताह को जायज़ समझने की भूल कोई बिरले ही करेगा
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
कुन फयाकुन का अर्थ
हमारे एक भाई साहब पूछ रहे हैं कि अल्लाह ने कायनात 6 दिन लगाकर क्यों बनाई , "होजा" कहकर तुरंत क्यों न बना दी जबकि यह तकनीक क़ुरआन सिद्ध है ??
.
.
.... कमाल है भाई, अभी आपको ये समस्या है कि अल्लाह ने तत्क्षण ब्रह्मांड का निर्माण क्यों नहीं कर दिया, और अभी चन्द दिनों पहले आपको ही ये समस्या भी थी कि कुरआन में ब्रह्मांड के निर्माण की अवधि बहुत कम सिद्ध हो रही है,
..... याद कीजिये, आप ही ने कहा था कि क़ुरआन में अल्लाह का एक दिन कहीं 1000 साल, कहीं 10000 साल, और कहीं 50000 साल के बराबर बताया गया है, तो अगर इनमे सबसे बड़ी गणना भी लें तो भी 6 दिन में कायनात बनाने की अवधि केवल 3 लाख साल ठहरेगी जबकि विज्ञान के अनुसार सिर्फ़ धरती को ही अपने मौजूदा रूप में आने में करीब साढ़े पाँच अरब साल लगे।
.... और तब मैंने आपको बताया था कि अल्लाह के नज़दीक एक दिन के अलग अलग टाइम पीरियड बताए गए हैं, इससे ये बात साबित होती है कि अल्लाह के नज़दीक "यौम" का एक फिक्स टाइम पीरियड नही है बल्कि अल्लाह जिस हिसाब से इन्हें घटाना बढाना चाहता है, घटा बढ़ा लेता है ... तो ब्रह्मांड के निर्माण के समय अल्लाह का दिन 50,000 साल से भी बहुत बड़ा हो सकना सम्भव है....!!!
.
.
..... भाई ये आपका "चित भी मेरी, पट भी मेरी" वाला हिसाब समझ नही आ रहा ?? आप वाक़ई जवाब जानना चाहते हैं या अपने सवालों में इंसान को उलझा कर खुद के ज़्यादा बुद्धिजीवी होने के अहम् की तुष्टि करना चाहते हैं ??
.
..... बहरहाल, जान लीजिये कि आपका सवाल तर्कसंगत नही है.
... सवाल कुरआन में कही गई बात पर होना चाहिए, न कि अपने अनुमानों पर...
.
ये सूरह यासीन (सूरह 36) की आयतें हैं
.... "और उसने हमपर फब्ती कसी और अपनी पैदाइश को भूल गया। कहता है, "कौन हड्डियों में जान डालेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी?" कह दो, "उनमें वही जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया। वह तो प्रत्येक संसृति को भली-भाँति जानता है, वही है जिसने तुम्हारे लिए हरे-भरे वृक्ष से आग पैदा कर दी। तो लगे हो तुम उससे जलाने।" क्या जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया उसे इसकी सामर्थ्य नहीं कि उन जैसों को पुनः पैदा कर दे? क्यों नहीं, जबकि वह महान स्रष्टा, अत्यन्त ज्ञानवान है, उसका मामला तो बस यह है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उससे कहता है, "हो जा!" और वह हो जाती है"
(आयत संख्या 78 से 82 तक)
.
.
इन आयतों का अर्थ है कि अल्लाह हर प्रकार का कार्य, यहां तक कि कोई भी चमत्कारी कार्य करने के लिए भी सार्मथ्यवान है, और कोई भी काम ऐसा नही है जो अल्लाह न कर पाए, बल्कि वो जिस भी कार्य के करने की इच्छा करता है, केवल उसके आदेश देने भर पर वो कार्य स्वयमेव होने लगता है.
... यहां इन आयतों में तो कहीं ऐसा नहीं कहा गया कि अल्लाह कोई भी कार्य तुरत फुरत करता है,
... उल्टे इन आयतों में तो तुरत फुरत के ठीक विपरीत बात है कि काफ़िर अपनी मृत्यु के बाद कयामत में दोबारा ज़िंदा किये जाने की बात का मज़ाक उड़ा रहे हैं और उस बात पर अल्लाह ने उन्हें क़यामत आ जाने तक का इंतज़ार करने को कहा है....
.
.... यानी यहां तो आयतें ये बता रही हैं कि अल्लाह को हर एक काम की सामर्थ्य प्राप्त है जिन कामों के लिए अल्लाह ने समय नीयत कर रखे हैं और समय आने पर अल्लाह द्वारा नीयत किया हुआ हर एक काम होकर रहेगा....
.... इन आयतों के आधार पर पता नहीं कौन से विज्ञान से आप ये अनुमान लगा रहे हैं कि अल्लाह ने हर काम तुरंत तत्क्षण पूरा कर देने की बात कही है....
.... ख़ैर अब से बात को ध्यानपूर्वक समझ लीजिए कि "कुन फ़याकून" का अर्थ अल्लाह के आदेश देने भर से नियति का तय हो जाना है, कि अल्लाह ने आदेश दे दिया तो फिर वो बात टल नही सकती... इसका अर्थ जबरन कुछ और न निकालिये .... धन्यवाद !!!
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



